सोमवार, 24 नवंबर 2014

आस्था के डेरे किधर जा रहे हैं?

धर्म-दर्शन/ गोविन्द सिंह
सतलोक आश्रम के बाबा रामपाल ने कानून-व्यवस्था से बैर मोल लेकर अपने आप को तो डुबाया ही, पंजाब-हरियाणा के अन्य डेरों को लेकर भी संदेह के घेरे में ला खड़ा कर दिया है. यही वजह है कि पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट को दोनों राज्यों की सरकारों को ये आदेश देना पड़ा कि वे अपने यहाँ स्थित डेरों का जायजा लेकर एक मुकम्मल रिपोर्ट प्रस्तुत करें. अदालत भी यह देख रही है कि किस तरह से ये डेरे इन राज्यों के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहे हैं और अपने आप को राज्य से ऊपर साबित करने की एक नई किस्म की होड़ को जन्म दे रहे हैं. इससे पहले डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम सिंह को अम्बाला की अदालत में पेश करने में जिस तरह से पुलिस-प्रशासन को नाकों चने चबाने पड़े थे और उससे भी पहले २००९ में विएना में डेरा सचखंड के दो बाबाओं पर जानलेवा हमला और एक की हत्या के बाद पंजाब में जिस तरह हिंसक झड़पें हुई थीं, उनसे ये संकेत मिल रहे थे कि पंजाब में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है. इसलिए देश के इस उत्तर-पश्चिमी हिस्से की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि पर एक नजर डालनी चाहिए.
दरअसल डेरे आज न सिर्फ पंजाब-हरियाणा, बल्कि समूचे उत्तर भारत की एक सचाई हैं. लगभग पूरे हिन्दी-पंजाबी भाषी समाज पर उनका गहरा असर है. यह ठीक है कि रामपाल या आसाराम बापू जैसे बाबाओं के कारण आज सारे ही डेरे-आश्रम या संत-बाबा कठघरे में आ गए हैं, लेकिन अपने शुरुआती चरण में उन्होंने समाज-जीवन को काफी हद तक प्रभावित भी किया है. वे समाज हित के अनेक काम करते हैं, दलितों, वंचितों और भटके हुओं के जीवन में आशा का संचार भी करते रहे हैं, इसीलिए उनके अनुयायी भी तेजी से बढ़ते हैं. वह बात अलग है कि प्रतिष्ठा के चरम पर पहुँचने के बाद अक्सर उनका पतन शुरू हो जाता है और उनका हश्र रामपाल सरीखा होता है. उत्तर भारत में आज सतलोक आश्रम के अतिरिक्त संत निरंकारी मंडल, डेरा सच्चा सौदा, राधा स्वामी सत्संग (ब्यास), डेरा सचखंड बल्लां, डेरा बाबा बुड्ढा दल, डेरा भानियारवाला, दिव्य ज्योति जागृति संस्थान जैसे बड़े डेरे हैं, जिनके अनुयायियों की संख्या लाखों-करोड़ों में है, तो हर गाँव, हर कसबे में छोटे-छोटे डेरे भी हैं, जिनकी अनुयायी-संख्या १० हजार से एक लाख के बीच है. पंजाब-हरियाणा में कुल दस हजार के आसपास डेरे अस्तित्व में आ चुके हैं. ये डेरे अब पंजाब-हरियाणा की सरहदें लांघ कर उत्तर प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तक पहुँच रहे हैं.     
