मंगलवार, 24 मई 2016

आत्मसम्मान बनाम मानहानि

मीडिया कानून/ गोविन्द सिंह
देश की सर्वोच्च अदालत ने आपराधिक मानहानि क़ानून को बरकरार रख कर जहां एक तरफ बड़बोले नेताओं को किसी के भी खिलाफ निराधार आरोप लगाने से हतोत्साहित किया है, वहीं अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों को भी निराश किया है. हालांकि दोनों के सन्दर्भ और मकसद अलग-अलग हैं फिर भी आज के अराजक होते राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह फैसला उचित ही जान पड़ता है.
हाल के वर्षों में यह देखने में आया है कि अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने और अपने प्रतिद्वंद्वियों से निबटने के लिए नेता गण कुछ भी अनर्गल आरोप लगा देते हैं. इससे न सिर्फ अगले का राजनीतिक करियर चौपट हो सकता है अपितु जीवन भी खतरे में पद सकता है. यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है. संयोग से हमारे समय के तीन सर्वाधिक मुखर राजनेता अरविन्द केजरीवाल, सुब्रह्मण्य स्वामी और राहुल गांधी ने सर्वोच्च अदालत के समक्ष ये गुहार लगाई थी कि ‘मानहानि सिद्ध होने पर उन्हें सिर्फ जुर्माना किया जाए। सजा न दी जाए। मानहानि को अपराध न माना जाए’। यह बताने की जरूरत नहीं कि इन तीनों ही नेताओं के खिलाफ दिल्ली की निचली अदालतों में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बारे में अनाप-शनाप आरोप लगाने के लिए मुकदमे चल रहे हैं. चूंकि आरोप लगाते समय इन्होंने सोचा नहीं कि जो आरोप वे लगा रहे हैं, वह प्रमाणित किया भी जा सकता है या नहीं, इसलिए अब जब अदालत में आरोप सिद्ध करने में इन्हें नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगा रहे हैं कि उनकी सजा कम की जाए.
दरअसल अपने देश में, खासकर चुनाव के वक़्त राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ कुछ भी आरोप लगाने की नेताओं को आदत-सी पड़ गयी है. पहले कुछ बडबोले और मसखरे किस्म के नेता ही इस तरह के आरोप लगाया करते थे, लिहाजा कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता था. लेकिन गंभीर और संजीदा किस्म के या बड़े कद के नेता भी अब ऐसा करने लगे हैं. यह प्रवृत्ति राजनीति से होकर समाज के निचले गलियारों तक पहुँचने लगी है. इस तरह यह एक गंभीर बीमारी का रूप धारण कर रही है. यह उसी तरह से है, जैसे महाभारत युद्ध के दौरान अगर कोई मामूली सैनिक ‘अश्वत्थामा हतः...’ कहता तो शायद गुरु द्रोणाचार्य नहीं मानते, लेकिन जब दबे स्वर में ही सही, युधिष्ठिर ने यह बात कही तो द्रोण ने मान लिया कि उनका पुत्र मारा गया है. नतीजा उनकी अपनी मौत. जब जिम्मेदार नेता अपने विरोधियों के खिलाफ झूठे, निराधार और दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाते हैं तो जनता सहज ही उन पर विश्वास कर लेती है, प्रचार माध्यम भी बिना आरोपों की तस्दीक किये प्रकाशित-प्रसारित कर देते हैं. इस आलोक में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय स्वागतयोग्य है. कम से कम इससे बडबोले नेताओं की जबान पर तो लगाम लगेगी.
