शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

भारत-पाक: एक अंतहीन दुश्मनी

पड़ोस/ गोविन्द सिंह
मई में जब नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी तब सचमुच यह आशा बंधने लगी थी कि शायद अब भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सामान्य हो जायेंगे. भारत और पाकिस्तान में ही नहीं, सारी दुनिया में मोदी की पहल की सराहना हुई थी. हालांकि पाकिस्तानी कट्टरपंथी हलकों में नवाज शरीफ की भारत यात्रा का विरोध हुआ था और बाद में यह भी सवाल उठाया गया कि पाकिस्तान को इस यात्रा से क्या मिला? लेकिन कुल मिला कर पाकिस्तान और भारत के अवाम ने इसका खुले दिल से स्वागत किया. अपने पड़ोसियों को तवज्जो देने की मोदी की नीति की सराहना होने लगी. पाकिस्तानी जनता ने भी अपनी तमाम आशंकाओं को भुला कर मोदी की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से की, जिन्होंने दिल्ली-लाहौर के बीच बस चलाई थी. दोनों देशों की जनता के मन में आपसी रिश्तों के दिन बहुरने की आशाएं-आकांक्षाएं छलांगें मारने लगीं. लेकिन 25 अगस्त की प्रस्तावित सचिव-स्तरीय वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तानी उच्चायुक्त के कश्मीरी अलगाववादियों से मिलने और बदले में भारत द्वारा वार्ता को तोड़ देने से तमाम आशाएं धरी की धरी रह गयी हैं.

दोनों तरफ की जनता की निराशा की वजह भी है. सबसे बड़ी वजह तो यही है कि दोनों देशों का विभाजन निहायत कृत्रिम है. हजारों वर्षों से एक साथ रही जनता को एक दिन अचानक मजहब के आधार पर आप दो देशों में बाँट देंगे तो ऐसा ही होगा. बंटवारे के वक़्त हुए खून खराबे और चार-चार बार युद्धों में हज़ारों लोगों के मारे जाने के बावजूद दोनों देशों की जनता के आपस में एक-दूसरे के प्रति नफरत का भाव उतना नहीं है, जितना कि होना चाहिए. मसलन चीन और भारत के बीच १९६२ में हुई लड़ाई के बाद आपसी रिश्तों की बर्फ १९७८ में जाकर पिघलनी शुरू हुई. लेकिन १९९९ में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध के तत्काल बाद वार्ता शुरू हो गयी थी और २००१ में मुशर्रफ आगरा भी आ गए थे. यानी दोनों देशों के रिश्ते वैसे हैं ही नहीं जैसे दो दुश्मन देशों के बीच होते हैं. सरकारों के स्तर पर भलेही पाकिस्तान हमारा दुश्मन हो लेकिन जनता के स्तर पर वह हमारा सहोदर है और रहेगा.
इसलिए जब भी भारत और पाकिस्तान के अवाम के आपसी रिश्तो की बात आती है, सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह की याद आती है, जिसके नायक पागल बिशन सिंह को अचानक बताया जाता है कि उसका गाँव अब पाकिस्तान के हिस्से में चला गया है, इसलिए उसे हिन्दुस्तान जाना होगा क्योंकि वह मुसलमान नहीं है. तब वह नासमझ देश के बंटवारे पर एक अजीब-सी गाली निकालता है, जिसका कोई अर्थ नहीं है,  और अंत में वह दोनों देशों की सरहद के बीचो-बीच प्राण त्याग देता है. बिशन सिंह की मौत वास्तव में भारत के बंटवारे पर एक करारा तमाचा है. इसलिए जब बर्लिन की दीवार गिरी और दोनों जर्मनियों को एक हो जाना पडा तो भारत-पाकिस्तान में भी यह आशा जगी कि एक दिन हम भी एक होंगे. यहाँ तक कि लाल कृष्ण आडवाणी तक को यह कहते सुना गया कि एक दिन भारत और पाक भी एक हो सकते हैं.
जिन्ना ने जिस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर सवार होकर पाकिस्तान की निर्माण करवाया था, वह अब ध्वस्त हो चुका है. खुद पाकिस्तान के भीतर अनेक तरह की राष्ट्रीयताएँ सर उठाती रहती हैं. उसे एक रखने के लिए कुछ न कुछ मुद्दा तो चाहिए. इसलिए वहाँ के कट्टरपंथियों को, वहाँ की फ़ौज को इसी में अपना भला दिखता है कि भारत के साथ हमेशा एक तनातनी बनी रहे. कश्मीर ही वह मसला है, जिसके जरिये वे अमन की तमाम कोशिशों पर पानी फेर सकते हैं. वही वे बार-बार करते भी हैं. वरना जब दोनों देश कश्मीर को द्विपक्षीय मसला मां चुके हैं तो हुर्रियत नेताओं को बीच में लाने का क्या औचित्य है?
लेकिन दोनों देशों की सरकारें, फौजें और कट्टरपंथी जमातें चाहे जितनी कोशिश कर लें, दोनों देशों की अवाम की आशाओं पर पानी नहीं फेर सकतीं. तमाम युद्धों के बावजूद हर साल वाघा बॉर्डर पर मोमबत्ती जलाने वाले, एक-दूसरे देश में जाकर नाटक करने वाले, गीत-संगीत की महफ़िल सजाने वाले, मुशायरे जमाने वाले, मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में आकर हंसने-हंसाने वाले, फिल्मों में काम करने वाले अदाकारों के होंसले कभी कम न होंगे. साहित्य-संस्कृति ही है जो देश-काल से ऊपर उठकर जनता की आवाज को बुलंद करती है. इसलिए सरकारों के स्तर पर भलेही बातचीत ठहर गयी हो, लेकिन जनता के दिलों में गर्मजोशी हमेशा बनी रहेगी.
(दैनिक जागरण, २४ अगस्त, २०१४ से साभार) 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

