रविवार, 21 सितंबर 2014

कूटनीति की मेज पर हिन्दी

भाषा/ गोविन्द सिंह        
भाषा के मोर्चे पर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसी रेखा खींच दी है, जिसके सामने अब तक की सारी रेखाएं छोटी पड़ गयी हैं. यह रेखा है कूटनीति की मेज पर हिन्दी की. राजनीति यदि जनपथ है तो कूटनीति राजपथ. कोई भाषा कूटनीति की भाषा यों ही नहीं बन जाती. उसे जनता की भाषा तो होना ही पड़ता है, साथ ही अभिजात्य वर्ग की भाषा भी बनना होता है. फ्रेंच भाषा को दुनिया भर में कूटनीति की भाषा के रूप में जाना जाता है तो सिर्फ इसीलिए कि वह दुनिया भर में अभिजात्य वर्ग की भाषा रही है. उसमें साहित्यिक ऊंचाई है तो नफासत भी. दुनिया के अनेक देशों तक उसकी पहुँच रही है. अमेरिका के उत्कर्ष के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे अंग्रेज़ी ने उसकी जगह लेने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक वह पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पायी है. औपनिवेशिक दासता झेल चुके देश ही उसे वैश्विक कूटनीति की भाषा बनाना चाहते हैं. भाषाई कूटनीति का दूसरा पक्ष यह है कि ज्यादातर स्वतंत्र-चेता देश अपनी भाषा में ही कूटनीति करना चाहते हैं. जबकि वर्चस्ववादी देश चाहते हैं कि उनकी भाषा वैश्विक कूटनीति की भाषा बने. आज अधिसंख्य ताकतवर देश अपनी भाषा में ही कूटनीति करते हैं. ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, चीन और जापान इनमें कुछ हैं. ऐसा नहीं है कि इन देशों के नेता अपने पड़ोसी देश की भाषा नहीं जानते. अपनी सामान्य बातचीत में भलेही वे अन्य भाषा में बात करते हों, लेकिन कूटनीति की मेज पर अपनी भाषा ही बोलते हैं, भलेही उसके लिए दुभाषिया ही क्यों न बैठाना पड़े. वे भारत में अपना राजदूत हिन्दी सिखा कर नहीं भेजते.
लेकिन भारत की स्थिति उल्टी रही है. यहाँ कूटनीतिक काबिलियत के लिए अंग्रेज़ी जानना जरूरी है. हमारे यहाँ यह आवाज उठती रही है कि हमें अपनी कूटनीति में अपनी राजभाषा अर्थात हिन्दी का इस्तेमाल करना चाहिए. आजादी से पहले इसमें कोई मतभेद नहीं था. लगभग आमराय थी कि स्वाधीन भारत को अपनी ही भाषा में सब काम करने चाहिए. लेकिन आजादी के बाद, जब हिन्दी-विरोध एक राजनीतिक हथियार बन गया, तब यह काम कुछ मुश्किल हो गया. इसमें सबसे बड़ा विरोध तो ब्यूरोक्रेसी की तरफ से ही आया, जो अपने मूल चरित्र में ही यथास्थितिवादी होती है. उसमें भी हमारी विदेश सेवा हमारी दासवृत्ति का सबसे प्रबल उदाहरण रही है. लम्बे अरसे तक उन्हीं युवाओं को विदेश सेवा में एंट्री मिलती थी, जो ऐसे चुनींदा स्कूलों से पढ़े होते थे, जहां पूरी तरह से अंग्रेज़ी संस्कार दिए जाते थे. उनका भाषाई उच्चारण, चाल-ढाल, खान-पान के तौर-तरीके पूरी तरह से अंग्रेज़ी की चाशनी में डुबोये होते थे. इसलिए आपको याद होगा कि पुराने राजनयिकों में सामंतों-रजवाड़ों के लोग, विदेशों से शिक्षित धनी-मानी लोग ही प्रायः मिलते हैं. आज़ादी के लगभग तीस साल बाद जब सिविल सेवा परीक्षा में सुधार हुए तब जाकर मध्यवर्गीय युवाओं को विदेश सेवा में जगह मिलने लगी. आशय यह है कि वे लोग क्योंकर हिन्दी जैसी जनभाषा को कूटनीति की भाषा बनने देते, जो अंग्रेज़ी संस्कारों में पले-बढ़े हों? इसलिए हिन्दी वालों की यह मांग बनी ही रही कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाया जाये.
