शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

गाँव उजड़ रहे हैं, शहर अराजक हैं

उत्तराखंड/ गोविन्द सिंह

स्मार्ट शहरों की पहली सूची में देहरादून को स्थान न मिल पाने की वजह से भलेही सरकार दुखी हो, लेकिन इससे एक सबक यह मिला है कि हमारे नीति-नियोजकों को प्रदेश के शहरी-नियोजन पर पुनर्विचार करने का मौक़ा मिला है. देहरादून के निकट 350 एकड़ में स्मार्ट शहर बन भी जाता तो क्या होता! प्रदेश के बाक़ी शहरों की क्या हालत हो गयी है, यह हम अच्छी तरह देख रहे हैं. उत्तराखंड के शहरों को देख कर जाहिर हो जाता है कि हमारे हुक्मरानों के मन में नए राज्य को लेकर कोई विजन नहीं रहा है.
जब नए राज्य को लेकर आन्दोलन हो रहा था, तब अक्सर ये चर्चाएँ हुआ करती थीं कि हमारे शहर कैसे होंगे, गाँव कैसे होंगे, कैसे उद्योग लगेंगे, कैसी खेती-बागवानी होगी, कैसे वन होंगे, कैसा वन्य-जीवन होगा, किस तरह प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होगा? लेकिन राज्य बनने के बाद जैसे सारे सपने तितर-बितर हो गए. पहले और दूसरे मुख्यमंत्री तो अस्थायी ही थे. तीसरे यानी पहले स्थायी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी शुरू से उत्तराखंड राज्य के विरोधी रहे. पहाड़ को लेकर उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था. बेशक उन्होंने नए राज्य के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन जो कुछ किया मैदानों में ही किया. हरिद्वार और उधम सिंह नगर में ही बड़े औद्योगिक आस्थान बनाए. नतीजा यह हुआ कि तराई की खेती की जमीन पर कंक्रीट के जंगल उगने लगे. उनके बाद खंडूरी आये, निश्शंक आये, वे भी तिवारी जी की लकीर को मिटा नहीं पाए. क्योंकि वही आसान रास्ता था. नतीजा यह हुआ कि एक भी मुद्दे पर गंभीरता से चिंतन-मनन नहीं हुआ. जिस पहाड़ के लिए राज्य बना था, वहाँ के लोग खुद को छला हुआ महसूस करने लगे. लोग पहाड़ों से मैदानों की ओर खिसकने लगे. देखते ही देखते गाँव के गाँव खाली होने लगे. सीमान्त राज्य होने की वजह से सामरिक दृष्टि से भी यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है.
आज आलम यह है कि शहर लबालब भर गए हैं, वहाँ पैर धरने की जगह नहीं है, वहाँ की जमीनें आसमान छू रही हैं, जबकि पहाड़ उजड़ रहे हैं. मुफ्त में भी कोई खेती करने को तैयार नहीं है. पहाड़ी गांवों में जमीन की कोई कीमत नहीं रह गयी है. लोग अपने गाँव की करोड़ों की जमीन छोड़ कर हल्द्वानी, देहरादून जैसे शहरों में आ रहे हैं, जहां एक छोटे से प्लाट में ही संतोष करने को विवश हैं. राज्य बनने के बाद 3000 गाँव उजड़ चुके हैं, इतने ही उजड़ने के कगार पर हैं. अब लग रहा है कि न हमने गांवों के बारे में सोचा और न ही शहरों के बारे में.
