शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

बेरौनक होता देहरादून


देहरादून से मैंने अपने कार्य जीवन की शुरुआत की थी, २९ दिसंबर १९८१ को. आठ महीने मैं वहाँ रहा. चार सितम्बर १९८२ की रात मैंने वहाँ से मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ी और छः सितम्बर की सुबह मुंबई पहुंचा. देहरादून के पलटन बाज़ार से खरीदे गए फ़ौजी बैग के साथ मैं टाइम्स बिल्डिंग में घुसा और एक नया जीवन शुरू हुआ. लेकिन देहरादून मुझे बार-बार याद आता रहा. केवल अपनी पहली नौकरी की वजह से नहीं, उस शहर की वजह से भी, जिसने मुझे अपार आत्मीयता दी. देहरादून शहर भी मुझे बहुत लुभावना लगता था. इसकी हरी-भरी वादियाँ, खूबसूरत खेत और राजपुर रोड जैसे कुछ पौश इलाके. पलटन बाज़ार की संकरी गली बहुत अच्छी लगती थी. हर जरूरत की चीज यहाँ मिल जाती थी.

देहरादून की पहचान- घंटाघर

पिछले तीन दशकों में दो-एक बार देहरादून जाने का मौक़ा मिला. लेकिन सन २००० में राजधानी बनने के बाद जिस तेजी के साथ इसमें बदलाव आने लगे, उसने शहर की शान्ति तो भंग की ही, साथ ही शहर से अपनत्व भी छीन लिया. आज ऐसा लगता है, जैसे आप एक निष्प्राण जंगल में घुस आये हैं. वहाँ कदम-कदम पर ट्रैफिक जाम लग जाता है, लोग उसी तरह लड़ते-झगड़ते हैं, जैसे दिल्ली में रोड रेज करते युवा. सचिवालय में घुसने वालों की वैसी ही भीड़ और दिल्ली की ही तरह पार्किंग की समस्या. जगह-जगह दलाल और ठेकेदार. बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर. लाखों के वारे-न्यारे. ऐसे में आत्मा कहाँ से रहेगी. एक तरह से शहर पर धनपशुओं का नियंत्रण हो गया है.
अस्सी के दशक में देहरादून और मसूरी की पहाडियों में चूना-पत्थर खुदाई करने वालों के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा रही थी. इस लड़ाई को लड़ने वाले युवा पत्रकार कुंवर प्रसून, नवीन नौटियाल और गुरुचरण थे. इनमें से कुंवर प्रसून को गुजरे हुए पांच साल हो गए हैं. नवीन नौटियाल को विधि ने पिछले हफ्ते हमसे छीन लिया. गुरुचरण दिल्ली में फ्री लांसिंग कर रहे हैं. जिन दो और अच्छे लोगों को समय से बहुत पहले हमसे छीन लिया गया, उनमें कवि-चित्रकार अवधेश कुमार और गज़लकार हरजीत बरबस याद आते हैं. उन दिनों हम सब लोग अक्सर शाम को टिप-टॉप रेस्तरां में मिला करते थे. जो महत्व दिल्ली में काफी हाउस का था, वही महत्व देहरादून में टिप-टॉप का था. घंटाघर में चकराता रोड पर गोयल फोटो कंपनी के सामने था यह टिप-टॉप. इसके मालिक ने पत्रकारों, लेखकों के लिए हमेशा अपने दरवाजे खोल रखे थे. हम लोग शाम को ३-४ घंटे वहाँ बैठे रहते और बड़ी मुश्किल से एकाध चाय पीते. लेकिन दूकान वाले ने कभी इसका बुरा नहीं माना. कई बार लेखकों की भीड़ देख कर दूसरे ग्राहक दूकान में ही नहीं घुसते थे, इसका भी वे बुरा नहीं मानते थे. वे खुद भी बुद्धिजीवियों की बहस में उलझ जाते. अवधेश कुमार, नवीन नौटियाल, अरविन्द शर्मा, ‘कविजी’ यानी सुखबीर विश्वकर्मा और भी अनेक लोग आया करते. कभी-कभी दिल्ली से हिमानी भट्ट और श्रीश डोभाल, सुरेश उनियाल  भी आया करते. ये लोग अवधेश जी के मित्र थे. इस से हम देहरादूनी लेखकों को दिल्ली से जुड़े रहने का संबल मिलता. महीने में एक बार छायाकार ब्रह्मदेव जी के यहाँ भी साहित्यिक बैठक हुआ करती. जिसमें शहर के जाने माने लेखक शामिल होते. रवीन्द्रनाथ त्यागी, भीमसेन त्यागी, गुरुदीप और कृष्ण खुराना, कुसुम चतुर्वेदी, शशिप्रभा शास्त्री, शैल शर्मा, सुभाष पन्त, पूरण मनराल, सुरेन्द्र चौहान आदि. नवीन नौटियाल के पिताजी की फोटोग्राफी की अच्छी-खासी दूकान थी. वे अज्ञेय और एम एन रॉय के करीबी मित्र थे. उनके पास अनेक दुर्लभ फोटो देखने को मिलते.  
चकराता रोड : क्या हाल हो गया!
पिछले हफ्ते एक बार फिर देहरादून की सड़कों पर घूमने का अवसर मिला. पलटन बाज़ार तो पहले ही चौड़ा हो गया है, हालांकि अब भी उसमें वैसी ही भीड़ है, लेकिन उसका पुराना चरित्र खत्म हो गया है. घंटा घर से चकराता रोड की तरफ जाते हुए जो दुकानें थीं, वे इन दिनों तोडी जा रही हैं. इनमें एक-दो मिठाई की अच्छी दुकानें थीं, गोयल फोटो कंपनी थी और टिप-टॉप रेस्तरां था, सब तोड़ दिए गए हैं. मुझे सबसे ज्यादा गम टिप टॉप के नेस्तनाबूद होने का है. क्योंकि इसी रेस्तरां ने मुझे आठ महीने में ही देहरादून का बना दिया था. पुराने लोगों में भी बहुत कम लोग वहाँ रह गए हैं, पन्त जी जरूर वहाँ बने हुए हैं. लेकिन शहर की साहित्यिक रौनक नदारद है. शहर के बनने और टूटने का सिलसिला जारी है. लेकिन कहीं कोई चीज योजनाबद्ध तरीके से हो रही हो, ऐसा लगता नहीं. वह रे विकास!  
     