उनकी यह हसरत तब पूरी हुई, जब 1977 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण दिया. यह भाषण शुरू में अंग्रेज़ी में लिखा गया था. जब अटलजी को यह भरोसा हो गया कि हिन्दी में भी भाषण दिया जा सकता है, तब अनुवाद करके पढ़ा गया. लेकिन आज तक हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा नहीं बन पायी है क्योंकि हमारी सरकार उसके जरूरी बंदोबस्त नहीं कर रही है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का प्रयोग दूसरी बार 23 नवम्बर, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने दक्षेस देशों के माले सम्मलेन में किया. इन दो प्रयासों के अतिरिक्त कोई और उदाहरण सामने नहीं आता, जब हमारे किसी नेता ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिन्दी में बोला हो. ये दो घटनाएं भी एक तरह से प्रतीकात्मक ही थीं, क्योंकि वास्तव में इनकी वजह से व्यवहार में कोई ख़ास सुधार नहीं आया.
लेकिन जब नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में आये सात पड़ोसी देशों के नेताओं के साथ हिन्दी में बातचीत की तो पहली बार लगा कि अब कूटनीति के अन्तःपुर में हिन्दी पहुँच रही है. उसके बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी हिन्दी में कामकाज शुरू किया. गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी संयुक्त राष्ट्र में गए तो हिन्दी में ही बोले. मोदी ने नेपाली संसद में हिन्दी में भाषण दिया, भूटानी संसद में हिन्दी में भाषण दिया. जापान में भी वे हिन्दी में ही बोले. वे न सिर्फ बोले बल्कि अपनी भाषा में बोलकर वहाँ के लोगों पर भारतीयता की छाप भी छोडी. अब वे संयुक्त राष्ट्र जा रहे हैं, फिर हिन्दी में बोलेंगे. अमेरिका, रूस और चीनी नेताओं के साथ भी वे हिन्दी में ही बोलने वाले हैं, ऐसी सूचना है. प्रधान मंत्री के इस कदम से न सिर्फ हिन्दी का भला होगा, बल्कि कूटनीति भी पटरी पर आयेगी. क्योंकि कूटनीतिक वार्ताओं में भाषा आपके देश और जनता का प्रतिनिधित्व करती है. उससे देश का सर ऊंचा होता है. देश के स्वाभिमान की भाषा कोई देशी भाषा ही हो सकती है. मोदी की पहल पर अनेक पूर्व विदेश सचिवों, राजनायिको की प्रतिक्रियाएं आयीं हैं. सबने इस कदम की सराहना ही की है. 
कूटनीति में भाषा की क्या अहमियत होती है, इसे समझने के लिए दो उदाहरण काफी होंगे. आजादी के तुरंत बाद विजयलक्ष्मी पंडित सोवियत संघ में भारत की राजदूत बनायी गयीं. वे 17 अगस्त, 1947 को मास्को में जोजेफ स्टालिन के पास अपना अंग्रेज़ी में लिखा प्रत्यय पत्र लेकर पहुंची तो स्टालिन ने उसकी भाषा पर आपत्ति की. कहा कि इसकी भाषा न आपके देश की है और न मेरे देश की है. तब कहते हैं कि रातोरात हिन्दी में लिखा पत्र दिल्ली से मास्को भेजा गया. लेकिन भारत के प्रति सोवियत नेताओं का दिल नहीं पसीजा. वे भारत को अंग्रेजों का पिट्ठू ही समझते रहे. ढाई साल तक विजयलक्ष्मी पंडित मास्को में रहीं, स्टालिन ने कभी उन्हें तवज्जो नहीं दी. चीनी प्रधानमंत्री चाओ एन लाई ने नेहरू से कहा कि काश आप अपनी भाषा में हमसे द्विपक्षीय मुद्दों पर बात कर पाते. नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था, तो उन्हें अपनी हाजिर जवाबी का सहारा लेना पडा, ‘सबसे बड़ी भाषा तो प्रेम की होती है’. सच बात यह है कि कूटनीति में प्रेम की भाषा नहीं चलती. कूटनीति की कामयाबी इसी में है कि आप अपनी बात मनवा लें. इसके लिए शायद किसी अन्य देश की भाषा की बजाय अपनी भाषा ज्यादा मुफीद होती है. बेहतर हो कि हमारे तमाम राजनेता, मंत्री, राजनयिक और अन्य ब्यूरोक्रेट अपने सरकारी कामों में हिन्दी का प्रयोग करें और राष्ट्रीय स्वाभिमान को बढायें. (अमर उजाला, २१ सितम्बर, २०१४ से साभार) 