सारा ‘विकास’ देहरादून, ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार जिलों में हो रहा है. वहीं विश्वविद्यालय खुल रहे हैं, वहीं स्कूल-कॉलेज खुल रहे हैं, वहीं होटल और हॉस्पिटल हैं. यहाँ रहने वाले लोग पहाड़ों की कठोर जिन्दगी से डरते हैं, लिहाजा वहाँ कोई नहीं जाना चाहता. जो पहाड़ों से यहाँ आ गए हैं, वे भी नहीं. इससे शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ता ही जा रहा है. जबकि अब तक शहरी नियोजन पर किसी ने कुछ सोचा ही नहीं था. देहरादून, हल्द्वानी, कोटद्वार, रामनगर, रुद्रपुर, खटीमा जैसे मैदानी शहरों में बड़े पैमाने पर लोग पहाड़ों से चल कर बस रहे हैं. लेकिन यहाँ शहर जैसी सुविधाएं नदारद हैं. सोना उगलने वाली जमीन में आज जगह-जगह प्लाट कटे हुए नजर आते हैं. प्रॉपर्टी डीलर और छुटभैये बिल्डर चांदी काट रहे हैं. न सडकों की व्यवस्था है, न सीवर की और न कचरे के निपटान को लेकर कोई चिंतित है. लोग कचरे को जलाकर कैंसर को बुलावा दे रहे हैं. बिजली-पानी का तो कहना ही क्या? जो शहर कभी तीन किलोमीटर के दायरे में सिमटे हुए थे, आज 15 किलोमीटर में फ़ैल चुके हैं. जनगणना की किताबों में भलेही शहर की आबादी एक लाख बतायी जा रही हो, लेकिन वास्तव में वह 5 लाख को पार कर चुकी है. राज्य में 2011 की जनगणना के हिसाब से एक लाख से अधिक आबादी वाले शहर सिर्फ सात हैं, लेकिन वास्तव में यह संख्या दर्जन भर से अधिक पहुँच चुकी है. और जिन शहरों की आबादी एक-दो लाख बतायी गयी है, वे कबके पांच लाख को पार कर चुके हैं. दरअसल आज मैदानी शहरों के आस-पास के गाँव शहर बन चुके हैं. जबकि प्रशासन उन्हें शहर नहीं मान रहा. न शहर जैसी सुविधाएं ही मुहैया करवाना चाहता है.
जबसे मोदी सरकार ने स्मार्ट शहर का शिगूफा छोड़ा है, तबसे लोग यह सपना बुनने लगे हैं कि काश उनका शहर भी स्मार्ट होता! सरकार केंद्र के कोटे से देहरादून को स्मार्ट बनाना चाहती है. इसके अलावा छः और शहरों को स्मार्ट बनाना चाहती है. कुछ शहरों को अमृत अर्थात अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रान्स्फोर्मेशन नामक योजना के तहत सुधारना चाहती है. लेकिन हमारा तो कहना है कि जब तक सरकारें पूरे राज्य के भूगोल को ध्यान में रखकर समेकित विकास के बारे खुद नहीं सोचती, तब तक वह एक कदम आगे तो दो कदम पीछे वाली कहावत को ही चरितार्थ करेगी. 
    

