मंगलवार, 29 जुलाई 2014

यूपीएससी का छल-प्रपंच

भाषा विवाद/ गोविन्द सिंह
यह बात सही है कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) भारतीय नौकरशाही का मेरुदंड रहा है, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि उसके भीतर अंग्रेजियत के विषाणु जन्मजात रूप से जमे हुए हैं. आज तो फिर भी बहुत कुछ बदल गया है, १९७९ से पहले तो लगता ही नहीं था कि भारत आज़ाद भी हो गया है. भारतीय विदेश सेवा में तो चुनींदा स्कूल-कॉलेजों से निकले हुए, एक ख़ास उच्चारण और चाल-ढाल वाले युवा ही लिए जाते थे. इसके लिए हमें निश्चय ही दौलत सिंह कोठारी जैसे विद्वानों का आभारी होना चाहिए, जिन्होंने भारतीय भाषाओं के लिए रास्ता बनाया. लेकिन १९७९ से अब तक गंगा-यमुना में बहुत पानी बह चुका है और यूपीएससी का रवैया भी काफी हद तक बदल चुका है. पर अंग्रेजियत का विषाणु सर उठाकर बाहर आने के मौके तलाशता रहता है. जैसे ही सरकार या निगरानी समूहों का ध्यान हटा, वह घुसपैठ करने लगता है. वह सुई की तरह से घुसता है, तलवार बनकर निकलता है. तीन वर्ष पहले जब वह घुसा था तो किसी ने यह अनुमान नहीं लगाया था कि उसके परिणाम इतने भयावह निकलेंगे. पिछले तीन वर्ष से लोग इस विषाणु को निकालने में लगे हुए हैं, लेकिन वह नहीं निकल रहा है. इसलिए यूपीएससी से अंग्रेजियत को निकाल फेंकने के लिए मेजर ऑपरेशन की जरूरत है.
चूंकि यूपीएससी ब्यूरोक्रैसी के हाथों में खेलती है, इसलिए कभी भी वह अंग्रेजियत को मजबूत करने का मौक़ा नहीं छोडती. १९९० में सतीश चन्द्र समिति तक भारतीय भाषाओं का वर्चस्व नहीं दिख रहा था. लेकिन नब्बे और २००० के दशक में भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाकर सिविल सेवक बनने वालों की तादात तेजी से बढ़ने लगी. इससे अंग्रेज़ी परस्त लोग घबराने लगे. यही नहीं, उन्होंने पोप तक को चिट्ठी लिख कर यह  गुजारिश की थी कि वे भारत सकरार पर दबाव डालें कि ब्यूरोक्रेसी के चरित्र को बदलने न दें. सिविल सेवा में भारतीय भाषाओं का सीधा से मतलब शहरों के दुर्ग को तोड़कर गांवों को प्रतिष्ठित करना था. जब हाकिम भी देसी उच्छारण वाली अंग्रेज़ी बोलने लगे और देसी लोगों के हक़ में फैसले करने लगे तो अंग्रेज़ी परस्त परेशान होने लगे. इसीलिए वर्ष २०१० में बनी निगवेकर समिति ने सिविल सेवा की प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षाओं को ही बदल डाला. जहां प्रारम्भिक परीक्षा में सी-सैट के जरिये अंग्रेज़ी जानने-समझने वालों को तरजीह दी गयी, वहीं मुख्य परीक्षा में भी अंग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया. तर्क यह दिया गया कि बदलते वैश्विक माहौल में अंग्रेज़ी जानना जरूरी है. वर्ष २०११ से यह व्यवस्था लागू कर दी गयी. तब से लगातार भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने और पास करने वालों की संख्या घटने लगी. जहां २०१० तक हिन्दी माध्यम से उत्तीर्ण करने वालों की संख्या ४०० से अधिक होती थी, वहीं २०१३ में यह घट कर सिर्फ २६ रह गयी. इससे यह स्पष्ट हो गया कि नई व्यवस्था पूरी तरह से देसी युवाओं को बहार रखने के मकसद से बनाई गयी है. इस बीच यह भी देखने में आया है कि अंग्रेज़ी माध्यम वाले, शहरी पृष्ठभूमि वाले और कोचिंग लेकर परिक्षा देने वाले युवा ही परीक्षा में निकल रहे हैं. गत वर्ष मुख्य परीक्षा से अंग्रेज़ी को ख़त्म करने के लिए आन्दोलन हुआ. और संसद में तमाम भारतीय भाषाओं के सांसद एकजुट होकर उसे हटाने में कामयाब हुए. तभी भेदभावपूर्ण सी-सैट के खिलाफ आवाज उठी तो अरविन्द वर्मा समिति बैठा दी. समिति को शीघ्र अपनी रिपोर्ट देनी थी. लेकिन वह नहीं दे पाया. उसका कार्यकाल तीन महीने बढ़ा दिया गया, ताकि परीक्षा पूर्ववत जारी रखी जाए. ज्ञात हुआ है कि प्रारम्भिक रिपोर्ट में कहा गया था कि सी-सैट का पलड़ा अंग्रेज़ी के पक्ष में झुका हुआ है, इससे भारतीय भाषाओं वाले युवाओं के प्रति पक्षपात हो रहा है. लेकिन नौकरशाह इसे मानने को तैयार नहीं हैं. उसी के विरोध में यह आन्दोलन है.
अजीब बात यह है कि आन्दोलन के विरोध में कोई नहीं है. हर कोई कह रहा है कि भाषाई आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए. भाजपा भी और कांग्रेस भी. सपा भी और बसपा भी. उत्तर भी और दक्षिण भी. संसद के दोनों सदन चाहते हैं कि भारतीय भाषा-भाषियों के साथ भेदभाव न हो, लेकिन फिर भी ब्यूरोक्रेसी है कि मानती नहीं. अंग्रेज़ी मीडिया जरूर फूट डालने की कोशिश करता है. कुछ अंग्रेज़ी अखबार इसे हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि जितना नुकसान हिन्दी माध्यम वालों को है, उतना ही नुकसान अन्य भाषा भाषियों को है. अभी तक हम यह मानते थे कि भाषा को लेकर राजनेता संसद और संसद से बाहर अलग-अलग व्यवहार करते हैं. इसलिए हिन्दी कभी राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं बन पायी. पहली बार एक ऐसे प्रधान मंत्री आये हैं, जो हिन्दी को लेकर स्पष्ट हैं. इसलिए अब तो भाषा को लेकर छल-प्रपंच की नीति बंद होनी ही चाहिए.( अमर उजाला, २९ जुलाई, २०१४ से साभार)
        