6 टिप्‍पणियां:

  1. देहरादून के पुराने दौर का चित्र मानों बायोस्कोप की तरह आंखों के सामने घूम गया । शहरीकरण की अंधी दौड़ ने षहर की आत्मा को ही मार दिया है । एक जानकारीपरक लेख के लिए बधाई । नलिन

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  2. अतीत और वर्तमान के विकासपरक समंवय का बेहतरीन चित्रण, जिसमे अपनापन कहीं खो गया है..भुवन चन्द्र तिवारी

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  3. 22 साल पहले ननिहाल जाता था..पुराना घर..नीँबू का एक बडा पेड..बडा सा आँगन...बडा द्वार..तब वहाँ से आने का मन नहीँ होता था..अब वहाँ पक्का मकान है..आँगन खत्म हो गया..नीँबू का पेड भी नहीँ है..अब सब कुछ बनावटी लगता है..रिश्ते की वजह से कभी-कभी चला जाता हूँ..

    तथाकथित विकास अपनी कीमत तो वसूलेगा ही..

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  4. बेहतरीन सर। देहरादून पर राजधानी थोपना एक बसे-बसाये,खेलते-कूदते और सुंदर शहर
    के साथ किसी बलात्कार से कम नहीं है। बलात्कार पीड़ित ये शहर अब किससे अपनी पीड़ा कहे?

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  5. बहुत सुंदर पोस्ट .... आपने ८० का दशक और पलटन बाज़ार में घुमने की यादें ताज़ा कर दी .... :)

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