रविवार, 14 सितंबर 2014

पत्रकारिता की भाषा में सुनामी का दौर

हिन्दी दिवस/ गोविन्द सिंह
यों तो परिवर्तन जीवन का नियम है और भाषा का भी अपना जीवन होता है. उसमें भी वक़्त के साथ परिवर्तन आते हैं. ‘उदन्त मार्तंड’ की भाषा आज एकदम अजीब-सी लगती है. कई-कई बार तो समझ में भी नहीं आती. लेकिन परिवर्तन जब स्वाभाविक न होकर एकदम सुनामी की तरह आता है तो चिंतित होना स्वाभाविक है. हिन्दी पत्रकारिता की भाषा के साथ भी पिछले 15-20 वर्षों में यही हुआ है. एक साथ इतने सारे परिवर्तन आये कि वे सब हजम नहीं हो पा रहे हैं.
अंग्रेज़ी से अनुवाद की मजबूरी तो हिन्दी पत्रकारिता के साथ शुरू से ही रही. जिस वजह से हिन्दी पत्रकारिता स्वतंत्र तरीके से कभी अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हो पायी. आजादी के बाद बड़े समाचार पत्र घरानों ने दिखाने के लिए एक-एक अखबार हिन्दी का भी ‘डाल’ लिया था, जिसके साथ सदैव दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहा. अंग्रेज़ी पत्रकारों की कॉपी को हिन्दी में अनुवाद की अनिवार्यता के कारण ही हिन्दी का मुहावरा विकसित नहीं हो पाया. ऐसे घराने भी थे, जो सिर्फ हिन्दी अखबार प्रकाशित करते थे, लेकिन वे सामर्थ्य में बहुत छोटे होने से कोई रुझान विकसित नहीं कर पाए. फिर भी 1990 तक हिन्दी का कुछ तो अपना चरित्र बचा हुआ था.
1987 में इंडिया टुडे का हिन्दी संस्करण निकला तो उसका नाम हिन्दी में न रख कर देवनागरी में भी वही रख दिया गया. इससे पहले भी ऐसे कुछ प्रयास हुए थे लेकिन सीधे-सीधे अंग्रेज़ी नाम को हिन्दी में रख देने से लगा कि हिन्दी के प्रति पत्र-स्वामियों का व्यवहार बदल गया है. उन्हें हिन्दी पर भरोसा नहीं था. यहाँ पहुँच कर पत्र-पत्रिकाओं की विषय-वस्तु पर उसका ब्रांड हावी होने लगा था. उसके बाद निकले संडे ऑब्जर्वर और संडे मेल ने भी यही किया. फिर तो सभी को जैसे पंख लग गए. टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह ने एक तरफ अपने अंग्रेज़ी अखबार का हिन्दी संस्करण निकालने की योजना बनाई तो दूसरी तरफ हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं को बंद करने की ठान ली. हिन्दी की पत्रिकाओं को अकाल मृत्यु देकर फिल्म फेयर और फेमिना को इन्हीं नामों से हिन्दी में निकालने की कोशिशें हुईं, जबकि हिन्दी की ‘माधुरी’ बहुत अच्छी पत्रिका थी. वर्ष दो हजार तक आते-आते यह प्रवृत्ति तेजी से आगे बढ़ी. अन्य घरानों को भी पंख लगे. नवभारत टाइम्स ने अपने संस्करणों, कालमों के नाम बदल कर अंग्रेज़ी में रखने शुरू कर दिए. खबरों और लेखों की भाषा में अधिक से अधिक अंग्रेज़ी शब्दों को घुसाने की कोशिश की. दैनिक भास्कर ने दो कदम आगे बढ़कर शीर्षकों में ज्यादा से ज्यादा शब्द अंग्रेज़ी के रखने शुरू कर दिए. यहाँ तक कि इन दो अखबारों ने शीर्षकों में रोमन लिपि को घुसाना भी शुरू कर दिया. यह काम चोरी-छिपे नहीं हुआ, बाकायदा घोषणाओं के साथ हुआ. इन अखबारों ने हिंगलिश के पक्ष में लेख लिखे और अपने प्रयोगों का औचित्य समझाया. चूंकि हिन्दी जगत में इन कुप्रयोगों पर कोई ख़ास विरोध नहीं हुआ, इसलिए अन्य अखबारों को लगा कि शायद यही सफलता का राजमार्ग है. जाहिर है वे भी इसी रास्ते पर चल पड़े. खबरों में थोड़ी-बहुत हिंगलिश को अपनाएँ तो बात फिर भी समझ में आती है, फीचर परिशिष्टों, सम्पादकीय पृष्ठों में भी जम कर हिंगलिश का इस्तेमाल होने लगा. ऐसा नहीं कि इससे भाषा सरल और बोधगम्य होती है, बल्कि इससे तो आप अपने अखबार को आम जनता से दूर ही ले जाते हैं. हाँ, इससे आपकी ब्रांडिंग जरूर होती है कि आप ऐसे पाठकों के अखबार हैं, जो अंग्रेजीदां हैं. यानी वे ‘अप-मार्केट’ हैं. यह प्रवृत्ति एक भाषा के लिए तो अपमानजनक है ही, उस समाज के लिए भी घातक है, जिसकी वह भाषा है. सहज रूप से होने वाले परिवर्तन का स्वागत होना चाहिए. लेकिन बनावटी बदलाव उचित नहीं है. लोग कह रहे हैं कि यह सहज विकास है. वास्तव में यह सहज नहीं है. इसके मूल में ‘लोभ’ है. यह एक फर्जी प्रवृत्ति है. इसका विरोध होना ही चाहिए. (samachar4media.com , १४ सितम्बर, २०१४ से)
http://samachar4media.com/senior-journalist-Govind-Singh-wrote-an-article-on-hindi.html

