street food लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
street food लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 25 जून 2012

ऊफ! ये सड़क किनारे के ढाबे

सफर/ गोविंद सिंह
रेल से रिजर्वेशन न मिलने पर अक्सर बस में सफर करने का ‘सुअवसर’ मिलता रहता है. दिल्ली से हल्द्वानी और हल्द्वानी से दिल्ली. हालांकि दिल्ली से चंडीगढ़, जयपुर और  देहरादून के बीच भी अनेकानेक बस यात्राएं की हैं, लेकिन इधर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की बसों से यात्रा करना बड़ा ही कष्टदेह होता जा रहा है. बसों की हालत खराब, उनमें शायद ही कभी सफाई होती हो. ड्राइवर-कंडक्टर का व्यवहार बड़ा ही रूखा. रात में कहीं भी वे बस को रोक दे सकते हैं. कहीं भी खराबी आने की घोषणा कर सकते हैं. कहीं भी टायर पंचर हो सकता है और आप सड़क में खड़े रहने पर मजबूर हो सकते हैं. सबसे खराब है रात को खाने के लिए कहीं भी, कैसे ही गंदे ढाबे के सामने गाड़ी रोक देना. ऐसे में आप कहीं और जा भी नहीं सकते.
आजकल सड़क किनारे तीन तरह के ढाबे यानी खाने की जगहें हैं. एक बहुत हाई स्टैण्डर्ड के मोटल. वहाँ आम तौर पर लंबे सफर पर जाने वाली कारें या वोल्वो जैसी एसी बसें रुकती हैं. इन जगहों पर अच्छा खाना मिलता है. लेकिन वे इतने महंगे हैं कि खाने के बाद कपडे उतरवा लेते हैं. दूसरे, इकट्ठे चार-छः ढाबों का समूह होता है. वे आम तौर पर साधारण ढाबे होते हैं. न अच्छे, न बुरे. भोजन की क्वालिटी की तुलना में उनके रेट ज्यादा ही होते हैं, फिर भी आप उन्हें झेल सकते हैं. गजरौला, मुरथल आदि के ढाबों को आप इस श्रेणी में रख सकते हैं. तीसरे, ऐसे ढाबे हैं, जो कहीं सुनसान जगह पर अकेले होते हैं, वहाँ खाना बेहद खराब मिलता है और रेट अनाप-शनाप होता है. दुर्भाग्य से साधारण किराया वाली बसें ऐसी ही जगहों पर खाने के लिए रुकती हैं. उन्हें तो खाना मुफ्त मिलता है. लेकिन बाक़ी यात्रियों को मजबूर होकर इन जगहों पर खाना पड़ता है. वे खाना खाते हुए भी ड्राइवर-कंडक्टर को कोसते हैं और पैसे चुकाते वक्त भी. लेकिन वे कुछ बोल भी नहीं सकते. यहाँ ड्राइवर-कंडक्टर की फुल दादागीरी चलती है. मुझे अक्सर ऐसी जगहों पर खाना खा कर दस्त लग जाते हैं या एसिडिटी हो जाती है. ऐसा ही औरों के साथ भी होता होगा.
मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आयी कि ड्राइवर-कंडक्टर के लिए सरकार यह अनिवार्य क्यों नहीं कर देती कि वे अधिकृत ढाबों पर ही गाड़ी रोकें. लोगों के भोजन के साथ खिलवाड़ करना जघन्य अपराध है, फिर क्यों ऐसे ड्राइवर-कंडक्टर को सस्पेंड नहीं किया जाता. सड़क किनारे उग आये इन ढाबों की भी सही जांच शायद ही कभी होती हो. इनमें जो मक्खन मिलता है, वह कितना सही है, जो पनीर होता है, वह कहाँ तक सिंथेटिक है और कहाँ तक असली. तेल, मसाले और खाद्यान्न की भी जांच  नियमित तौर पर होती रहनी चाहिए. विदेशों, खास कर पश्चिमी देशों में अक्सर लोग बाहर और स्ट्रीट फ़ूड ही खाते हैं. लेकिन वे तो बीमार नहीं होते. क्योंकि वहाँ क्वालिटी कंट्रोल रखा जाता है. सरकार के जांच कर्मी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. लेकिन अपने यहाँ रिश्वत के आगे सब झुक जाते हैं, फिर चाहे कोई हमारे पेट पर ही क्यों न डाका दाल रहा हो!