उत्तर भारत में डेरों का इतिहास ५०० साल से भी पुराना है. डेरा का मतलब है एक तरह का अध्यात्मिक शिविर या अड्डा. शुरू में कोई एक संत या अध्यात्मिक नेता अपने कुछ अनुयायिओं के साथ डेरे की स्थापना करता है. दरअसल भारत में इस्लाम के आगमन के साथ डेरों का भी आगमन हुआ. पीरों-फकीरों ने सबसे पहले अपने डेरे बनाए. पश्चिमी पाकिस्तान में तो ये डेरे आज बड़े शहरों का आकार ले चुके हैं. अपने यहाँ देहरादून शहर भी कभी गुरु का डेरा ही था. असल में सिख पंथ का उद्भव भी एक डेरे के रूप में ही हुआ. सिख पंथ के साथ कुछ और डेरे भी जन्मे. उदासी डेरा, डेरा बाबा राम थमन, नामधारी और नानकसर. ये डेरे सचाई का पाठ पढ़ाते थे. उनका मकसद समतावादी समाज की रचना करना होता था. वे भटके हुए इंसान को बुराई से भलाई के मार्ग पर लाने की कोशिश करते थे. इनके संसर्ग में आने से बहुतों के घर रोशन हुए. बहुतों ने नशाखोरी छोडी, बहुतों ने बुराई का रास्ता छोड़ अच्छाई का रास्ता अपनाया. तिहाड़ जेल में कैदियों को अच्छी राह पर लाने का काम भी इन्होने किया. वे सरकार, राजनीति  और धार्मिक-सांस्कृतिक नेतृत्व की कमियों को पूरा करते हैं. वे गरीब जनता के हितों का बखूबी ध्यान रखते हैं. आपदा के समय उनके स्वयंसेवक मदद के लिए पहुँचते हैं. पंजाब-हरियाणा में ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में सक्रिय हिन्दू या अन्य धर्मों की संस्थाएं भी यह काम कर रही हैं. इसलिए हर डेरे को शक की निगाह से नहीं देखा जा सकता.
लेकिन पंजाब-हरियाणा में डेरों की समस्या कुछ अलग है. पंजाब में कुल १२००० गाँव हैं जबकि ९००० डेरे हैं. ये डेरे आम तौर पर सिख पंथ के समान्तर खड़े हुए हैं. इनमें से ज्यादातर डेरे दलित और पिछड़े वर्गों के हैं. हालांकि सिख पंथ की स्थापना ही जातिविहीन और समतावादी समाज बनाने के लिए हुई थी, लेकिन कालान्तर में यह जातिवाद वहाँ भी उठ खडा हुआ. चूंकि दलित और पिछड़ी जातियों को सिख पंथ में वह जगह नहीं मिल पायी, जिसकी उन्हें अपेक्षा थी, इसलिए उन्होंने डेरे बनाने शुरू कर दिए, जहां उनकी अध्यात्मिक भूख शांत होती है. और देखते ही देखते ये लोकप्रिय भी होने लगे. हाशिए में पडी जमातों ने इन्हें सर आँखों पर बिठाना शुरू कर दिया. अब चूंकि सिख पंथ में गुरु ग्रन्थ साहिब के अतिरिक्त कोई और गुरु नहीं बन सकता, इसलिए जब दलित और पिछड़ी जातियों के संत या बाबा गुरु की तरह उपदेश देने लगते हैं तो तनाव पैदा होता है. चूंकि अब ये जमातें भी आर्थिक तौर पर काफी तरक्की कर रही हैं. इसलिए उन्हें दबाया नहीं जा सकता क्योंकि वे उद्योग-व्यापार में हैं, सरकारी नौकरियों में हैं. साथ ही शिक्षा प्राप्त कर जागरूक भी हो रही हैं. यहाँ भी बड़े पैमाने पर विदेश से धन आ रहा है. तनाव की असली वजह यही है.