दूसरा पक्ष अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्षधर लोगों का है, जो चाहते हैं कि अभिव्यक्ति पर किसी तरह की लगाम न लगे. यह विश्वव्यापी अभियान का हिस्सा है. दुनिया भर में मानहानि को क़ानून के दायरे से बाहर करने की मुहिम चली हुई है. इन्टरनेट पर अपने मन की भड़ास निकालने वाले लोग इसकी अगुवाई कर रहे हैं. गत वर्ष भारत में सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 66-ए को समाप्त करवाकर इन्होंने एक बड़ी लड़ाई जीती है. मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी चाहता है कि मानहानि क़ानून समाप्त हो या कम से कम इसकी धार कुछ कुंद की जाए. क्योंकि नेताओं, नौकरशाहों और सरकारों के खिलाफ बोलने वालों पर ही नहीं, बोले हुए को छापने वाले मीडिया पर भी खतरा मंडराता रहता है. हालांकि मानहानि का सम्बन्ध हर किसी से है, लेकिन निशाना तो अंततः प्रेस को ही बनाया जाता है. वर्ष 1987-88 में जब देश में बोफोर्स दलाली काण्ड की आग लगी हुई थी, राजीव गांधी से इंडियन एक्सप्रेस में रोज दस सवाल पूछे जा रहे थे, तब राजीव गांधी की सरकार मानहानि विधेयक-1988 लेकर आयी थी, जिसके खिलाफ देश भर का मीडिया लामबंद हो गया था. वह विधेयक सचमुच प्रेस के प्रति अत्यंत क्रूर था. सरकार के घोर समर्थक मीडिया घराने भी इस विधेयक के विरोध में आ खड़े हुए. तब एक स्वर से तमाम विपक्षी दलों और मीडिया ने कहा था कि जब हमारे पास भारतीय दंड संहिता में पहले ही मानहानि क़ानून मौजूद है तो संविधान संशोधन की क्या जरूरत है? अंततः राजीव गांधी को वह विधेयक वापस लेना पड़ा. इससे पहले 1982 में बिहार प्रेस बिल में भी कुछ ऐसे ही प्रावधान थे, जब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने प्रेस पर नकेल लगाने की कोशिश की थी. उसका भी देश भर में विरोध हुआ था. और तब जाकर वह बिल भी वापस लिया गया था. यानी जब-जब प्रेस को निशाना बनाकर उस पर नकेल कसने की कोशिश की गयी, तब-तब देश की जनता ने, समूचे प्रेस ने उसका मुंहतोड़ जवाब दिया था.
भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 को अमूमन उतना क्रूर नहीं माना जाता. धारा 499 में मानहानि का अर्थ स्पष्ट किया गया है तो धारा 500 में मानहानि करने पर दंड का प्रावधान है. 499 के मुताबिक़ दुर्भावना के साथ बोले गए या लिखे गए शब्दों या चित्रों या संकेतों द्वारा लांछन लगाकर किसी व्यक्ति की इज्जत या ख्याति पर हमला किया जाता है और उससे उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ता है, तब मानहानि होती है, जो विधिक तौर पर दंडनीय अपराध है. लेकिन जब यही आरोप लोक हित को ध्यान में रख कर या सद्भावना के साथ लगाया जाता है, तो वह मानहानि के दायरे में नहीं आता. यदि किसी व्यक्ति का अपराध साबित हो जाता है, उसे दो वर्ष की सजा का प्रावधान है.

अरविन्द केजरीवाल का कहना था कि लार्ड मैकाले के इस औपनिवेशिक क़ानून को ख़त्म कर देना चाहिए. यह बात सही है कि ये क़ानून अंग्रेज़ी हुकूमत की रक्षा के लिए बनाए गए थे. तब इन कानूनों का जमकर इस्तेमाल भी होता था. आजादी के बाद भी आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने इसे ढाल की तरह इस्तेमाल किया था. व्यक्तियों के खिलाफ भी और प्रेस के खिलाफ भी. दूर क्यों जाएँ, स्वयं अरविन्द केजरीवाल ने सत्ता में आते ही मीडिया को इन कानूनों की घुडकी दिखाई थी. वह बात अलग है कि जल्दी ही वे संभल गए और आदेश वापस लिया. यानी सत्ता में बैठा व्यक्ति किसी क़ानून का कैसा इस्तेमाल करेगा, कहना मुश्किल है. लेकिन जैसा कि सर्वोच्च अदालत का कहना है, केवल इस आशंका पर किसी को भी किसी के आत्मसम्मान पर हमला करने का अधिकार नहीं मिल जाता. यह ठीक है कि यह औपनिवेशिक युग का क़ानून है. लेकिन संविधान के अनुच्छेद 21 के मुताबिक़ आत्म-प्रतिष्ठा भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है. व्यक्ति के आत्मसम्मान को बचाए रखना भी अभिव्यक्ति की आज़ादी के समान ही महत्वपूर्ण है. इसलिए बेलगाम होते लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ न कुछ प्रावधान तो होना ही चाहिए. (अमर उजाला, 24 मई, २०१६ को प्रकाशित लेख का विस्तृत रूप)            

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

Genuine intent, sound policy must to convince natives to return home

Uttarakhand/ Govind Singh
The Tribune, February 10, 2016
Uttarakhand has suffered at the hands of its own political leadership. Neglect by successive governments and migration have caused enormous damage to the fortunes of the state. The economic condition of the household forced the working age group youths to leave their villages to earn a livelihood in other states or in the plains of Uttarakhand. Besides, inequitable distribution of resources, development dividends and income opportunities also forced hill people to migrate to places with better opportunities and facilities. A large number of people from Uttarakhand, especially from remote areas, are serving in armed forces and an equally large number of ex-servicemen are living in the state. These serving armed forces personnel as well as ex-servicemen are either keen to shift or have shifted their homes to the plains in the state in the absence of good basic facilities in the hill areas. It is an uphill task for the state government to encourage and convince migrated people to return to their hill villages.