मंगलवार, 20 मई 2014

बदलाव का हथियार बना युवा वर्ग


राजनीति/ गोविन्द सिंह

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार के चुनाव में बदलाव की जबरदस्त आंधी चल रही थी और नरेन्द्र मोदी इसके वाहक बने. लेकिन सवाल यह है कि ऐसा कैसे हुआ और कैसे उसे वोट में परिवर्तित किया जा सका? इसका एक ही कारण नजर आता है, देश का युवा वर्ग परिवर्तन का हथियार बना है. इस बार जिस तरह से १० से १५ फीसदी तक ज्यादा मतदान हुआ, उससे यह साबित हो गया कि बिना युवावर्ग की शिरकत के इतना बड़ा परिवर्तन संभव नहीं था. वे खुद तो सडकों पर आये ही, पुरानी पीढी को भी घरों से निकलने को विवश किया. भारत में १५ करोड़ तो पहली बार वोट डालने वाले मतदाता ही थे जो लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी के जोश से लबरेज थे, उसके अलावा उतने ही लोग ३० से कम उम्र के थे. माना जा रहा है कि यही वर्ग मोदी की जीत के लिए जिम्मेदार है.
युवा वर्ग की इस भूमिका को अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. हमने देखा है कि पिछले पांच वर्षों में दुनिया भर में परिवर्तन की छटपटाहट दिखाई दी है. अरब देशों के अलावा पूर्वी देशों में भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए युवक सडकों पर उतर आये हैं. यद्यपि जब-जब दुनिया में राजनीति ने करवट बदली है, क्रान्ति का बिगुल बजाया है, उसमें निर्णायक भूमिका युवाओं की ही रही है. लेकिन हाल के वर्षों में जो परिवर्तन आये हैं, उनमें युवा स्वयं भी सीधे-सीधे भागीदार रहे हैं. अरब देशों में हुई क्रांतियाँ इसकी गवाह हैं.
हमारे यहाँ इतने बड़े पैमाने पर युवाओं की भागीदारी १९७७ के बाद इसी बार हुई है. १९८९ और १९९१ के चुनावों में भी युवाओं से जुड़े मुद्दे केंद्र में थे, लेकिन तब उनकी भागीदारी खंडित थी. २०१० के बाद अरब देशों में लोकतंत्र के लिए युवाओं में एक नई कुलबुलाहट सुनाई दी तो उसका असर भारत पर भी पडा. नए आर्थिक परिदृश्य और नई टेक्नोलोजी ने विश्व भर के युवाओं को जोड़ने का काम किया. दुनिया भर में हमारे युवा कामयाबी के नए कीर्तिमान गढ़ने लगे. बहुत तेजी से अन्य देशों के साथ आवागमन भी बढ़ने लगा. जब वे उन्नत देशों के साथ अपनी तुलना करते तो पाते कि हमारी तमाम खामियों के लिए हमारी राजनीति दोषी है. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हमारा लोकतंत्र भीतर से खोखला होता जा रहा है. उसमें वंशवाद है, भाई-भतीजावाद है, आम आदमी खस्ताहाल है. हमारे यहाँ आर्थिक सुधार लागू हुए लेकिन उनका सुफल केवल मुट्ठी भर लोगों ने चखा. लोकतांत्रिक पूंजीवाद की जगह हमने क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना पूंजीवाद विकसित किया. कहने को कोटा-परमिट राज ख़त्म जरूर हुआ लेकिन इन्स्पेक्टर राज अब भी दूसरे रूप में बरकरार है. कहाँ तो उम्मीद थी कि आर्थिक सुधारों की वजह से भ्रष्टाचार दूर होगा, कहाँ इस नव-पूंजीवाद ने भ्रष्टाचार को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया. इससे हमारे युवा वर्ग में व्यवस्था के प्रति जबरदस्त मोहभंग की स्थिति पैदा कर दी. शुरुआत में उसने राजनीति से पूरी तरह से मुख मोड़ लिया. लेकिन जब उसने देखा कि अपनी छद्म राजनीति की वजह से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितना नींचा देखना पड़ता है, तो उसने भी राजनीति में शिरकत करने का फैसला किया.
२००९ के आम चुनाव में राहुल गांधी देश के युवा वर्ग की आशाओं के केंद्र में थे. राहुल भी पार्टी और राजनीति में आमूल बदलाव की बात किया करते थे. लेकिन युवाओं ने जब देखा कि इन पांच वर्षों में कांग्रेस की हालत बद से बदतर हो गयी है, शासन में भ्रष्टाचार और जड़ें जमा रहा है और राहुल कोइ उम्मीद नहीं जगा पा रहे तो उनसे भी मोहभंग शुरू हुआ. इसी बीच उभरे अन्ना आन्दोलन और दिल्ली में बलात्कार के विरोध में सडकों में उमड़े युवाओं ने यह जता दिया कि अब वे चुप बैठने वाले नहीं हैं. इसी बीच युवाओं में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम सामने आया, जिसने गुजरात जैसे राज्य में शासन की नयी मिसाल कायम की थी. जिसने न सिर्फ विकास का नया मॉडल प्रस्तुत किया बल्कि राजनीति को भी अनुशासित किया था. लेकिन इसी दौर में अचानक मंच पर उभरे और अन्ना आन्दोलन से जन्मे अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से दिल्ली विधान सभा चुनाव में अप्रत्याशित कामयाबी दर्ज की, उसने भी यह साबित किया कि युवा अब राजनीति को सुधारने के लिए घर से बाहर निकल पडा है. लेकिन सत्ता के लिए केजरीवाल की अधीरता और सरकार चला पाने में उनकी विफलता ने यह भी सन्देश दिया कि केवल नेक इरादे होना ही पर्याप्त नहीं है, उसे अंजाम देने का अनुभव होना भी जरूरी है. इसलिए इस बार केजरीवाल को बुरी तरह से मुंह की खानी पडी. पंजाब ने उनकी लाज रख ली, वरना उसके तमाम बड़े नेताओं ने तो पार्टी की लुटिया पूरी तरह से डुबा दी थी. दूसरी तरफ युवाओं को मोदी में वे सब गुण दिखाई दिए, जिनकी उन्हें तलाश थी.
कुल मिला कर यह जीत युवाओं की जीत है. देश की राजनीति का ढर्रा बदल चुका है. पुराने फ़ॉर्मूले अप्रासंगिक हो चुके हैं. जाति-धर्म और साम्प्रदायिकता की जगह अब सिर्फ सुशासन और विकास की राजनीति चलेगी. जो काम करेगा, वह टिका रहेगा, जो छद्म मुद्दे उछालेगा, उसका कोई नामलेवा नहीं बचेगा. (अमर उजाला, २० मई, २०१४ से साभार)  