लेकिन असली समस्या तब पैदा होती है जब डेरा-प्रमुख अपने को कानून-व्यवस्था से ऊपर समझने लगता है. चूंकि इनके पास अनुयायियों की बड़ी संख्या होती है, इसलिए राजनीतिक दलों को उनमें अपना वोट बैंक दिखाई पड़ता है. हर राजनीतिक दल के लोग, यहाँ तक कि अकाली दल भी, उनके दरवाजे पर हाजिरी बजाते हैं. डेरे के संचालक भी चूंकि अल्पसंख्यकवाद और एक तरह के भय से ग्रस्त रहते हैं, इसलिए बड़े नेताओं के आगमन को वे भी अपने अस्तित्व के लिए शुभ मानते हैं. चूंकि डेरा- प्रमुख कोई बहुत अध्यात्मिक पुरुष नहीं होते, इसलिए वे आसानी से नेताओं के प्रलोभन में आ जाते हैं, उनकी महत्वाकांक्षा जागने लगती है. राजनीतिक संरक्षण मिलते ही डेरे अपने रास्ते से भटकने लगते हैं. वे स्वयं को नियम-क़ानून से ऊपर मान बैठते हैं और वे तमाम काम करने लगते हैं, जिनकी उनसे अपेक्षा नहीं की जाती. यों देश के अन्य हिस्सों में सक्रिय संस्थाएं भी इसी तरह काम करती हैं, लेकिन पंजाब-हरियाणा में चूंकि आबादी की संरचना कुछ अलग है, इसलिए वहाँ तनाव की स्थिति बनी रहती है.
अर्थात डेरों का मसला काफी पेचीदा और नाजुक है. डेरे जरूर हों, क्योंकि उनका होना कहीं न कहीं समाज के लिए हितकारी  भी है, वे सरकार का हाथ बंटाते हैं, लेकिन उन्हें वोट बैंक के रूप में न देखा जाए. उनकी गतिविधियों पर सरकारों को सख्त निगरानी रखनी चाहिए ताकि वे पथभ्रष्ट न हों. ( हिन्दुस्तान, २५ नवम्बर, २०१४ से साभार)

रविवार, 9 नवंबर 2014

उत्तराखंड में उच्च शिक्षा की बदहाली


उच्च शिक्षा/ गोविन्द सिंह 

उत्तराखंड की कुल आबादी एक करोड़ से कुछ ही अधिक है. फिर भी हमारे पास 19 विश्वविद्यालय और 80 से ज्यादा सरकारी और 300 से ज्यादा निजी महाविद्यालय और उच्च शिक्षा के संस्थान हैं. मात्रा के हिसाब से देखा जाए तो यह तस्वीर बुरी नहीं है. लेकिन गुणवत्ता के लिहाज से देखें तो हालत कुछ अच्छी नहीं दिखती. वर्ष 1973 से पहले हमारे पास एकमात्र पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय था. लेकिन उसकी ख्याति पूरे देश में थी. वह देश में हरित क्रान्ति का अग्रदूत बना. उसके बाद कुमाऊँ और गढ़वाल विश्वविद्यालय आये. अल्प संसाधनों के बावजूद उन्होंने देश को अनेक हीरे दिए, जिन्होंने देश-विदेश में नाम कमाया और राष्ट्र-मुकुट की शोभा बने. उन्होंने न सिर्फ अपना नाम किया बल्कि प्रदेश का भी सर ऊंचा किया. इस कालेजों-विश्वविद्यालयों ने देश भर में शिक्षा के मानक कायम किये. घास-फूस के छप्परों और टूटी-फूटी इमारतों से बड़े-बड़े वैज्ञानिक निकले, लेखक-बुद्धिजीवी उभरे और सरहद पर रखवाली करने वाले वीर सैनिक पैदा हुए. अब हमारे पास बहुत से कालेज हैं, विश्वविद्यालय हैं, फिर भी श्रेष्ठ छात्र नहीं निकल रहे. फ़ौज को छोड़ दिया जाए, तो जिस अनुपात में यहाँ से पहले श्रेष्ठ विद्यार्थी निकल कर देश सेवा में जाते थे, अब नहीं निकल पा रहे. पढाई का स्तर निरंतर गिर रहा है. हमारे शिक्षा-मंदिरों से डिग्रीधारी तो हर साल बहुत निकल रहे हैं, पर उनमें कितने वाकई काबिल हैं, कहना मुश्किल है. बावजूद इसके, उच्च शिक्षा में सकल दाखिला अनुपात (जी ई आर) 20 फीसदी के आसपास ही है. पूरे समाज में उच्च शिक्षा को लेकर एक गिरावट साफ़ देखी जा सकती है. सबको शिक्षित करने की हमारी यात्रा अभी बहुत लम्बी है. उच्च शिक्षा की बदहाली के लिए किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं. यह ठीक है कि हमें अपनी सम्पूर्ण आबादी को शिक्षित करना है. लेकिन यह भी देखना है कि जो शिक्षा उन्हें दी जा रही है, वह स्तरीय हो.