‘Hitto Pahad’ is a populist slogan with political overtones that could have a far-reaching impact. But the question is that why is it being used now? Why the Uttarakhand government feels that it is now necessary that migrated natives return to their hill villages. Does the state government have a policy to invite and encourage natives to return to their hill villages or towns? A genuine intent, a convincing policy and proper propagation of the “Hitto Pahad” programme only can make it appealing and meaningful.
When every politician is shifting his base to the plains, when every bureaucrat, teacher, government employee and ex-serviceman is buying a piece of land in places such as Haldwani, Kotdwar, Ramnagar, Haridwar or Dehradun, why this clamour for “Hitto Pahad? When no employee, teacher or bureaucrat wants to serve in the hills and even those who were born and brought up there don’t want to stay there, why this emotional appealing?
A mere slogan may not succeed in convincing the migrated Uttarakhandis to return to their hill villages. The hill region has been systematically neglected over the decades and the people here live a hard life amid insufficient basic amenities. Their own leaders have deprived the people in the hills of basic facilities of education and health and a good road network. The discriminatory policies of successive governments have made their life miserable and vulnerable. The land prices in the Terai and Bhabar areas have been soaring due to continuous migration from the hills. With every passing day, hill villages are becoming ghostly ghettos. Almora and Pauri Garhwal districts are the worst affected by migration as people are still leaving their villages in search of jobs and amenities.
Uttarakhand was created with the sole objective of giving the neglected region a better deal in terms of overall economic development. When Uttarakhand was carved out of Uttar Pradesh 15 years ago, its population was 85 lakh. It was then estimated that about the same number of Uttarakhandis were living outside the state. A large number of natives living in different parts of the country were in one way or the other involved in the movement for the creation of Uttarakhand. Most of them have their roots in the hill villages. They have sweet memories of their traditional culture and language and are emotionally attached to their villages. But they are disappointed when they visit their native places and find no near and dear one or old neighbours there. Most of the villagers have shifted to the nearby towns. Even armed forces personnel don’t visit their native villages during their annual leave. Most of the ex-servicemen have migrated to towns in the plains of the state. Only old people and widows are seen in the hill villages, agricultural land is untilled and barren, schools have fewer students and cattle are no longer reared with interest. The village life is in a state of total neglect.
Uttarakhand is quite rich in natural resources such as ever flowing rivers, beautiful lakes, snow-clad mountains, lush green forests with medicinal herbs, tempting valleys and a serene climate. People living in the hills have their own distinct culture. Unfortunately, the complaint of the gains of development not reaching the hill region of the state still persists. People had demanded a separate state with a view to making a better use of resources for their development. They had thought that the policies for development would no longer be framed in Lucknow or New Delhi, but in Uttarakhand, by their own people. The villagers would be happier, prosperous and self-sufficient and the state having immense natural resources would be economically vibrant. Their culture and traditions would flourish in the new state under a government of their choosing.
However, during the past 15 years, the successive state governments have neglected the development agenda and today people living in the hills are disappointed and alienated. The villages in the hill districts are being deserted continuously. More than 2,000 villages are totally deserted and an equal number is on the verge of extinction. The basic amenities such as health, education and transportation are in a state of disarray.
The migration of people from the hills is not a new phenomenon in Uttarakhand. People have been migrating in search of livelihood right from the British Raj period. But the current round of migration is not only for livelihood. The current large-scale migration could be checked only with the holistic economic development of the state by making people stakeholders. ‘Hitto Pahad’ could prove to be a well intended slogan if the government seriously undertakes to address the concerns of the people and fulfil their aspirations. (Courtesy: The Tribune)

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

ऐसे थे हमारे गुरु भारद्वाज जी

संस्मरण/ गोविन्द सिंह 
तीस तारीख की सुबह देहरादून में था. कोई दस बजे होंगे. दून विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में एक बैठक में जाने को तैयार हो ही रहा था कि तभी शिमला से अपने बालसखा डॉ. रजनी कांत पाण्डेय का फ़ोन आया. स्क्रीन पर उसका नाम देख दिल की धड़कन कुछ तेज हुई. वह ऐसे ही फोन नहीं करता. क्या बात होगी! तभी उस तरफ से आवाज आयी कि डॉ भारद्वाज नहीं रहे. दिल में गहरे तक चुभ गए ये शब्द. 1978 से 1981 तक उनकी कक्षाओं में बिताये तीन वर्ष और उसके बाद के ये 35 साल एक ही झटके में आँखों के भीतर से बाहर आने को जैसे धक्के मारने लगे. अभी 15 दिन पहले ही पांडे ने बताया था कि ‘डॉ भारद्वाज की तबियत ठीक नहीं है. पीजीआई में भरती हैं. मौक़ा मिले तो दर्शन कर जाओ. कैंसर है. पहले भी महीने भर अस्पताल हो आये हैं. इस बार कुछ ज्यादा ही खतरा लग रहा है.’ 17 मार्च को कुरुक्षेत्र गया तो उनके चरण छूने चंडीगढ़ भी हो आया, अपने एक और सहपाठी डॉ. सुखपाल वर्णी के साथ. तब डॉ. साहब को देख बड़ा कष्ट हुआ. जिन्दगी की जंग लड़ रहे थे. बहुत छटपटा रहे थे. फिर भी एक हलकी-सी मुस्कान हमारी तरफ बिखेर गए. बहन संगीता अमेरिका से पापा की सेवा के लिए आयी हुई थी. उसने पहले ही आगाह कर दिया था कि बाहरी लोगों का अन्दर आना मना है. इसलिए दूर से ही देख लेना. हमने वैसा ही किया. वार्ड के बाहर ही आंटी जी से हाल-चाल लेते रहे. फिर लौट आये. आज पांडे के शब्दों से जहां दिल को गहरा झटका लगा, वहीं एक भाव यह भी आया कि चलो डॉ. साहब को कष्ट से मुक्ति मिली.   