रविवार, 4 मई 2014

एग्जिट पौल क्यों होते हैं विफल?

राजनीति/ गोविन्द सिंह

निर्वाचन आयोग ने सात अप्रैल से 12 मई तक एग्जिट पौल यानी मतदान के तत्काल बाद जनमत संग्रह के प्रसारण या प्रकाशन पर रोक लगाकर उचित ही किया. क्योंकि पिछले 3-4 चुनावों से लगातार ओपीनियन और एग्जिट पौल्स की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगते रहे हैं. वे न सिर्फ अपनी भविष्यवाणी में विफल रहे हैं, बल्कि इनकी आड़ में स्वार्थी तत्वों पर काले कारनामों को अंजाम देने के आरोप भी लगे हैं. चूंकि आरोप एकदम निराधार नहीं हैं, इसलिए वे अपने मकसद में स्वतः पराजित हो जाते हैं.

आखिर ऐसा क्यों हुआ? भारत में भी जब 1980 में पहली बार ओपीनियन पौल कराए गए थे तो वे सत्य के काफी करीब आये थे. उससे पहले अनुभवी राजनेता, राजनीतिक पंडित और पत्रकार यह काम किया करते थे. वे बहुत सटीक नहीं तो सत्य के नजदीक की भविष्यवाणियाँ कर लिया करते थे. जनता खुद भी काफी-कुछ समझती थी. हमें याद है कि 1980 में जब मध्यावधि चुनाव हुआ था तो ज्यादातर अखबारों ने यही भविष्यवाणी की थी कि चाहे जो हो, इंदिरा गांधी पुनः सत्ता में नहीं आयेंगी. लेकिन जब इंदिरा गांधी पूर्ण बहुमत से चुनाव जीत गयीं तो एक अखबार ने बाकायदा पहले पेज पर सम्पादकीय लिख कर माफी मांगी. जबकि ओपीनियन पौल वाली पत्रिका सही साबित हुई थी.