ऐसे समय में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की भूमिका बढ़ जाती है. मुक्त और दूरस्थ शिक्षा जहां एक तरफ उन युवाओं के लिए सुनहरा अवसर लेकर आती है, जो किसी वजह से अपनी पढाई पूरी नहीं कर पाए या जो दूर-दराज के अभावग्रस्त इलाकों में होने से उच्च शिक्षा से दूर रहे. आज दुनिया भर में दूरस्थ शिक्षा लोकप्रिय हो रही है तो इसीलिए कि यह विद्यार्थी की अपनी सुविधा के साथ और बिना किसी तरह के बंधनों के, शिक्षा हासिल करने का अवसर देती है. एक सचाई यह भी है कि पारंपरिक शिक्षा लगातार महंगी हो रही है. ऐसे में युवा दूरस्थ शिक्षा की ओर आकृष्ट हो रहे हैं.

लेकिन एक बात ध्यान से सुन लें, दूरस्थ शिक्षा न प्रायवेट परीक्षा देने जैसा मामला है और न ही पुराने समय का पत्राचार पाठ्यक्रम. यह पद्धति वैसी ही शिक्षा, बल्कि उससे भी बेहतर शिक्षा शिक्षार्थियों को देने का वचन देती है, जो पारंपरिक क्लास-रूमों में दी जाती रही है. ब्रिटेन के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में वहाँ की ओपन यूनिवर्सिटी भी शामिल है तो यूं ही नहीं है. वहाँ ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज की टक्कर का शोध होता है. आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय भी अपने दूरस्थ शिक्षा विभाग खोल रहे हैं, क्योंकि वे उन होनहार छात्रों तक पहुंचना चाहते हैं, जो किसी कारण उनकी देहरी से दूर रह गए. सचमुच दूरस्थ शिक्षा ने देश-काल की दीवारों को तोड़ दिया है. इसलिए मुक्त और दूरस्थ शिक्षा के बारे में अपने पूर्वाग्रहों को त्यागिए और उसे अपनाकर मजबूती प्रदान कीजिए. (४-५ नवम्बर, २०१४ को देहरादून में आयोजित संगोष्ठी की स्मारिका में प्रकाशित)  

उत्तराखंड: सपने अब भी अधूरे हैं!

राजनीति/ गोविन्द सिंह
अपने देश में 14 वर्ष के काल-खंड का ख़ास महत्व है. इसी अवधि में भगवान् राम चन्द्र ने वनवास पूरा किया और आसुरी प्रवृत्तियों को पराजित कर एक नयी व्यवस्था अर्थात राम-राज्य कायम किया. ऐसा राज्य, जिसमें न भय हो और न भेदभाव हो. यानी 14 वर्ष का काल भलेही थोड़ा-सा लगे पर यदि मन में संकल्प हो तो क्या नहीं किया जा सकता! उत्तराखंड राज्य भी आज 14 वर्ष पूरे कर 15वें वर्ष में कदम रख रहा है. लेकिन क्या हम कह सकते हैं कि हमने अपने मकसद को पा लिया है? निश्चय ही राज्य प्राप्ति की लड़ाई भी कोई कम नहीं थी. रामपुर तिराहा काण्ड की याद करते ही आज भी पूरा वजूद ही सिहरन करने लगता है. तब लगता था कि संघर्ष की आग से तप कर निकले लोग बेहतर शासक सिद्ध होंगे, उत्तरांचल के रूप में अलग हुआ भू-भाग तरक्की करेगा और यहाँ के लोग खुशहाल होंगे. नरेन्द्र सिंह नेगी की कुछ पंक्तियाँ हैं:
ये दौर जुल्म का बदलेगा,
निखरेंगे दिन-रात देखना
भूगोल पहाड़ों का बदलेगा,
बदलेगा इतिहास देखना.