1978 की जुलाई में हमने पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एमए प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया. जिन प्राध्यापकों का मार्गदर्शन मिला, उनमें प्रो. मैथिली प्रसाद भारद्वाज भी एक थे. छोटा कद और दुबली काठी. भीड़ में जाएँ तो खो जाएँ. लेकिन क्लास में पढ़ाने को खड़े होते तो चारों तरफ खामोशी छा जाती. ऐसे अनुशासित और प्रतिबद्ध शिक्षक कभी नहीं देखे. उन्होंने हमें बिहारी पढ़ाया, दिनकर की उर्वशी पढाई, और पढ़ाया काव्यशास्त्र. एम फिल में उनकी पढाई शोध प्रविधि आज तक काम आ रही है. बिहारी का मांसल प्रेम हो या उर्वशी का कामाध्यात्म, वे जैसे प्याज के छिलकों की तरह से अर्थ की परतें निकालते जाते. कई बार लगता कि वे साहित्य नहीं, समाजशास्त्र पढ़ा रहे हैं. बिहारी को पढ़ते हुए छात्र-छात्राएं आँखें नींची कर लेते. लेकिन भारद्वाज जी के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती. वे बार बार कहते, ‘नाव यू आर एडल्ट, यू हैव एवरी राईट टु नो अबाउट सेक्स.’ पाश्चात्य काव्यशास्त्र के वे गहरे पारखी थे. यदि वे न होते तो हम लोग पाश्चात्य काव्य दर्शन से अनभिज्ञ ही रहते. उनका ज्ञान हिन्दी की किताबें पढ़कर हासिल किया हुआ ज्ञान नहीं था, सीधे अंग्रेज़ी की मूल किताबों से प्राप्त ज्ञान था. इसलिए अक्सर हिन्दी की कक्षा में भी वे कई बार अंग्रेज़ी में समझाते हुए मिलते. अच्छा ही हुआ कि उन्होंने अपने नोट्स को तरतीब देते हुए बाद में किताबें छपवाईं. पाश्चात्य काव्यशास्त्र के सिद्धांत और शोध प्रविधि हिन्दी में अपनी तरह की श्रेष्ठ पुस्तकें हैं.  
हिन्दी की दुनिया में वे एक अपरिचित नाम थे क्योंकि साहित्यिक खेमेबाजी में उनकी दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन छात्रों के लिए वे एक श्रेष्ठ अध्यापक थे. कक्षा में उन्होंने कभी किसी छात्र को लिबर्टी नहीं लेने दी. कोइ चुन तक नहीं कर सकता था. हम जैसे छात्र जब उनके करीब जाने की कोशिश करते तो वे जैसे दूर होकर कहते कि बच्चू, बिना मेहनत के मेरे पास मत फटकना. वे कहते भी कि पढाई-लिखाई के लिए मेरे पास कभी भी आ सकते हो, लेकिन फ़ालतू बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है. वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य रहे थे. मध्यकालीन रोमांस पर उनका काम था. एक अध्यापक के तौर पर वे हमेशा अप टू डेट रहते थे. बेहद सख्त अध्यापक थे. समय के हमेशा पाबन्द. उनका लेक्चर कभी 45 मिनट से एक मिनट भी कम नहीं हुआ. वे पहले ही कह देते, जिसने नहीं पढ़ना हो, वह कक्षा से चला जाये. हाजिरी लग जायेगी लेकिन और छात्रों को डिस्टर्ब न करे. अत्यधिक अनुशासनप्रिय होने के कारण ज्यादातर विद्यार्थी उनके करीब जाने में घबराते. वे हिमाचल के चंबा के मूल निवासी थे. पहाड़ों की सादगी उन्हें विरासत में मिली थी.