कबड्डी-कबड्डी-कबड्डी!

खेल/ गोविन्द सिंह
भला हो आनंद महेंद्रा और चारु शर्मा का, जिन्होंने कबड्डी जैसे खालिस हिन्दुस्तानी खेल को राष्ट्रीय परिदृश्य में स्थापित करने का बीड़ा उठाया है. आज आईपीएल की तर्ज पर देश में प्रो-कबड्डी लीग के लिए आठ टीमें कबड्डी-कबड्डी करती हुई टीवी के परदे पर दौड़ रही हैं और आमिर खान, ऐश्वर्या राय जैसी सेलीब्रिटी तालियाँ बजा रही हैं. हो सकता है, लोग कबड्डी जैसे गंवई खेल के इस तरह आधुनिक हो जाने का बुरा मनाएं, हो सकता है, मुफ्त का यह खेल भी भविष्य में पैसे वालों की जागीर बन जाए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस देश की मिट्टी में रचे-बसे हिन्दुस्तानी खेलों को उनका जायज हक़ मिलना चाहिए. विदेशी खेलों के बरक्स उन्हें हिकारत के भाव से देखने की नीति अब बंद होनी चाहिए.
दरअसल खेल किसी भी समाज के शारीरिक सौष्ठव, ताकत, शौर्य और साहस की अभिव्यक्ति होते हैं. वे शारीरिक संस्कृति के द्योतक हैं. इसलिए वे समाज की गतिविधियों से कटे नहीं हो सकते. यह भी नहीं हो सकता कि एक खेल पूरे साल चलता ही रहे. जैसे तीज-त्यौहार, गीत-संगीत, साहित्य-कलाएं समाज की अभिव्यक्तियाँ हैं, उसी तरह से खेल भी यह बताते हैं कि फलां समाज कैसा है. वे व्यक्ति और समाज के भीतर दया और आशावाद का संचार करते हैं. पश्चिमी दुनिया फुटबाल के पीछे यों ही दीवानी नहीं होती. वह उनके खून में रचा-बसा रहता है. इसी तरह से हमारे यहाँ भी हर समाज के अपने खेल हैं. उत्तर-पूर्व के खेल, मध्य भारत के खेल, पहाड़ी अंचलों के खेल, रेगिस्तान के खेल, समुद्र तटीय इलाकों के खेल और दिमागी खेल. न जाने कितने ही किस्म के खेल इस देश में हजारों वर्षों से प्रचलित रहे हैं, जिन्हें हमने एक ही झटके में भुला दिया.
राजस्थान की रेतीली भूमि पर ऊँटगाड़ी की दौड़ जो आनंद दे सकती है, क्या वही आनंद बेसबॉल की हार-जीत दे सकती है भला? या केरल के तटवर्ती इलाकों में ओणम के अवसर पर वल्लमकल्ली नामक नौका दौड़ को देखने में जो मजा है, क्या वह लॉन टेनिस में प्राप्त हो सकता है? कबड्डी की ही तरह उत्तर भारत बैल गाड़ी, भैंसा गाड़ी की दौड़, खो-खो, कुस्ती, पंजाब में गतका, केरल में कलारीपयत्तु, मध्य भारत में मल्लखम्ब, रस्सा-कशी, मणिपुर का ठंग-टा जैसे अनेक खेल हैं, जिनके बारे में हम नहीं जानते लेकिन यदि एक बार भी देख लिया तो हम उनके मुरीद हो जायेंगे. इसी तरह से दिमागी सेहत के प्रतीक पचीसी और चौपड़ का कोई सानी नहीं.              