गिरीश तिवारी गिर्दा ने नए राज्य की परिकल्पना कुछ यों प्रस्तुत की थी:
जै दिन नान-ठुलो नि रौलो, जै दिन त्यर-म्यरो नि होलो
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता कभि न कभि तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जै दिन चोर नि फलालि, क्वैके जोर नि चलोलो
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता कभि न कभि तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में (कोरस)
राज्य मिल गया, देखते ही देखते 14 वर्ष भी बीत गए लेकिन क्या वह सब मिला, जिसकी परिकल्पना की गयी थी? क्या वैसी व्यवस्था कायम हो पाई? क्या गरीब जनता को कुछ हासिल हुआ? क्या महिलाओं के अपमान का बदला लिया गया? क्या भ्रष्टाचार- भाई-भतीजावाद से मुक्ति मिली? शायद नहीं. खुद हमारे नेता ही कह रहे हैं, ‘उत्तराखंड में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है, इससे तो हम उत्तर प्रदेश में ही भले थे!’ 
ऐसा नहीं है कि नया राज्य बनने के बाद यहाँ कुछ हुआ ही नहीं. बहुत कुछ हुआ भी है. मैदानी इलाकों में उद्योग-धंधे शुरू हुए हैं. विकास दर बढ़ी है, गांवों में बिजली पहुंची है, शहरों का विस्तार हुआ है, स्कूल-कालेजों का जाल फैला है, 108 नंबर सेवा शुरू हुई है, पहाडी युवक अब दिल्ली-लखनऊ के ढाबों में बर्तन नहीं मांजते, वे पहाड़ों में ही जीप दौड़ा रहे हैं. गाँव-कस्बों तक अंग्रेज़ी स्कूल खुल गए हैं, गाँव-गाँव तक सड़कें पहुँच रही हैं. ग्राम-प्रधान से लेकर गाँव के बेरोजगार युवक तक सब ठेकेदारी करने लगे हैं. पाथर वाले घरों की जगह लेंटर वाले मकान बन रहे हैं, घर-घर टीवी-मोबाइल पहुँच रहे हैं. अब पहाडी बहुएं अपने परदेशी पिया के वियोग में न्योली नहीं गातीं, मोबाइल नंबर मिला कर बात कर लेती हैं. शादी-व्याह में ब्यूटी पार्लर का चलन बढ़ रहा है. लोग अब छपेली की तान पर नहीं, डीजे पर बजने वाले पंजाबी भांगड़े पर थिरकते हैं. खेती सिकुड़ रही है, व्यापार फल-फूर रहा है. जी हाँ, यदि विकास इसी को कहते हैं, तो हमारा उत्तराखंड खूब विकास कर रहा है.