रविवार, 31 अगस्त 2014

आप सभी का आभार

२७ अगस्त को राष्ट्रपति के हाथों गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार मिलने के बाद से ही सोशल मीडिया में परिजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों, साथी-पत्रकारों, साथ काम कर चुके मित्रों, गुरुजनों और छात्रों के प्यार-भरे सन्देश पाकर मैं गदगद हूँ. आज के जमाने में एक लाख का पुरस्कार कोई ख़ास मायने नहीं रखता, फिर कोई पहली बार यह पुरस्कार नहीं मिल रहा, हमसे पहले ४८ लोगों को यह पुरस्कार मिल चुका है. मेरे साथ भी चार लोगों को मिला. लेकिन फिर भी मेरे शुभ चिंतकों ने जिस तरह की गर्मजोशी दिखाई है, वह मेरे लिए वाकई बेहद प्रेरक है. मैं आप सभी मित्रों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ.
यहाँ मैं उन गुरुजनों को याद करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ, जिनकी प्रेरणा से मैं लेखन और पत्रकारिता के मार्ग में प्रवृत्त हुआ. उनमें चंडीगढ़ के प्रो. महेंद्र प्रताप, प्रो. लक्ष्मी नारायण शर्मा, प्रो. मैथिली प्रसाद भारद्वाज और प्रो. वीरेंद्र मेहंदीरत्ता प्रमुख हैं. जिन्हें देख कर मेरे बालमन में लेखन के बीज पड़े, उन डॉ. प्रयाग दत्त जोशी को भी नमन. पढाई के दिनों से ही लेखन को जिन वरिष्ठ पत्रकारों ने प्रेरित किया उनमें दैनिक ट्रिब्यून के विजय सहगल, राधेश्याम शर्मा, वीर प्रताप के स्व. वीरेंद्र और स्वतंत्र पत्रकार केशवानंद ममगाईं प्रमुख थे. पत्रकारिता में आने के बाद विश्वनाथ सचदेव, कमर वहीद नकवी, राम कृपाल सिंह, काका हरिओम, गणेश मंत्री, मनमोहन सरल आदि का भरपूर स्नेह मिला. अपने संपादकों का मैं सदैव ऋणी रहूँगा जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया और भरपूर आजादी के साथ काम करने के अवसर दिए. डॉ. धर्मवीर भारती, स्व. नारायण दत्त, राजेंद्र माथुर, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, विष्णु खरे, सूर्य कान्त बाली, विद्यानिवास मिश्र, मधुसूदन आनंद, आलोक मेहता, लिया टरह्यून और  शशि शेखर प्रमुख हैं. बीच में मैं खबरिया चैनलों में भी भाग्य आजमाने चला गया, लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि मैं इसके लायक नहीं हूँ. इसलिए प्रिंट में लौट आया. यहाँ भी यदि श्री शशि शेखर मुझे स्पैन से उठाकर अमर उजाला न ले गए होते तो शायद मुख्यधारा पत्रकारिता में मेरा पुनर्वास न हो पाता. वे एक सख्त सम्पादक जरूर हैं, लेकिन काम करने की जो आजादी उन्होंने मुझे दी, उसके लिए मैं सदैव उनका आभारी रहूँगा. अमर उजाला के सम्पादकीय पेज पर हमने तरह-तरह के प्रयोग किये. मौक़ा पड़ने पर घनघोर दक्षिणपंथी से लेकर घनघोर वामपंथी तक हर विचारधारा के लेखकों को प्रकाशित किया. यह पेज सचमुच एक उदार पेज था. अमर उजाला जैसी आजादी और कहीं नहीं मिली. इसके लिए उसके मालिक स्व. अतुल माहेश्वरी जी की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है.
अंत में मैं अपने सहचर साथियों के प्रति भी आभार प्रकट करना चाहता हूँ. सर्वश्री सुभाष धूलिया, डॉ. रजनी कान्त पाण्डेय, अनूप सेठी, बाल मुकुंद सिन्हा, अरुण दीक्षित, अनंग पाल सिंह, प्रकाश हिन्दुस्तानी, संजय खाती, मुकुल, नीरेंद्र नागर, बलराम, मंजरी चतुर्वेदी, गिरिराज, सुरेश शर्मा, उपेन्द्र प्रसाद, कल्लोल चक्रवर्ती, चंद्रकांत सिंह, राजीव कटारा आदि. अग्रज देवेन्द्र मेवाड़ी, कथाकार बटरोही, पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल, प्रो. हरिमोहन शर्मा और प्रो. देव सिंह पोखरिया का स्नेह भी निरंतर मिलता रहा है. और भी बहुत-से मित्र हैं, जिनके प्रेम की डोर मुझे यहाँ तक खींच ले आयी.