आजादी के बाद हमने अपने देसी खेलों के प्रति कोई ध्यान नहीं दिया. औपनिवेशिक प्रभाव के तौर पर हमें क्रिकेट के अलावा और कुछ सूझा ही नहीं. अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हमने टेनिस, बैडमिन्टन या शतरंज जैसे खेलों में भी तरक्की की. लेकिन कालांतर में ये सब भी धन के दास हो गए. आज क्रिकेट या टेनिस या शतरंज में आगे बढ़ने के लिए बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है. ये खेल अब आम आदमी की पहुँच से बहुत ऊपर हो चुके हैं. इसलिए अपनी खेल संस्कृति को बचाए रखने के लिए हमें अपने खेलों को तवज्जो देनी होगी. इस सन्दर्भ में पंजाब के किला रायपुर के ग्रामीण ओलम्पिक की जितनी तारीफ़ की जाए कम है. वे कम से कम अपने खेलों को बचाए तो हुए हैं. प्रो-कबड्डी ने राष्ट्रीय फलक पर एक देशज खेल को स्थापित करने की कोशिश की है, उसे भी सराहा जाना चाहिए.( हिन्दुस्तान, एक अगस्त, २०१४ से साभार)  

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

यूपीएससी का छल-प्रपंच

भाषा विवाद/ गोविन्द सिंह
यह बात सही है कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) भारतीय नौकरशाही का मेरुदंड रहा है, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि उसके भीतर अंग्रेजियत के विषाणु जन्मजात रूप से जमे हुए हैं. आज तो फिर भी बहुत कुछ बदल गया है, १९७९ से पहले तो लगता ही नहीं था कि भारत आज़ाद भी हो गया है. भारतीय विदेश सेवा में तो चुनींदा स्कूल-कॉलेजों से निकले हुए, एक ख़ास उच्चारण और चाल-ढाल वाले युवा ही लिए जाते थे. इसके लिए हमें निश्चय ही दौलत सिंह कोठारी जैसे विद्वानों का आभारी होना चाहिए, जिन्होंने भारतीय भाषाओं के लिए रास्ता बनाया. लेकिन १९७९ से अब तक गंगा-यमुना में बहुत पानी बह चुका है और यूपीएससी का रवैया भी काफी हद तक बदल चुका है. पर अंग्रेजियत का विषाणु सर उठाकर बाहर आने के मौके तलाशता रहता है. जैसे ही सरकार या निगरानी समूहों का ध्यान हटा, वह घुसपैठ करने लगता है. वह सुई की तरह से घुसता है, तलवार बनकर निकलता है. तीन वर्ष पहले जब वह घुसा था तो किसी ने यह अनुमान नहीं लगाया था कि उसके परिणाम इतने भयावह निकलेंगे. पिछले तीन वर्ष से लोग इस विषाणु को निकालने में लगे हुए हैं, लेकिन वह नहीं निकल रहा है. इसलिए यूपीएससी से अंग्रेजियत को निकाल फेंकने के लिए मेजर ऑपरेशन की जरूरत है.
चूंकि यूपीएससी ब्यूरोक्रैसी के हाथों में खेलती है, इसलिए कभी भी वह अंग्रेजियत को मजबूत करने का मौक़ा नहीं छोडती. १९९० में सतीश चन्द्र समिति तक भारतीय भाषाओं का वर्चस्व नहीं दिख रहा था. लेकिन नब्बे और २००० के दशक में भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाकर सिविल सेवक बनने वालों की तादात तेजी से बढ़ने लगी. इससे अंग्रेज़ी परस्त लोग घबराने लगे. यही नहीं, उन्होंने पोप तक को चिट्ठी लिख कर यह  गुजारिश की थी कि वे भारत सकरार पर दबाव डालें कि ब्यूरोक्रेसी के चरित्र को बदलने न दें. सिविल सेवा में भारतीय भाषाओं का सीधा से