लेकिन इस विकास के लिए हमने नहीं लड़ी थी अलग राज्य की लड़ाई. इस तरह का विकास तो हर राज्य के हर कोने में हुआ है. इसमें हमारी  सरकारों का क्या योगदान है? यदि पृथक राज्य बनने के बाद आये बदलाव का आकलन करें तो सबसे बड़ा परिवर्तन पलायन के रूप में दिखता है. यों तो पलायन हमारे पर्वतों की त्रासदी शुरू से ही रही है, लेकिन राज्य बनने के बाद इसमें कई गुना तेजी आयी है. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि वर्ष 2000 के बाद ही कोई 1700 गाँव पूरी तरह से उजड़ चुके हैं और इतने ही आधे बंजर हैं. अब खेती कोई नहीं करना चाहता. गाँव की जिस जमीन की कीमत 20 साल पहले एक लाख रुपये थी आज शून्य है. समर्थ लोग हल्द्वानी, रामनगर या कोटद्वार की तरफ सरक रहे हैं. जबकि शहरी जमीन आसमान छू रही है. गाँव के जो स्कूल बच्चों के शोरगुल से गुलजार रहते थे, आज वीरान हैं. इक्का-दुक्का बच्चे जो आते भी हैं, वे मिड दे मील खाकर भाग जाते हैं. अध्यापक खुश हैं कि पढाना नहीं पड़ रहा. यूं भी वहाँ कोई रहना नहीं चाहता. रहे भी क्यों? जब सारी सुविधाएं शहरों में ही केन्द्रित हैं तो गाँवों में, दुर्गम पहाड़ों में कोई क्यों रहे? अपनी ही भूमि से ऐसा मोह-भंग पहले कभी नहीं देखा.
लोग कहते हैं कि नए राज्य का सबसे ज्यादा फायदा नेताओं-ठेकेदारों और ब्यूरोक्रेटों ने उठाया है. हमारे प्रजातंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी शायद यही है कि उसने गाँव-गाँव में ठेकेदारों की फ़ौज खडी की है. इस प्रथा ने गाँव के अंतिम व्यक्ति तक को भ्रष्ट बना दिया है. क्योंकि गाँव का ही ठेकेदार गाँव के ही मजदूर को बिना काम किये आधी मजदूरी पर दस्तखत करवाते हैं, इस तरह उस मजदूर को भी भ्रष्ट बना रहे हैं. बड़े स्तर के भ्रष्टाचार की बात हम नहीं करते. राज्य के विधान सभाध्यक्ष तक इस राज्य में फैले भ्रष्टाचार का दर्द बयान कर चुके हैं.
दुखद पहलू यह भी है कि राज्य बनने से हमारे प्रदेश का अति राजनीतिकरण हुआ है. यहाँ हर आदमी नेता है. हर आदमी मुख्यमंत्री पद का दावेदार है. जो पहले ग्राम-प्रधान नहीं बन सकता था, वह मंत्री बन जाए तो नयी पीढी को वही रोल मॉडल दिखाई पड़ता है. इसलिए राजनीति की प्रयोगशालाओं (छात्र संघों) में अब जबरन वसूली और ठेकेदारी के गुर सिखाये जाते हैं. मेहनत के रास्ते पर कोई नहीं चलना चाहता.     
हमारी 14 बरस की कुल जमा यात्रा कोई सुकून नहीं देती. गंभीरता से देखने पर लगता है कि हम सचमुच पीछे की ओर जा रहे हैं. एक खुशहाल पहाडी राज्य का सपना अब भी अधूरा है. (दैनिक जागरण, हल्द्वानी, नौ नवम्बर, २०१४ से साभार) 

रविवार, 21 सितंबर 2014

कूटनीति की मेज पर हिन्दी

भाषा/ गोविन्द सिंह        
भाषा के मोर्चे पर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसी रेखा खींच दी है, जिसके सामने अब तक की सारी रेखाएं छोटी पड़ गयी हैं. यह रेखा है कूटनीति की मेज पर हिन्दी की. राजनीति यदि जनपथ है तो कूटनीति राजपथ. कोई भाषा कूटनीति की भाषा यों ही नहीं बन जाती. उसे जनता की भाषा तो होना ही पड़ता है, साथ ही अभिजात्य वर्ग की भाषा भी बनना होता है. फ्रेंच भाषा को दुनिया भर में कूटनीति की भाषा के रूप में जाना जाता है तो सिर्फ इसीलिए कि वह दुनिया भर में अभिजात्य वर्ग की भाषा रही है. उसमें साहित्यिक ऊंचाई है तो नफासत भी. दुनिया के अनेक देशों तक उसकी पहुँच रही है. अमेरिका के उत्कर्ष के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे अंग्रेज़ी ने उसकी जगह लेने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक वह पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पायी है. औपनिवेशिक दासता झेल चुके देश ही उसे वैश्विक कूटनीति की भाषा बनाना चाहते हैं. भाषाई कूटनीति का दूसरा पक्ष यह है कि ज्यादातर स्वतंत्र-चेता देश अपनी भाषा में ही कूटनीति करना चाहते हैं. जबकि वर्चस्ववादी देश चाहते हैं कि उनकी भाषा वैश्विक कूटनीति की भाषा बने. आज अधिसंख्य ताकतवर देश अपनी भाषा में ही कूटनीति करते हैं. ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, चीन और जापान इनमें कुछ हैं. ऐसा नहीं है कि इन देशों के नेता अपने पड़ोसी देश की भाषा नहीं जानते. अपनी सामान्य बातचीत में भलेही वे अन्य भाषा में बात करते हों, लेकिन कूटनीति की मेज पर अपनी भाषा ही बोलते हैं, भलेही उसके लिए दुभाषिया ही क्यों न बैठाना पड़े. वे भारत में अपना राजदूत हिन्दी सिखा कर नहीं भेजते.