एक बार विभाग में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ. प्राध्यापकों ने भी कुछ न कुछ बोला या कविता-गीत गाया. उनका नंबर आया तो पहले उन्होंने सीटी बजाने की कला पर पांच मिनट व्याख्यान दिया. उसके बाद सीटी के जरिये “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा..” वाला गाना गया. मैंने इससे पहले किसी व्यक्ति को इतना सुरीला गीत और वह भी सीटी के जरिये गाते नहीं सुना था. सचमुच उन्होंने इतना मधुर गाया कि हमने उसके बाद उनकी सख्त अध्यापक की छवि अपने मन से निकाल फेंकी.
यह 1078-79 की बात है. तब देश में जनता पार्टी की सरकार थी. प्राध्यापकों की राजनीति में जनसंघ वालों के अच्छे दिन आये हुए थे. प्रो. भारद्वाज घोर मार्क्सवादी थे. इसलिए कुछ उखड़े-उखड़े-से लगते थे. विभागाध्यक्ष डॉ. धर्मपाल मैनी परम्परावादी थे. उनसे उनकी ख़ास नहीं बनती थी. इसलिए प्रो. भारद्वाज या तो क्लास में होते या अपने कमरे में पढ़ते-लिखते हुए मिलते. अध्यक्ष के दरबार में बिलकुल हाजिरी नहीं लगाते. मेरे जैसे कुछ छात्र, जो हर गतिविधि में भाग लेते, वे स्वाभाविक रूप से अध्यक्ष के ग्रुप में चले गए. उन दिनों मैनी जी के गुट में युवा लेक्चरर डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा भी थे. वे कठिन भाषा के धनी थे. सहज बातचीत में भी अत्यंत कठिन भाषा का प्रयोग करते. हम उनकी भाषा की नक़ल करने की असफल कोशिश किया करते. वे ही सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रभारी हुआ करते थे. हम लोगों के वही सरपरस्त थे. हमें बहुत प्यार देते. हम यानी मैं, रजनीकांत पांडे, सुखपाल वर्णी, हमसे वरिष्ठ राकेश मल्हन और कुछ लडकियां. एमए द्वितीय वर्ष में इन लोगों ने मुझे अध्यक्ष का चुनाव लडवा दिया और मैं भारी बहुमत से जीत भी गया. इस घटना के बाद हम पूरी तरह से मैनी जी के गुट के हो गए. लिहाजा बाक़ी प्राध्यापक हमें ख़ास तवज्जो नहीं देते. हालांकि भारद्वाज जी को इस गुटबाजी से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन हमें खुद ही लगता कि शायद कहीं इसी वजह से वे हमसे कटे-कटे न रहते हों.
यानी 1980 में एमए कर चुकने तक भारद्वाज जी के साथ हमारा सम्बन्ध सामान्य छात्र-शिक्षक जैसा ही था. मुझे याद नहीं पड़ता कि हम कभी उनके घर गए हों. न मैं, न पाण्डेय. लेकिन उन्हीं दिनों एक अप्रिय विवाद हुआ. मेरा सर्वप्रिय दोस्त रजनी कांत पाण्डेय एमए करके अपने घर चला गया. उसके पिताजी का ट्रांसफ़र मेरठ हो गया था. वह भी वहीं चला गया. जुलाई में मैंने उसे चिट्ठी लिखी कि मेरठ में क्या करोगे, एम फिल की प्रवेश परीक्षा होने वाली है. तुम भी आवेदन कर दो. उसका मन नहीं था. फिर भी उसने आवेदन कर दिया. परीक्षा हुई, इंटरव्यू हुआ. 15 सीटें थीं. रजनी कांत का नंबर नहीं आया. हमें आश्चर्य हुआ. वह इतना गया-बीता भी नहीं था कि 15 में भी न आ सके! हमने लक्ष्मी नारायण शर्मा जी से बात की. उन्होंने संकेत दिया कि रजनी का नंबर तो चुने गए छात्रों में था पर पता नहीं क्यों अंतिम सूची में रह गया. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि शायद भारद्वाज जी कुछ बता सकें. भारद्वाज जी के पास जाने में हमें डर लगता था. पता नहीं क्या सोचें?