मतलब शहरों के दुर्ग को तोड़कर गांवों को प्रतिष्ठित करना था. जब हाकिम भी देसी उच्छारण वाली अंग्रेज़ी बोलने लगे और देसी लोगों के हक़ में फैसले करने लगे तो अंग्रेज़ी परस्त परेशान होने लगे. इसीलिए वर्ष २०१० में बनी निगवेकर समिति ने सिविल सेवा की प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षाओं को ही बदल डाला. जहां प्रारम्भिक परीक्षा में सी-सैट के जरिये अंग्रेज़ी जानने-समझने वालों को तरजीह दी गयी, वहीं मुख्य परीक्षा में भी अंग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया. तर्क यह दिया गया कि बदलते वैश्विक माहौल में अंग्रेज़ी जानना जरूरी है. वर्ष २०११ से यह व्यवस्था लागू कर दी गयी. तब से लगातार भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने और पास करने वालों की संख्या घटने लगी. जहां २०१० तक हिन्दी माध्यम से उत्तीर्ण करने वालों की संख्या ४०० से अधिक होती थी, वहीं २०१३ में यह घट कर सिर्फ २६ रह गयी. इससे यह स्पष्ट हो गया कि नई व्यवस्था पूरी तरह से देसी युवाओं को बहार रखने के मकसद से बनाई गयी है. इस बीच यह भी देखने में आया है कि अंग्रेज़ी माध्यम वाले, शहरी पृष्ठभूमि वाले और कोचिंग लेकर परिक्षा देने वाले युवा ही परीक्षा में निकल रहे हैं. गत वर्ष मुख्य परीक्षा से अंग्रेज़ी को ख़त्म करने के लिए आन्दोलन हुआ. और संसद में तमाम भारतीय भाषाओं के सांसद एकजुट होकर उसे हटाने में कामयाब हुए. तभी भेदभावपूर्ण सी-सैट के खिलाफ आवाज उठी तो अरविन्द वर्मा समिति बैठा दी. समिति को शीघ्र अपनी रिपोर्ट देनी थी. लेकिन वह नहीं दे पाया. उसका कार्यकाल तीन महीने बढ़ा दिया गया, ताकि परीक्षा पूर्ववत जारी रखी जाए. ज्ञात हुआ है कि प्रारम्भिक रिपोर्ट में कहा गया था कि सी-सैट का पलड़ा अंग्रेज़ी के पक्ष में झुका हुआ है, इससे भारतीय भाषाओं वाले युवाओं के प्रति पक्षपात हो रहा है. लेकिन नौकरशाह इसे मानने को तैयार नहीं हैं. उसी के विरोध में यह आन्दोलन है.
अजीब बात यह है कि आन्दोलन के विरोध में कोई नहीं है. हर कोई कह रहा है कि भाषाई आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए. भाजपा भी और कांग्रेस भी. सपा भी और बसपा भी. उत्तर भी और दक्षिण भी. संसद के दोनों सदन चाहते हैं कि भारतीय भाषा-भाषियों के साथ भेदभाव न हो, लेकिन फिर भी ब्यूरोक्रेसी है कि मानती नहीं. अंग्रेज़ी मीडिया जरूर फूट डालने की कोशिश करता है. कुछ अंग्रेज़ी अखबार इसे हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि जितना नुकसान हिन्दी माध्यम वालों को है, उतना ही नुकसान अन्य भाषा भाषियों को है. अभी तक हम यह मानते थे कि भाषा को लेकर राजनेता संसद और संसद से बाहर अलग-अलग व्यवहार करते हैं. इसलिए हिन्दी कभी राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं बन पायी. पहली बार एक ऐसे प्रधान मंत्री आये हैं, जो हिन्दी को लेकर स्पष्ट हैं. इसलिए अब तो भाषा को लेकर छल-प्रपंच की नीति बंद होनी ही चाहिए.( अमर उजाला, २९ जुलाई, २०१४ से साभार)
        