स्मार्ट शहर का अधूरा सपना

उत्तराखंड/ गोविन्द सिंह
पिछले पखवाड़े जारी हुई देश के बीस स्मार्ट शहरों की सूची में उत्तराखंड के किसी भी शहर को स्थान न मिल पाने से उत्तराखंड के लोग खासे मायूस हुए. प्रदेश सरकार ने देहरादून के करीब एक नया स्मार्ट शहर स्थापित करने का जो प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा, वह अपने आप में इतना मुकम्मल नहीं था कि उसे पहले बीस शहरों में स्थान मिल पाता. कुछ कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक रंग देने और केंद्र पर उत्तराखंड के साथ भेदभाव करने के आरोप भी लगाए लेकिन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ज्यादा परिपक्वता का परिचय देते हुए कहा कि इसमें किसी तरह का राजनीतिक पूर्वाग्रह नहीं दिखाई देता.
चलो, यह तो राजनीतिक बात हुई, असल बात यह है कि आम जनता को भी लगा कि क्या हमारा प्रदेश इस लायक भी नहीं कि यहाँ के किसी एक शहर को स्मार्ट शहर बनाया जाए. हालांकि आम लोगों को नहीं मालूम कि स्मार्ट शहर क्या होता है, उसे चुनने की क्या प्रक्रिया होती है और वह कैसे बनता है? सबसे पहले हम स्मार्ट शहर के बारे में जानते हैं. यह एक ऐसा शहर होता है, जहां हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध होती है. आधुनिक सुविधा से आशय मुख्यतः सूचना-प्रौद्योगिकी से जुडी सुविधाएं होती हैं. यानी वहाँ की सड़कें हर रोज कोई न कोई तार डालने या नाली बिछाने के लिए खुदी नहीं होंगी. वे सब पहले से ही मौजूद होंगी. आप अपने घर से ही बहुत सी सेवाएँ और काम संचालित कर पायेंगे. इस योजना के तहत स्मार्ट शहर बनने पर हर साल सौ करोड़ रुपये भी मिलते हैं. जाहिर है, वहाँ रहने वालों को इन सुविधाओं के उपभोग करने की कीमत देनी होगी. लेकिन ये चीजें दूर से देखने को अच्छी तो लगती ही हैं. ऐसा नहीं कि स्मार्ट शहर बन जाने से पूरे देहरादून की समस्त प्रजा को ये सारी सुविधाएं मिलने लगेंगी. लेकिन कम से कम सुनने में तो अच्छा लगता है.
तो क्यों नहीं बन पाया देहरादून स्मार्ट शहर?
स्मार्ट शहर के लिए तीन तरह की योजनायें केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने प्रस्तुत की थीं. पहली योजना यह थी कि वर्तमान शहर में पहले से उपलब्ध संरचनाओं का विकास कर इस लायक बनाया जाए कि वह स्मार्ट बन सके. दूसरी योजना के तहत शहर के मौजूदा ढाँचे को ध्वस्त कर के पुनर्निर्माण किया जाए. और तीसरी योजना के तहत किसी नई जगह खाली जमीन का अधिग्रहण करके वहाँ नया शहर बसाया जाए. हमारी राज्य सरकार को पहली दोनों याजनाएं अव्यावहारिक लगीं, इसलिए उसने तीसरी योजना पर काम किया. सरकार का कहना है कि पुराने शहर को तोड़-फोड़ करने में बहुत मुश्किलें आयेंगी और परियोजना को अंजाम देने में देर भी लगेगी. इसलिए तीसरे विकल्प को अपनाया गया. सहसपुर के पास के चाय बागानों पर नजर पड़ी. चाय बागानों की तकरीबन दो हजार एकड़ जमीन के अधिग्रहण की योजना बनी. लेकिन तभी विरोध के सुर तेज होने लगे. विरोधियों ने आरोप लगाए कि इससे जमीनों के खरीद-फरोख्त का धंधा चल पड़ेगा. साथ ही चाय बागान की जमीन के अधिग्रहण पर भी तकनीकी दिक्कतें आयीं. सरकार को लगा कि वह फंस रही है. अंत में 350 एकड़ जमीन पर करार हुआ. सरकार ने इस हरित पट्टी पर नया स्मार्ट शहर का प्रस्ताव केंद्र को भेज दिया. लेकिन जानकार कहते हैं कि प्रस्ताव बिना एसयूवी अर्थात स्पेशल परपज वीहकल के ही भेजा गया. साथ ही एक दिक्कत यह भी रही कि ग्रीनफील्ड प्लान के तहत बनने वाले शहर के लिए कमसे कम दो हजार करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष निवेश चाहिए, क्या राज्य सरकार वह सब जुटा पायेगी? लिहाजा देहरादून को पहले बीस शहरों में जगह नहीं मिल पायी. लेकिन संतोष की बात यह भी है कि ग्रीनफील्ड प्लान वाले किसी भी प्रस्ताव को इस खेप में नहीं लिया गया है. अब अप्रैल में 23 और शहरों की घोषणा होनी है. सरकार को आशा है कि दूसरी लिस्ट में देहरादून को जरूर स्थान मिलेगा. लेकिन यहाँ भी निराशा की आशंका व्यक्त करने वालों की कमी नहीं है. वे बता रहे हैं कि देहरादून का प्रस्ताव इतना कमजोर है कि उसका नंबर 97वां है. इसलिए उसरी लिस्ट से भी बहुत आशा नहीं है.