ऐसे माहौल में ओपीनियन पौल्स सचमुच ताज़ा हवा के झोंके की तरह आये और लगा कि इससे हमारा लोकतंत्र और मजबूत होगा. वर्ष 1985 और 1989 के लोकसभा चुनावों में भी वे अपने मकसद में कामयाब रहे. लेकिन जैसे ही उनकी स्वीकार्यता देशव्यापी होने लगी, उनके स्तर में गिरावट आने लगी. उनकी भविष्यवाणियाँ गलत साबित होने लगीं. चूंकि सेफोलोजी के धंधे में तरह-तरह के फर्जी लोग भी घुसने लगे, इसलिए उनके सैम्पल और सर्वेक्षण भी फर्जी पाए जाने लगे. सर्वेक्षण करने वाले लोग अपना काम ईमानदारी से नहीं करते थे. ऐसा नहीं कि सर्वे करवाने वाली सभी संस्थाएं ऐसी ही थीं, लेकिन आनन्-फानन फैले इस कारोबार ने अपनी पेशेवर नैतिकता खो दी. निहित स्वार्थी लोग इनके सहारे अपने उल्लू सीधा करने लगे. इनके नाम पर राजनीतिक दल अपने पक्ष में कृत्रिम माहौल बनाने लगे. राजनेता और राजनीतिक दल भारी धनराशि देकर अपने पक्ष में भविष्यवाणियाँ करवाने लगे. चूंकि एग्जिट पौल्स मतदान के एकदम बाद करवाए जाते हैं, इसलिए उनकी भविष्यवाणी की संभावना भी बढ़ जाती है. शुरुआती एग्जिट पौल्स में हुआ भी ऐसा ही. लेकिन सर्वे एजेंसियों के गैरपेशेवर व्यवहार की वजह से इनकी साख पर भी बट्टा लगने लगा. इसलिए निर्वाचन आयोग को इन पर रोक लगवानी पडी. 

अपने मूल स्वरुप में गैलप पौल काफी सटीक रहे हैं. अमेरिका और यूरोप के देशों में तो वे शत-प्रतिशत सटीक बैठते हैं. क्योंकि वहां का समाज समतल है. अमूमन लोग शिक्षित हैं. जीवन स्तर में हमारी तरह विविधता नहीं है. बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं. संचार और जन संचार की वजह से पूरा देश लगभग एक तरह से सोचता है. और लोग भी हमारी तुलना में खुले हुए हैं. उनके मन में क्या है, साफ़-साफ़ बताने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता. सबसे बड़ी बात यह कि सर्वेक्षण को अंजाम देने वाले लोग अपना काम ईमानदारी से करते हैं. ऐसे समाज में औचक ही कुछ लोगों के विचार लेकर किया गया सर्वेक्षण एकदम सटीक बैठता है. लेकिन हमारा समाज वैसा नहीं है. हम एक निहायत ही पेचीदा समाज में रहते हैं. हमारे यहाँ जातियां-उपजातियां हैं, धर्म-सम्प्रदाय हैं, वर्गीय विषमताएं हैं, क्षेत्रीय असंतुलन हैं, पहाड़ और मैदान हैं. अनगिनत विभिन्नताएं हैं. दरअसल हम दिमाग से नहीं, दिल से परिचालित होने वाले समाज हैं. फिर चूंकि हमें आज़ाद हुए अभी बहुत समय नहीं हुआ, हम हाल ही में शिक्षित हुए हैं, इसलिए हमारा मतदाता अनेक तरह की ग्रंथियों से ग्रस्त है. सर्वे करने वालों को वह अपने मन की बात बताता ही नहीं. वह मतदान केंद्र में जाकर भी अपना मन बदल सकता है. एक ही परिवार में अलग-अलग दलों को वोट देने वाले लोग हैं तो लाठी के बल पर हांके जाने वाले समूह भी हैं और जातियों-बिरादरियों में बंटे खाप और राठ भी हैं, जो सैकड़ों गांवों में विखरे होते हुए भी एक ही तरीके से सोचते हैं. वहाँ वोट डाले नहीं जाते बल्कि थोक में पड़ते हैं. इसलिए केवल अमेरिकी पैटर्न पर सर्वे करा देने से ऐसे समाज के मन की टोह लेना आसान नहीं है. फिर अमेरिकी तरीके को ही हमारी सर्वे एजेंसियां कौन-सा अपनाती हैं! वे गाँव-देहात में ही नहीं पहुँच पाते, कहाँ तो पहाड़-वनवासी इलाके? वे गाँव से शहर आये व्यक्ति से सवाल पूछ कर ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. बहुत सी संस्थाएं तो उतना भी नहीं करतीं. वे एक बार किये हुए सर्वेक्षण को कई-कई बार इस्तेमाल करती रहती हैं. पैसा बनाने के फेर में वे सौ लोगों के सर्वे को दस से ही करवाके पेश कर देते हैं. बस उन्हें एक ही चीज आती है, वह है सांख्यिकी. उसी के बल पर वे आंकड़ों में हेर-फेर करते हैं. इसीलिए उनकी भविष्यवाणियाँ गलत साबित हो रही हैं. वे एग्जिट पौल के नाम पर ऐसे आंकड़े प्रस्तुत करते हैं, जैसी कोई  भी समझदार पत्रकार आसानी से कर देता है. अब पिछले लोक सभा के एग्जिट पौल पर ही एक नजर डालते हैं:

तब यूपीए को एनडीटीवी ने 216, स्टार न्यूज ने 199, आईबीएन ने 185, इंडिया टीवी ने 189, आजतक ने 191 और टाइम्स ने 198 सीटें दी थीं. लेकिन जब असली परिणाम आया तो यूपीए को मिलीं 256 सीटें. एक और मजेदार तथ्य यह भी है कि बहुत सी एजेंसियां कहती हैं कि फलां दल को इतने से इतने के बीच सीटें मिल सकती हैं. इस ‘बीच’ में वे 20 से 40 तक सीटें रख देती हैं. इतने अंतर के साथ भविष्यवाणी तो कोई भी कर देगा, फिर आपकी क्या जरूरत!

इसलिए अपनी मूल अवधारणा में गैलप पौल ठीक होते हुए भी भारत में हाल के वर्षों में उसका कार्यान्वयन ठीक नहीं हुआ. भारत जैसे विविधता भरे देश में उसे ज्यों का त्यों अपनाना भी बहुत मुश्किल है. इसलिए यह जरूरी है कि उसके स्वरुप को तराशा जाए, अपने अनुकूल बनाया जाए और तब इस्तेमाल में लाया जाए ताकि उससे हमारा लोकतंत्र मजबूत हो. (दैनिक जागरण, ४ अप्रैल, २०१४ से साभार) 