मरता क्या न करता. हम दोनों भारद्वाज जी के पास गए. उन्होंने शाम को घर पर बुलाया. पता चला कि रजनी का नाम जानबूझ कर बाहर कर दिया गया था. हमें आश्चर्य हुआ कि मैनी जी तो हमें बहुत चाहते थे. रजनी को भी वे अच्छा विद्यार्थी मानते थे, फिर उनके मन में ऐसी क्या ग्रंथि रह गयी कि एक योग्य विद्यार्थी का नाम ही सूची से गायब कर दिया? मैनी जी कुछ भी सुनने को राजी नहीं थे. दूर-दूर तक कोई कारण समझ में नहीं आया. रजनी उदास हो गया. लक्ष्मी जी सिर्फ लेक्चरर ही थे, इसलिए बहुत ज्यादा साथ नहीं दे सकते थे. मैनी जी के प्रति सम्मान होते हुए भी उनके साथ खुल कर लड़ाई लड़ी जानी थी. कौन साथ दे! मैं कक्षा में प्रथम था, सबकी नजर में एक आज्ञाकारी बालक. लड़ने-भिड़ने का मेरा स्वभाव नहीं था. रजनी ने अपने पिताजी को चिट्ठी लिखी कि क्या करूं? अन्याय हुआ है. अन्याय का प्रतिकार करूं कि नहीं. उसके पिताजी फ़ौज में बटालियन पंडित थे. उनका उत्तर आ गया. लड़ाई से पीछे नहीं हटना. तब एकमात्र सहारा बने प्रो. भारद्वाज. उन्होंने न जाने कितनी चिट्ठियाँ लिखवाईं. हम दोनों रोज विभाग जाते ही छात्र नेताओं से मिलते, अध्यापक नेताओं से मिलते, वीसी ऑफिस जाते, सीनेटरों से मिलते. फिर शाम को प्रो भारद्वाज को रिपोर्ट देते. हमारे पास वे सारे दस्तावेज थे, जिनसे साबित होता था कि रजनी के साथ अन्याय हुआ है. वीसी राम चंदर पॉल, एसवीसी डीडी ज्योति, डीयूआई गोसल साहब, प्रो. वीसी पांडे, सीनेटर सत्यपाल जैन सबने मैनी जी को मनाया कि मान जाओ, क्यों बच्चे के साथ अन्याय कर रहे हो? लेकिन मैनी जी नहीं माने. उन्होंने कहा कि इसे रखना है तो मैं इस्तीफा दे दूंगा. हालांकि उनके पास इसके पीछे कोई कारण नहीं था. तब अंत में जैन साहब (सत्यपाल जैन) ने किसी हाई कोर्ट का एक केस लाकर वीसी को दिखाया कि कोर्ट में जायेंगे तो आप फँस जायेंगे. भलाई इसी में है कि रजनी को दाखिला दे दो. तब जाकर वीसी ने मैनी जी को बुलाकर रजनी को एडमिशन देने का आदेश दिया. फिर भी रजनी को बुलाकर कहा गया कि पहले गुरूजी से माफी मांगनी होगी, ताकि उन्हें बुरा न लगे. ऐसा ही किया गया. इस लड़ाई में लगभग दो महीने लग गए. लेकिन एडमिशन हुआ. और हमारी पढाई भी तभी शुरू हो पाई.
इस लड़ाई से जहां हम मैनी जी से दूर हो गए, वहीं भारद्वाज जी के रूप में एक नए और सच्चे मार्गदर्शक गुरु मिल गए. उन्होंने अपने हिस्से की मेरी हाजिरी भी पूरी कर दी. अन्य अध्यापकों के बीच भी हमारी छवि सुधारने का काम किया. इस बीच हम उनके घर के स्थायी सदस्य बन गए. उनकी एकमात्र बेटी संगीता तब शायद 11वी में पढ़ती थी. गुरुमाता भी हमें बहुत स्नेह देने लगीं. इस तरह हमने एमफिल किया और दोनों को ही नौकरियाँ भी एमफिल करते करते मिल गयीं. इस तरह हमारा चंडीगढ़ छूट गया.