कुल मिलाकर स्मार्ट सिटी को लेकर उत्तराखंड की झोली अभी तक खाली है. जिनके नेता दृष्टिसंपन्न हैं, जिनके अफसर स्मार्ट हैं, उन्होंने एक से अधिक स्मार्ट शहर हथिया लिए हैं. जिनके अफसर ढीले-ढाले हैं, वे पीछे रह गए हैं. हमारी यही नियति है. एक तो हमारे नेता और अफसरों को देहरादून के अलावा और कहीं कुछ दीखता ही नहीं. दूसरे, उन्हें हर चीज में राजनीति और स्वार्थ दिखता है. यही वजह है कि 15 साल बाद भी हम गर्व से नहीं कह सकते कि हमने नया राज्य बनाकर बहुत अच्छा किया! (खटीमा दीप, 15 फरवरी, 2016 में प्रकाशित)        

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

भस्मासुर बन सकता है असंतुलित विकास

उत्तराखंड/ गोविन्द सिंह

राज्य बनने के 15 साल बाद भी एक खुशहाल पहाडी राज्य का सपना साकार नहीं हो पाया है तो इसका एक ही कारण है. वह यह है कि एक पहाड़ी राज्य को लेकर हमारे हुक्मरानों के मन में कोई विजन नहीं था. राज्य बन गया, सत्ता हाथ में आ गयी, और तथाकथित विकास की बाढ़ आती गयी. पैसा आया, योजना आयी, कुछ रकम खर्च हो पायी, कुछ बच गयी. इस प्रक्रिया में जो होना था, हो गया, बाक़ी इष्टदेव अपने आप देखेगा! सचमुच इसी ढर्रे पर चला है, उत्तराखंड राज्य. यह हमारी जनता का धैर्य और संतोषी स्वभाव ही है, जो यहाँ की सरकारें आराम से पांच साल काट लेती हैं. यह भी कह सकते हैं कि बीते 15 वर्षों में जनता को समझ ही नहीं आया कि अब हम क्या करें? आन्दोलन भी चलायें तो किसके खिलाफ? यही वजह है कि पूरे राज्य में असंतुलित विकास हुआ है. लगता ही नहीं, इस विकास के पीछे कोई सुचिंतित रणनीति काम कर रही है.
देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया. ठीक है. बात समझ में आती है, क्यों कि तत्काल एक राजधानी का भार ढोने को कोई शहर तैयार नहीं था. लेकिन पिथौरागढ़, मुनस्यारी और धारचूला के नागरिक के लिए कितना दूर है देहरादून, किसी ने सोचा तक नहीं. यहाँ तक कि उत्तरकाशी के दूरस्थ इलाकों के लिए भी वह उतनी ही दूर पड़ता है. चलो, मान लिया कि यह अस्थायी राजधानी थी, लेकिन स्थायी राजधानी के लिए भी तो सोचना चाहिए था. एक तेलंगाना को देखिए, किस तरह से पहले ही दिन से उन्होंने नई राजधानी के लिए स्थान का चयन किया और उस पर युद्ध स्तर पर काम शुरू कर दिया है. सुखद आश्चर्य यह है कि किसी स्तर पर कोई मतभेद नहीं दिखाई पड़ा. अपने यहाँ तो कोई ऐसा काम नहीं होता जिस पर ‘नौ कनौजिए, तेरह चूल्हे’ वाली कहावत चरितार्थ न होती हो.
अब कुमाऊँ अंचल को ही देख लीजिए. एक ज़माना था, जब टनकपुर, हल्द्वानी और रामनगर की स्थिति एक जैसी थी. तीनों ही पहाड़ के प्रवेशद्वार थे. आज इन तीनों द्वारों में से हल्द्वानी ही एक ऐसा शहर है, जिसकी तरफ हुक्मरानों की नजर है. हल्द्वानी के लिए हर तरह की ट्रेनें हैं, बसें हैं, सड़कें हैं, सुविधाएं हैं, लेकिन टनकपुर जैसे का तैसा है. टनकपुर ही क्यों, खटीमा और बनबसा की भी वैसी ही दशा है. इसी वजह से पिथौरागढ़, चम्पावत का विकास नहीं हो पा रहा है. बहुत पहले से कहा जाता रहा है कि यहाँ से काली नदी के किनारे-किनारे धारचूला तक सड़क बनेगी और वहाँ पहुँचने तक साठ किलोमीटर का फायदा हो जाएगा. कभी कहते हैं सुरंग रेल बनेगी. यह इलाका इतना संवेदनशील है, दो-दो पड़ोसी देशों की सरहदें इन जिलों से लगती हैं, फिर भी हमारी सरकारों को कोई चिंता नहीं. ढंग की रेल लाइन तक यहाँ नहीं है. चीन ने एकदम नेपाल की उत्तरी सीमा तक चमचमाती हुई सड़कें बना ली, तब भी हमें कोई चिंता नहीं होती. जब इन इलाकों में रेडियो तक इस देश का नहीं सुनाई देता, नेपाल का ही पकड़ता है, तो और बड़ी बुनियादी संरचनाओं की बात क्या करें?