मैं अपने चाहने वालों को यह यकीन दिलाना चाहता हूँ कि पुरस्कार में मिली रकम का इस्तेमाल मैं शिक्षा, पत्रकारिता और हिन्दी के उत्थान हेतु करूंगा. इसकी शुरुआत हो भी चुकी है. अपने गाँव, जहां आज भी सड़क नहीं पहुँच पायी है, उसके स्कूल राजकीय उच्च विद्यालय, सौगाँव के गरीब व होनहार बच्चों को ११ हजार रुपये की छात्रवृत्ति के रूप में. यह भविष्य में भी जारी रहेगी. और भी बहुत सी योजनायें मन में हैं. पता नहीं कहाँ तक पूरी हो पाती हैं! एक बार फिर से आभार.           

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

भारत-पाक: एक अंतहीन दुश्मनी

पड़ोस/ गोविन्द सिंह
मई में जब नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी तब सचमुच यह आशा बंधने लगी थी कि शायद अब भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सामान्य हो जायेंगे. भारत और पाकिस्तान में ही नहीं, सारी दुनिया में मोदी की पहल की सराहना हुई थी. हालांकि पाकिस्तानी कट्टरपंथी हलकों में नवाज शरीफ की भारत यात्रा का विरोध हुआ था और बाद में यह भी सवाल उठाया गया कि पाकिस्तान को इस यात्रा से क्या मिला? लेकिन कुल मिला कर पाकिस्तान और भारत के अवाम ने इसका खुले दिल से स्वागत किया. अपने पड़ोसियों को तवज्जो देने की मोदी की नीति की सराहना होने लगी. पाकिस्तानी जनता ने भी अपनी तमाम आशंकाओं को भुला कर मोदी की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से की, जिन्होंने दिल्ली-लाहौर के बीच बस चलाई थी. दोनों देशों की जनता के मन में आपसी रिश्तों के दिन बहुरने की आशाएं-आकांक्षाएं छलांगें मारने लगीं. लेकिन 25 अगस्त की प्रस्तावित सचिव-स्तरीय वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तानी उच्चायुक्त के कश्मीरी अलगाववादियों से मिलने और बदले में भारत द्वारा वार्ता को तोड़ देने से तमाम आशाएं धरी की धरी रह गयी हैं.