मंगलवार, 20 मई 2014

बदलाव का हथियार बना युवा वर्ग


राजनीति/ गोविन्द सिंह

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार के चुनाव में बदलाव की जबरदस्त आंधी चल रही थी और नरेन्द्र मोदी इसके वाहक बने. लेकिन सवाल यह है कि ऐसा कैसे हुआ और कैसे उसे वोट में परिवर्तित किया जा सका? इसका एक ही कारण नजर आता है, देश का युवा वर्ग परिवर्तन का हथियार बना है. इस बार जिस तरह से १० से १५ फीसदी तक ज्यादा मतदान हुआ, उससे यह साबित हो गया कि बिना युवावर्ग की शिरकत के इतना बड़ा परिवर्तन संभव नहीं था. वे खुद तो सडकों पर आये ही, पुरानी पीढी को भी घरों से निकलने को विवश किया. भारत में १५ करोड़ तो पहली बार वोट डालने वाले मतदाता ही थे जो लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी के जोश से लबरेज थे, उसके अलावा उतने ही लोग ३० से कम उम्र के थे. माना जा रहा है कि यही वर्ग मोदी की जीत के लिए जिम्मेदार है.
युवा वर्ग की इस भूमिका को अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. हमने देखा है कि पिछले पांच वर्षों में दुनिया भर में परिवर्तन की छटपटाहट दिखाई दी है. अरब देशों के अलावा पूर्वी देशों में भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए युवक सडकों पर उतर आये हैं. यद्यपि जब-जब दुनिया में राजनीति ने करवट बदली है, क्रान्ति का बिगुल बजाया है, उसमें निर्णायक भूमिका युवाओं की ही रही है. लेकिन हाल के वर्षों में जो परिवर्तन आये हैं, उनमें युवा स्वयं भी सीधे-सीधे भागीदार रहे हैं. अरब देशों में हुई क्रांतियाँ इसकी गवाह हैं.
हमारे यहाँ इतने बड़े पैमाने पर युवाओं की भागीदारी १९७७ के बाद इसी बार हुई है. १९८९ और १९९१ के चुनावों में भी युवाओं से जुड़े मुद्दे केंद्र में थे, लेकिन तब उनकी भागीदारी खंडित थी. २०१० के बाद अरब देशों में लोकतंत्र के लिए युवाओं में एक नई कुलबुलाहट सुनाई दी तो उसका असर भारत पर भी पडा. नए आर्थिक परिदृश्य और नई टेक्नोलोजी ने विश्व भर के युवाओं को जोड़ने का काम किया. दुनिया भर में हमारे युवा कामयाबी के नए कीर्तिमान गढ़ने लगे. बहुत तेजी से अन्य देशों के साथ आवागमन भी बढ़ने लगा. जब वे उन्नत देशों के साथ अपनी तुलना करते तो पाते कि हमारी तमाम खामियों के लिए हमारी राजनीति दोषी है. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हमारा लोकतंत्र भीतर से खोखला होता जा रहा है. उसमें वंशवाद है, भाई-भतीजावाद है, आम आदमी खस्ताहाल है. हमारे यहाँ आर्थिक सुधार लागू हुए लेकिन उनका सुफल केवल मुट्ठी भर लोगों ने चखा. लोकतांत्रिक पूंजीवाद की जगह हमने क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना पूंजीवाद विकसित किया. कहने को कोटा-परमिट राज ख़त्म जरूर हुआ लेकिन इन्स्पेक्टर राज अब भी दूसरे रूप में बरकरार है. कहाँ तो उम्मीद थी कि आर्थिक सुधारों की वजह से भ्रष्टाचार दूर होगा, कहाँ इस नव-पूंजीवाद ने भ्रष्टाचार को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया. इससे हमारे युवा वर्ग में व्यवस्था के प्रति जबरदस्त मोहभंग की स्थिति पैदा कर दी. शुरुआत में उसने राजनीति से पूरी तरह से मुख मोड़ लिया. लेकिन जब उसने देखा कि अपनी छद्म राजनीति की वजह से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितना नींचा देखना पड़ता है, तो उसने भी राजनीति में शिरकत करने का फैसला किया.
२००९ के आम चुनाव में राहुल गांधी देश के युवा वर्ग की आशाओं के केंद्र में थे. राहुल भी पार्टी और राजनीति में आमूल बदलाव की बात किया करते थे. लेकिन युवाओं ने जब देखा कि इन पांच वर्षों में कांग्रेस की हालत बद से बदतर हो गयी है, शासन में भ्रष्टाचार और जड़ें जमा रहा है और राहुल कोइ उम्मीद नहीं जगा पा रहे तो उनसे भी मोहभंग शुरू हुआ. इसी बीच उभरे अन्ना आन्दोलन और दिल्ली में बलात्कार के विरोध में सडकों में उमड़े युवाओं ने यह जता दिया कि अब वे चुप बैठने वाले नहीं हैं. इसी बीच युवाओं में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम सामने आया, जिसने गुजरात जैसे राज्य में शासन की नयी मिसाल कायम की थी. जिसने न सिर्फ विकास का नया मॉडल प्रस्तुत किया बल्कि राजनीति को भी अनुशासित किया था. लेकिन इसी दौर में अचानक मंच पर उभरे और अन्ना आन्दोलन से जन्मे अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से दिल्ली विधान सभा चुनाव में अप्रत्याशित कामयाबी दर्ज की, उसने भी यह साबित किया कि युवा अब राजनीति को सुधारने के लिए घर से बाहर निकल पडा है. लेकिन सत्ता के लिए केजरीवाल की अधीरता और सरकार चला पाने में उनकी विफलता ने यह भी सन्देश दिया कि केवल नेक इरादे होना ही पर्याप्त नहीं है, उसे अंजाम देने का अनुभव होना भी जरूरी है. इसलिए इस बार केजरीवाल को बुरी तरह से मुंह की खानी पडी. पंजाब ने उनकी लाज रख ली, वरना उसके तमाम बड़े नेताओं ने तो पार्टी की लुटिया पूरी तरह से डुबा दी थी. दूसरी तरफ युवाओं को मोदी में वे सब गुण दिखाई दिए, जिनकी उन्हें तलाश थी.
कुल मिला कर यह जीत युवाओं की जीत है. देश की राजनीति का ढर्रा बदल चुका है. पुराने फ़ॉर्मूले अप्रासंगिक हो चुके हैं. जाति-धर्म और साम्प्रदायिकता की जगह अब सिर्फ सुशासन और विकास की राजनीति चलेगी. जो काम करेगा, वह टिका रहेगा, जो छद्म मुद्दे उछालेगा, उसका कोई नामलेवा नहीं बचेगा. (अमर उजाला, २० मई, २०१४ से साभार)