लेकिन भारत की स्थिति उल्टी रही है. यहाँ कूटनीतिक काबिलियत के लिए अंग्रेज़ी जानना जरूरी है. हमारे यहाँ यह आवाज उठती रही है कि हमें अपनी कूटनीति में अपनी राजभाषा अर्थात हिन्दी का इस्तेमाल करना चाहिए. आजादी से पहले इसमें कोई मतभेद नहीं था. लगभग आमराय थी कि स्वाधीन भारत को अपनी ही भाषा में सब काम करने चाहिए. लेकिन आजादी के बाद, जब हिन्दी-विरोध एक राजनीतिक हथियार बन गया, तब यह काम कुछ मुश्किल हो गया. इसमें सबसे बड़ा विरोध तो ब्यूरोक्रेसी की तरफ से ही आया, जो अपने मूल चरित्र में ही यथास्थितिवादी होती है. उसमें भी हमारी विदेश सेवा हमारी दासवृत्ति का सबसे प्रबल उदाहरण रही है. लम्बे अरसे तक उन्हीं युवाओं को विदेश सेवा में एंट्री मिलती थी, जो ऐसे चुनींदा स्कूलों से पढ़े होते थे, जहां पूरी तरह से अंग्रेज़ी संस्कार दिए जाते थे. उनका भाषाई उच्चारण, चाल-ढाल, खान-पान के तौर-तरीके पूरी तरह से अंग्रेज़ी की चाशनी में डुबोये होते थे. इसलिए आपको याद होगा कि पुराने राजनयिकों में सामंतों-रजवाड़ों के लोग, विदेशों से शिक्षित धनी-मानी लोग ही प्रायः मिलते हैं. आज़ादी के लगभग तीस साल बाद जब सिविल सेवा परीक्षा में सुधार हुए तब जाकर मध्यवर्गीय युवाओं को विदेश सेवा में जगह मिलने लगी. आशय यह है कि वे लोग क्योंकर हिन्दी जैसी जनभाषा को कूटनीति की भाषा बनने देते, जो अंग्रेज़ी संस्कारों में पले-बढ़े हों? इसलिए हिन्दी वालों की यह मांग बनी ही रही कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाया जाये.
उनकी यह हसरत तब पूरी हुई, जब 1977 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण दिया. यह भाषण शुरू में अंग्रेज़ी में लिखा गया था. जब अटलजी को यह भरोसा हो गया कि हिन्दी में भी भाषण दिया जा सकता है, तब अनुवाद करके पढ़ा गया. लेकिन आज तक हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा नहीं बन पायी है क्योंकि हमारी सरकार उसके जरूरी बंदोबस्त नहीं कर रही है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का प्रयोग दूसरी बार 23 नवम्बर, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने दक्षेस देशों के माले सम्मलेन में किया. इन दो प्रयासों के अतिरिक्त कोई और उदाहरण सामने नहीं आता, जब हमारे किसी नेता ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिन्दी में बोला हो. ये दो घटनाएं भी एक तरह से प्रतीकात्मक ही थीं, क्योंकि वास्तव में इनकी वजह से व्यवहार में कोई ख़ास सुधार नहीं आया.