लेकिन बाद में भी प्रो. भारद्वाज का मार्गदर्शन निरंतर मिलता रहा. रजनी ने तो उनके निर्देशन में ही पीएच डी भी की. जब मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप में प्रशिक्षार्थी पत्रकार बन कर मुंबई चला गया तो एक बार वे सपरिवार मुंबई भी आये. मैंने कहा कि किसी गेस्ट हाउस में कमरा बुक करवाने का जुगाड़ करता हूँ तो उन्होंने सख्त मना कर दिया. बोले हम तुम्हारे साथ ही रहेंगे. मैं वडाला की झोपडपट्टी से सटी साल्ट लैब के मजदूरों की कॉलोनी में रहता था, छोटी सी चाल में. एक ही कमरा था. टॉयलेट-बाथरूम भी बाहर था. हमने फर्श में ही दरी-चादर बिछाई और सब साथ ही सो गए. संगीता को अटपटा लगा तो बोले कि ये ही जीवन की सच्चाई है. वे बहुत व्यावहारिक थे. आलस्य उनमें बिलकुल भी नहीं था. खाना बहुत अच्छा बनाते थे. अनेक बार हमें भी खिलाया. बेहद सात्विक. जब भी मैं नौकरी बदलता, उन्हें जरूर सूचित करता. कई बार उन्हें लगता कि मैं शायद फिजूल ही उछलकूद कर रहा हूँ. इसलिए पूछ लेते कि मैं तरक्की के लिए नौकरी बदल रहा हूँ या यूं ही? अमर उजाला में कार्यकारी सम्पादक हुआ तो मैंने उनसे कुछ संस्मरण लिखवाए. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और मुल्क राज आनंद पर उन्होंने बेहतरीन संस्मरण लिखे, जिन्हें हमने छापा. नवम्बर 2012 में मेरे बेटे पुरु की शादी चंडीगढ़ में हुई तो वे रात एक बजे तक बैठे रहे और हम सबसे गप्प करते रहे.   
ऐसे गुरु कहाँ मिलते हैं? रजनी कांत पाण्डेय निस्संदेह भाग्यशाली रहे कि उन्हें न सिर्फ भारद्वाज जी जैसा गाइड मिला, अपितु उनका विश्वास भी प्राप्त हुआ. इससे भी बड़ी बात यह कि अंतिम समय में प्रो. भारद्वाज की सेवा का अवसर भी उसे मिला. मेरा विश्वास रहा है कि यदि भारद्वाज जी जैसा गुरु न मिला होता तो रजनी की ऊर्जा चैनलाइज नहीं हो पाती. यह भी विधि का विधान ही था कि अंतिम समय में रजनी उनके पास रहा. (इस संस्मरण का संपादित संक्षिप्त रूप 10 अप्रैल, २०१६ के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुआ.) 

अति राजनीति वर्जयेत

राजनीति/ गोविन्द सिंह
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की घटना ने देश की शिक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न यह लगा दिया है कि विश्वविद्यालयों का राजनीतिकरण कहाँ तक उचित है? छात्रों को किस हद तक राजनीति का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? जैसा कि जेएनयू के साथ हुआ, क्या किसी ख़ास विश्वविद्यालय में ख़ास तरह की राजनीति की दीक्षा दी जानी चाहिए? मसलन किसी विश्वविद्यालय में केवल वाम पंथ ही पढ़ाया जाए और किसी में केवल दक्षिणपंथ? किसी में मध्यमार्गी कांग्रेसी विचारधारा की शिक्षा दी जाए तो किसी में समाजवादी विचारधारा की? यानी हर राजनीतिक दल अपनी विचारधारा के प्रचार के लिए अपना अलग विश्वविद्यालय स्थापित कर ले? यह भी देखना चाहिए कि इसके क्या नतीजे निकलेंगे?    
विश्वविद्यालयों में आज जिस तरह की राजनीति दिखाई पड़ती है, उससे नकारात्मक तस्वीर उभरती है. जिन विश्वविद्यालयों में छात्र व्यावहारिक राजनीति का पाठ पढ़ते थे, वहाँ तो बुरा हाल है ही, जहां वैचारिक राजनीति की दीक्षा मिलती थी, वहाँ भी पतन ही हुआ है. वैचारिक राजनीति का प्रतिनिधि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय है तो व्यावहारिक राजनीति के प्रतीक देश के अन्य विश्वविद्यालय. व्यावहारिक राजनीति सिखाने वाले विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति का पतन कुछ पहले शुरू हो गया था, जहां छात्रनेता पढ़ाई छोड़ कर ठेकेदारी करने लगे थे. उनका गठजोड़ आपराधिक गिरोहों से होने लगा था. इस बात को लिंगदोह समिति ने भांप लिया था और इसीलिए उस पर नकेल कसने के पर्याप्त इंतजाम कर दिए थे. वामपंथी विचारधारा का गढ़ होने के बावजूद जेएनयू की छात्र राजनीति को तब तक आदर्श ही माना जाता था. क्योंकि वहाँ के छात्र संघ चुनाव वैचारिक बहसों के बीच लडे जाते थे. इसलिए लिंगदोह ने जेएनयू की चुनाव प्रणाली को आदर्श बताया था. लेकिन जैसे-जैसे प्रमुख वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में हाशिये पर जाने लगे, वैसे-वैसे जेएनयू की छात्र राजनीति भी दिग्भ्रमित होने लगी. वामपंथी विचारधारा कब अलगाववादी विचारधारा के साथ जा मिली, पता ही नहीं चला. नतीजा सामने है. छात्र संघ अध्यक्ष जमानत पर है, दो लड़के जेल में हैं. और विश्वविद्यालय के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है. विश्वविद्यालय के अध्यापक उबल रहे हैं, राष्ट्रवाद पर बहस कर रहे हैं, लेकिन अब इसका कोइ अर्थ नहीं है. उनकी बहसें लग चुके दाग को छुड़ाने की बजाय और गहरा कर रही हैं.