रविवार, 27 अप्रैल 2014

सच्चे लोकतंत्र के लिए अनिवार्य मतदान

राजनीति/ गोविन्द सिंह
हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है? इस सवाल का तत्काल उत्तर यही हो सकता है कि हमारी चुनाव प्रणाली ठीक नहीं है. वह योग्य लोगों को चुन कर संसद या विधान सभाओं में नहीं भेज पाती. और यदि चुनाव प्रणाली की सबसे बड़ी खामी तलाशें तो पता चलता है कि मतदान में जनता की अल्प भागीदारी ही वह खामी है, जिसकी वजह से हम विश्वसनीय लोकतंत्र नहीं बना पा रहे. मतदान की गड़बड़ी के ही कारण बहुत कम लोगों के समर्थन से आप चुन कर संसद-विधान सभा पहुँच जाते हैं. मसलन किसी चुनाव क्षेत्र में दस लाख मतदाता हैं. उनमें से लगभग ५० प्रतिशत यानी पांच लाख लोग ही मतदान करते हैं. ये ५० प्रतिशत वोट तमाम उम्मीदवारों में बंट जाते हैं. ये उम्मीदवार दो-चार या दस कितने ही भी हो सकते हैं. जीतने वाला उम्मीदवार डाले गए वोटों के ज्यादा से ज्यादा  ४० प्रतिशत वोट हासिल कर पाता है. अर्थात मुश्किल से दो लाख मतदाता किसी प्रत्याशी को जिता सकते हैं. यदि किसी क्षेत्र में दो लाख मतदाता किसी एक जाति या धर्म के हुए और वोटों का ध्रुवीकरण हो गया तो उस जाति या धर्म का उम्मीदवार चुनाव जीत सकता है. यानी कुल मतदाताओं के २० प्रतिशत मतदाता किसी चुनाव को जीतने के लिए काफी होते हैं. क्या किसी भी नजरिये से इसे बहुमत कहा जा सकता है? शायद नहीं. यह लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों के विरुद्ध है. क्या यह जन प्रतिनिधित्व के मानकों पर खरा उतरता है? शायद नहीं. तो इसका क्या समाधान है?
दुनिया में जहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, ये सवाल उठते रहे हैं. इसलिए २२ देशों में मतदान को अनिवार्य करने के लिए क़ानून बन चुका है. दस देशों में इसे अनिवार्यतः लागू भी किया जा चुका है. हमारे देश में भी गुजरात विधान सभा इसे पारित कर चुकी है. अर्थात देर-सबेर यह लागू हो ही जाएगा. इसलिए जब यह मुद्दा राष्ट्रीय पटल पर उछला तो ज्यादातर विपक्षी दलों ने चुप्पी साध ली. शायद इसलिए कि इसका श्रेय नरेन्द्र मोदी को मिल सकता है. लेकिन इसी बीच निर्वाचन आयोग का बयान आया है कि यह अव्यावहारिक होगा. आयोग की यह टिप्पणी हजम नहीं हो रही, क्योंकि जो आयोग मतदान का प्रतिशत बढाने के लिए जागरूकता पर सेमीनार करवाता रहता है, आखिर वह क्यों इसकी मुखालफत कर रहा है. गौरतलब यह भी है कि आयोग तो सिर्फ लागू करने वाली संस्था है. इस तरह से पञ्च फैसला देने का उसके पास कोई अधिकार नहीं है.
बेशक मतदान को अनिवार्य करने से पहले इसके तमाम पहलुओं पर विचार-विमर्श होना चाहिए. लेकिन अब समय आ गया है कि लोकतंत्र में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कोई न कोई कदम उठाना ही चाहिए. केवल १५-२० फीसदी वोटों से चुनाव जीतने मात्र से ही कोई बहुसंख्य लोगों का प्रतिनिधि नहीं हो सकता. यह लोकतंत्र के नाम पर रस्म अदायगी है. जब हमारे संविधान निर्माताओं ने वयस्क मताधिकार का प्रावधान रखा था, तब इसे अनिवार्य न करने के पीछे एकमात्र कारण यह था कि भारत में शिक्षा का प्रसार नहीं था, लोग लोकतंत्र के बारे में उस तरह से जागरूक नहीं थे, जैसे आज हैं. आज भी कई लोग यही कह रहे हैं कि भारत जैसे गरीब और विविधतापूर्ण देश में इसे जबरन लागू करना व्यावाहारिक नहीं है. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि मतदान को नजरअंदाज करने वाले ज्यादातर वे ही लोग हैं, जो लोकतंत्र का फल चख कर ही अमीर हुए हैं. अमीर और मध्य वर्ग के लोग ही ज्यादातर वोट डालने मतदान केंद्र नहीं पहुँचते या वे इसे गंभीरता से नहीं लेते. आश्चर्य की बात यह है कि जो लोग वोट नहीं डालते, वे ही बात-बात पर लोकतंत्र को कोसते हैं. अनिवार्य मतदान का विरोध करने के पीछे यह डर भी है कि अभी तक वे थोड़े से वोटो के बल पर चुनाव जीत लेते थे, इसके लागू होने पर मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी. फिर वोट बैंक की राजनीति भी इससे ध्वस्त हो जायेगी. ऐसा नहीं हो सकता कि आप मतदाताओं के एक वर्ग को पटा लें और उसी के बल पर बहुमत पर राज करें. तब वही जन प्रतिनिधि चुना जाएगा, जो सभी वर्गों और तबकों का समर्थन हासिल कर पायेगा. अमेरिका जैसे देश में भी अब यह मांग उठ रही है कि क्यों न मतदान को अनिवार्य कर दिया जाए. आस्ट्रेलिया के अनुभव से प्रेरित होकर तमाम पश्चिमी देश इस तरफ झुक रहे हैं. दरअसल मताधिकार का मतलब यह नहीं है कि आप अपने अधिकार को किसी और के हाथ गिरवी रख दें. अनिवार्य मतदान का अर्थ यह भी है कि  आप अपने अधिकार को खुद इस्तेमाल करें और अपने मुस्तकबिल को खुद अपने हाथ से लिखें. (दैनिक जागरण, २७ अप्रैल, २०१४ से साभार)