लेकिन जब नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में आये सात पड़ोसी देशों के नेताओं के साथ हिन्दी में बातचीत की तो पहली बार लगा कि अब कूटनीति के अन्तःपुर में हिन्दी पहुँच रही है. उसके बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी हिन्दी में कामकाज शुरू किया. गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी संयुक्त राष्ट्र में गए तो हिन्दी में ही बोले. मोदी ने नेपाली संसद में हिन्दी में भाषण दिया, भूटानी संसद में हिन्दी में भाषण दिया. जापान में भी वे हिन्दी में ही बोले. वे न सिर्फ बोले बल्कि अपनी भाषा में बोलकर वहाँ के लोगों पर भारतीयता की छाप भी छोडी. अब वे संयुक्त राष्ट्र जा रहे हैं, फिर हिन्दी में बोलेंगे. अमेरिका, रूस और चीनी नेताओं के साथ भी वे हिन्दी में ही बोलने वाले हैं, ऐसी सूचना है. प्रधान मंत्री के इस कदम से न सिर्फ हिन्दी का भला होगा, बल्कि कूटनीति भी पटरी पर आयेगी. क्योंकि कूटनीतिक वार्ताओं में भाषा आपके देश और जनता का प्रतिनिधित्व करती है. उससे देश का सर ऊंचा होता है. देश के स्वाभिमान की भाषा कोई देशी भाषा ही हो सकती है. मोदी की पहल पर अनेक पूर्व विदेश सचिवों, राजनायिको की प्रतिक्रियाएं आयीं हैं. सबने इस कदम की सराहना ही की है. 
कूटनीति में भाषा की क्या अहमियत होती है, इसे समझने के लिए दो उदाहरण काफी होंगे. आजादी के तुरंत बाद विजयलक्ष्मी पंडित सोवियत संघ में भारत की राजदूत बनायी गयीं. वे 17 अगस्त, 1947 को मास्को में जोजेफ स्टालिन के पास अपना अंग्रेज़ी में लिखा प्रत्यय पत्र लेकर पहुंची तो स्टालिन ने उसकी भाषा पर आपत्ति की. कहा कि इसकी भाषा न आपके देश की है और न मेरे देश की है. तब कहते हैं कि रातोरात हिन्दी में लिखा पत्र दिल्ली से मास्को भेजा गया. लेकिन भारत के प्रति सोवियत नेताओं का दिल नहीं पसीजा. वे भारत को अंग्रेजों का पिट्ठू ही समझते रहे. ढाई साल तक विजयलक्ष्मी पंडित मास्को में रहीं, स्टालिन ने कभी उन्हें तवज्जो नहीं दी. चीनी प्रधानमंत्री चाओ एन लाई ने नेहरू से कहा कि काश आप अपनी भाषा में हमसे द्विपक्षीय मुद्दों पर बात कर पाते. नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था, तो उन्हें अपनी हाजिर जवाबी का सहारा लेना पडा, ‘सबसे बड़ी भाषा तो प्रेम की होती है’. सच बात यह है कि कूटनीति में प्रेम की भाषा नहीं चलती. कूटनीति की कामयाबी इसी में है कि आप अपनी बात मनवा लें. इसके लिए शायद किसी अन्य देश की भाषा की बजाय अपनी भाषा ज्यादा मुफीद होती है. बेहतर हो कि हमारे तमाम राजनेता, मंत्री, राजनयिक और अन्य ब्यूरोक्रेट अपने सरकारी कामों में हिन्दी का प्रयोग करें और राष्ट्रीय स्वाभिमान को बढायें. (अमर उजाला, २१ सितम्बर, २०१४ से साभार)