कायदे से देखा जाए, तो उत्तराखंड के तमाम पहाड़ी शहरों में सबसे सुन्दर और संभावनाशील शहर पिथौरागढ़ था. लेकिन योजनाविहीनता और उपेक्षा के कारण आज उसकी क्या हालत हो गयी है, यह साबित करने की जरूरत नहीं है. हमारे पास पर्यटन और तीर्थाटन के अलावा बेचने के लिए और क्या है? लेकिन क्या आज पिथौरागढ़ हमारे पर्यटन मानचित्र पर है? मुनस्यारी को छोड़ दें तो और कहीं भी क्या राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक पहुँचते हैं? इसलिए केवल देहरादून के इर्द-गिर्द विकास मत कीजिए. यह न भूलिए कि इस प्रदेश में और भी ऐसे इलाके हैं, जो आपके विकास की बाट जोह रहे हैं. असंतुलित विकास भविष्य में आपके लिए ही भस्मासुर बनेगा. (खटीमा दीप में प्रकाशित)       

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

पहाड़ के शहरों में कूड़े और कैंसर का आतंक

पहाड़-यात्रा-3/ गोविन्द सिंह
पिछले अंकों में आपने पढ़ा कि लेखक ने अपनी पिथौरागढ़ यात्रा के दौरान क्या-क्या देखा? किस तरह बदल रहा है अपना पहाड़? पढाई-लिखाई, खेती-बड़ी, पलायन और शराबखोरी के कारण किस तरह तबाह हो रहे हैं अपने गाँव? पहाड़-यात्रा की अंतिम कड़ी में इस बार प्रस्तुत है:
उल्का देवी मंदिर से पिथौरागढ़ 
अपने गाँव सौगाँव और ननिहाल लीमा-जौराशी से लौटते हुए हम पिथौरागढ़ पहुंचे. यहाँ इजा को पेंशन लेनी थी. उनकी उम्र 94 वर्ष हो चुकी है. अब काफी कमजोर हो चुकी हैं. साल-छः महीने में जाकर वहीं से पेंशन लेनी पड़ती है. हल्द्वानी ट्रांसफ़र करवाने की कुछ कोशिश की, लेकिन हुई नहीं. पिताजी बर्मा वाले थे. 1967 में उनकी मृत्यु के बाद 1990 में इजा को बड़ी मुश्किल से पेंशन लगी थी. लोग कहते हैं, बर्मा वालों कि ट्रान्सफर नहीं होती. अंगूठा-टेक होने से बैंक वाले भी मदद नहीं करते. हमने भी ज्यादा जोर नहीं लगाया. कम से कम इसी बहाने साल में एक बार गाँव जा आते हैं. ईस्ट देव के मंदिर में एक गोदान दे आते हैं. पुरखों की भूमि है, उसे इतनी जल्दी अपनी स्मृतियों से अलविदा नहीं किया जा सकता. यूं भी इजा के आधे प्राण वहीं अटके रहते हैं. पहाड़ जाने के नाम पर उनमें नया जोश आ जाता है. हम लोग भी जड़ों से जुड़े रहते हैं.
पिथौरागढ़ से आठ-दस किलोमीटर पहले पलेटा नाम का गाँव पड़ता है. देखा कि यहाँ सड़क के नींचे पहाड़ी पर से पिथौरागढ़ का कूड़ा-कचरा फेंका गया था. इस कचरे से धुएं की एक अनवरत लट उठ रही थी, जो अत्यंत बदबूदार थी. इस कचरे में प्लास्टिक-पौलीथीन होगा, अस्पतालों का जहरीला कचरा होगा और न जाने क्या-क्या होगा. जो बदबूदार धुआं इससे उठ रहा था, वह कितना हानिकारक होगा, उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते. पलेटा से लेकर नैनीपातल तक और पिथौरागढ़ की तरफ जाजरदेवल तक के लोग इस धुएं को ग्रहण करने को अभिशप्त हैं. आकाश में मिलकर जिस तरह से यह धुंआ समस्त वायुमंडल