सवाल यह है कि क्या किसी विश्वविद्यालय का इस कदर राजनीतिकरण कर दिया जाए कि वह किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा का प्रतीक बन जाए? यह प्रवृत्ति भारत जैसे लोकतांत्रिक समाज के लिए ठीक नहीं है. किसी भी संस्थान, खासकर सार्वजनिक फंडिंग से चलने वाले विश्वविद्यालय में हर तरह की विचारधारा को पनपने का मौक़ा मिलना चाहिए. स्कूलों से निकल कर विश्वविद्यालय में दाखिला लेने वाले विद्यार्थी आम तौर पर राजनीतिक नहीं होते. कैम्पस की छात्र राजनीति के संपर्क में आने के बाद ही वे उस दिशा में प्रवृत्त होते हैं. ऐसे में यदि उनके सामने सिर्फ एक ही तरह का विकल्प होगा तो निश्चय ही वे उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे. दुर्भाग्य से जेएनयू में दक्षिणपंथ या हिंदुत्व के लिए कोई जगह नहीं रही है. अब चूंकि राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिणपंथी राजनीति का वर्चस्व है, इसलिए यह टकराव स्वाभाविक है. लेकिन यह देश के लिए ठीक नहीं है. इससे जो हवा निकल रही है, वह जहरीली है.
किसी ख़ास विश्वविद्यालय को ख़ास विचारधारा में रंग देने का नतीजा यही निकल सकता था. मसलन आपने एक विश्वविद्यालय खोला, उसमें चुन-चुन कर अपनी विचारधारा के लोग भरती कर दिए. पांच-सात साल तो वे आपके लिए खूब स्वयंसेवक तैयार करेंगे. उसके बाद क्या होगा? दूसरी पार्टी सत्ता में आते ही ऐसे विश्वविद्यालय को निशाना बनाएगी. वह अपने लोग भर्ती करेगी. पुराने लोगों को परेशान करेगी. फंडिंग रोक देगी, हर चीज में पक्षपात होगा. जो विद्यार्थी इस पक्षपात को झेलेंगे, उन्हें आजीवन इसका दंश सालता रहेगा. यह क्रम यूं ही निरंतर चलता रहेगा. विश्वविद्यालय कभी स्वतंत्र विकास नहीं कर पायेगा. ऐसे में किस तरह का देश बनेगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है.
अपने देश में आजादी के बाद शिक्षा को लेकर कोई चिंतन नहीं हुआ. शिक्षा में सुधार को लेकर जो भी आयोग बने, उनकी सिफारिशों को कभी ठीक से लागू नहीं किया गया. छात्र और राजनीति के रिश्ते को लेकर भी कोई चर्चा नहीं हुई. छात्र संगठन जरूर अपने स्तर पर कुछ सोच-विचार करते रहे लेकिन आम तौर पर होनहार विद्यार्थी राजनीति से परहेज ही करते रहे. छात्र संघ चुनावों के दौरान ही थोड़ा-बहुत हो-हल्ला होता रहा. नतीजा यह हुआ कि हर राजनीतिक दल छात्र संघों को अपनी नर्सरी समझने लगे. राजनीति का पतन हुआ तो छात्र राजनीति भी अधोगति को प्राप्त हुई. इसलिए आज देश के परिसरों में राजनीति का परिदृश्य बड़ा ही निराशाजनक है.
कुछ लोगों का कहना है कि संघ को जेएनयू पर हमला करने की बजाय उसके समान्तर एक बड़ी रेखा खींच देनी चाहिए. अर्थात जेएनयू की तर्ज पर अपनी विचारधारा का उससे भी बड़ा विश्वविद्यालय बनाए. लेकिन क्या इससे कोई समाधान निकलेगा? शायद नहीं. क्या इससे रंजिश और नहीं बढ़ेगी? बेहतर तो यही होगा कि किसी भी विश्वविद्यालय को किसी ख़ास विचारधारा का अड्डा न बनने दिया जाए. राजनीति से परहेज भी ठीक नहीं है, और सिर्फ राजनीति ही राजनीति हो, यह और भी खराब है. जरूरत से ज्यादा राजनीति हमारे जीवन में जहर घोल रही है. (दैनिक जागरण, 13 मार्च, 2016 से साभार)