दोनों तरफ की जनता की निराशा की वजह भी है. सबसे बड़ी वजह तो यही है कि दोनों देशों का विभाजन निहायत कृत्रिम है. हजारों वर्षों से एक साथ रही जनता को एक दिन अचानक मजहब के आधार पर आप दो देशों में बाँट देंगे तो ऐसा ही होगा. बंटवारे के वक़्त हुए खून खराबे और चार-चार बार युद्धों में हज़ारों लोगों के मारे जाने के बावजूद दोनों देशों की जनता के आपस में एक-दूसरे के प्रति नफरत का भाव उतना नहीं है, जितना कि होना चाहिए. मसलन चीन और भारत के बीच १९६२ में हुई लड़ाई के बाद आपसी रिश्तों की बर्फ १९७८ में जाकर पिघलनी शुरू हुई. लेकिन १९९९ में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध के तत्काल बाद वार्ता शुरू हो गयी थी और २००१ में मुशर्रफ आगरा भी आ गए थे. यानी दोनों देशों के रिश्ते वैसे हैं ही नहीं जैसे दो दुश्मन देशों के बीच होते हैं. सरकारों के स्तर पर भलेही पाकिस्तान हमारा दुश्मन हो लेकिन जनता के स्तर पर वह हमारा सहोदर है और रहेगा.
इसलिए जब भी भारत और पाकिस्तान के अवाम के आपसी रिश्तो की बात आती है, सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह की याद आती है, जिसके नायक पागल बिशन सिंह को अचानक बताया जाता है कि उसका गाँव अब पाकिस्तान के हिस्से में चला गया है, इसलिए उसे हिन्दुस्तान जाना होगा क्योंकि वह मुसलमान नहीं है. तब वह नासमझ देश के बंटवारे पर एक अजीब-सी गाली निकालता है, जिसका कोई अर्थ नहीं है,  और अंत में वह दोनों देशों की सरहद के बीचो-बीच प्राण त्याग देता है. बिशन सिंह की मौत वास्तव में भारत के बंटवारे पर एक करारा तमाचा है. इसलिए जब बर्लिन की दीवार गिरी और दोनों जर्मनियों को एक हो जाना पडा तो भारत-पाकिस्तान में भी यह आशा जगी कि एक दिन हम भी एक होंगे. यहाँ तक कि लाल कृष्ण आडवाणी तक को यह कहते सुना गया कि एक दिन भारत और पाक भी एक हो सकते हैं.
जिन्ना ने जिस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर सवार होकर पाकिस्तान की निर्माण करवाया था, वह अब ध्वस्त हो चुका है. खुद पाकिस्तान के भीतर अनेक तरह की राष्ट्रीयताएँ सर उठाती रहती हैं. उसे एक रखने के लिए कुछ न कुछ मुद्दा तो चाहिए. इसलिए वहाँ के कट्टरपंथियों को, वहाँ की फ़ौज को इसी में अपना भला दिखता है कि भारत के साथ हमेशा एक तनातनी बनी रहे. कश्मीर ही वह मसला है, जिसके जरिये वे अमन की तमाम कोशिशों पर पानी फेर सकते हैं. वही वे बार-बार करते भी हैं. वरना जब दोनों देश कश्मीर को द्विपक्षीय मसला मां चुके हैं तो हुर्रियत नेताओं को बीच में लाने का क्या औचित्य है?
लेकिन दोनों देशों की सरकारें, फौजें और कट्टरपंथी जमातें चाहे जितनी कोशिश कर लें, दोनों देशों की अवाम की आशाओं पर पानी नहीं फेर सकतीं. तमाम युद्धों के बावजूद हर साल वाघा बॉर्डर पर मोमबत्ती जलाने वाले, एक-दूसरे देश में जाकर नाटक करने वाले, गीत-संगीत की महफ़िल सजाने वाले, मुशायरे जमाने वाले, मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में आकर हंसने-हंसाने वाले, फिल्मों में काम करने वाले अदाकारों के होंसले कभी कम न होंगे. साहित्य-संस्कृति ही है जो देश-काल से ऊपर उठकर जनता की आवाज को बुलंद करती है. इसलिए सरकारों के स्तर पर भलेही बातचीत ठहर गयी हो, लेकिन जनता के दिलों में गर्मजोशी हमेशा बनी रहेगी.
(दैनिक जागरण, २४ अगस्त, २०१४ से साभार)