को प्रदूषित कर रहा है, वह और भी चिंताजनक है. प्‍लास्टिक, पॉलीथीन और थर्मोकोल के जलने से जो धुआं निकलता है, उसमें हाइड्रोजन सायनाइड और क्‍लोरो फ्लोरो कार्बन जैसी गैसें होती हैं। यह परखी हुई बात है कि इन गैसों से कैंसर जैसे असाध्‍य रोग होते हैं। ये गैसें सेहत के लिए तो घातक होती ही हैं, पर्यावरण के लिए भी अत्‍यंत नुकसानदेह हैं। यह कोई नई बात नहीं है कि पॉलीथीन धरती के लिए भी घातक है और पानी के लिए भी। रंगीन पॉली बैग्‍स में लेड और कैडमियम जैसे रसायन होते हैं जो जहरीले और सेहत के लिए खतरनाक होते हैं। जो लोग इस तरह नितांत अवैज्ञानिक तरीके से कचरे को ठिकाने लगा रहे हैं, ऐसा नहीं हो सकता है कि वे इसके दुष्परिणामों से अपरिचित हों. यदि जानबूझकर भी वे ऐसा कर रहे हैं तो वे खुल्लमखुल्ला अपराध कर रहे हैं. लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो इसके दुष्परिणामों के बारे में नहीं जानते. शहरों की गलियों-बाजारों में सुबह-सवेरे लोग प्लास्टिक कचरे को जलाते हैं और अपनी मौत का धुवां पीते हैं.
हम लोग इस बात से बेहद चिंतित हैं कि पहाड़ों में कैंसर का प्रकोप दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है. दो साल पहले मेरे गाँव के पास की गोबुली दीदी केंसर की भेंट चढ़ गयी. इस साल मुवानी के पास के एक गाँव से एक गरीब महिला हल्द्वानी आयी थी, जिसे आँतों का केंसर लील गया. रोज-ब-रोज कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. बड़े-बूढ़े कहते हैं, ये कैसा ज़माना आ गया है. कैसी-कैसी बीमारियाँ सुनने में आ रही हैं. ग्रामवासियों को नहीं मालूम कि कैंसर क्यों पहाड़ भर में पसर गया है? इसका एक ही कारण है हमारी आधुनिक जीवन शैली. प्लास्टिक-पौलीथीन पर अत्यधिक निर्भरता. खेती में अत्यधिक रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल. पहले जमाने में पहाड़ों के लोग शुद्ध अनाज खाते थे. गोबर की खाद में उगी सब्जियां खाते थे. बांज-रयांज के जंगलों का ठंडा पानी पीते थे. गोठ की गाय-भैंस का दूध-घी पीते थे. मोटा और ताकतवर अनाज होता था. और खूब पैदल चलते थे. इसलिए बीमारियाँ भी पास नहीं फटकती थीं. अब धीरे-धीरे ये सब चीजें गायब होती जा रही हैं. लोग सुविधाभोगी हो रहे हैं. हमने अपने बच्चों को शारीरिक काम न करने के संस्कार दिए हैं. इसलिए नई पीढ़ी खेतों में काम नहीं करना चाहती. बाजार से तो मिलावटी चीजें ही मिलेंगी. ऊपर से रही-सही कसर गरीबों को मिलने वाला मुफ्त अनाज पूरी कर दे रहा है. इसके लालच में लोग अपनी खेती छोड़ रहे हैं. उन्हें नहीं मालूम कि यह अनाज किस तरह की रासायनिक खादों से उगा है! कितना घातक है उनके लिए. पहाड़ों में कूड़े के निपटान की कोइ व्यवस्था न हो पाना हमारे नेताओं और अफसरों की कार्यशैली पर बड़ा सा सवालिया प्रश्नचिह्न लगाता है.  खटीमा दीप, १६ अप्रैल, २०१६ में प्रकाशित