सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ढहती हुई संस्कृति की एक झलक: कुमाऊं की रामलीला

संस्कृति/ गोविंदसिंह

कुमाऊं की रामलीलाबहुत चर्चित रही है. देश को अनेक रंगकर्मी इस रामलीला ने दिए. बी एल शाह, बी एम्शाह, मोहन उप्रेती जैसे कलाकारों ने रामलीला की तालीमों में अपनी आरंभिक दीक्षा लीथी. दिल्ली में थे तो बार-बार रामलीला की याद आती थी. चंडीगढ़, मुंबई और दिल्ली मेंभी कुमाऊं और गढ़वाल की रामलीलाएं देखीं लेकिन वह मज़ा नहीं आता था. हल्द्वानी आयातो मन में बड़ी उमंग थी इन रामलीलाओं को देखने की. यहाँ बहुत सी जगहों पर रामलीलाओंके बैनर दिखे. हल्द्वानी को एक असांस्कृतिक शहर मना जाता है. लेकिन लगभग हरमोहल्ले में सामुदायिक रामलीला मंच बने हुए हैं. जहां नवरातों में रामलीलाएं होतीहैं. यानी ऊपर से असांस्कृतिक लगने वाले इस शहर के भीतर भी जन संस्कृति की एकअजस्र धारा बह रही है. लेकिन उन दिनों कुछ ऐसी व्यस्तताएं रहीं कि नवरातों मेंरामलीला नहीं देख पाया. मन में कसक बनी रही.
लेकिन पिछले दिनों चैतीनवरात्रों से पहले अपने इलाके की एक दूकान पर जब रामलीला का एक नोटिस देखा तो बहुतखुशी हुई. आप कहेंगे कि इस मौसम में रामलीला ! लेकिन कुमाऊं में चैती नवरातों मेंभी रामलीलाएं होती हैं. मेरे गाँव में भी इसी मौसम में लीला होती थी. दूर-दूर केगावों से पैदल चल कर लीला देखने आने वाले दर्शकों के लिए भी यह मौसम सुविधाजनकहोता है. हम लोग पांच किलोमीटर पहाड़ी चढाई चल कर रामलीला देखने निकलते थे. आठ बजेलीला शुरू होती थी और ग्यारह बजे तक खत्म हो जाती थी. हम लोग हाथ में मशालें लिएहुए रात एक-दो बजे तक घर पहुँच पाते थे. मन में चाह होते हुए भी मैं कोई पार्टनहीं खेल पाता था, क्योंकि हमारा गाँव काफी दूर था. लेकिन मेरी क्लास का राजू सीताबना था. और एक क्लास सीनिअर कुंदन ने राम का पार्ट खेला था. हमारे हेड मास्साब ने दशरथऔर राम सिंह सेक्रेट्री ने रावन का. ये छवियाँ कभी नहीं मिटतीं.
पंचवटी में शूर्पणखा के आने की तैयारी
इसलिए इस बार चैतीनवरात्र में ब्लाक इलाके में रामलीला का मैं दिल से इन्तज़ार कर रहा था. दिल्ली सेअपनी पत्नी को भी रामलीला देखने को बुलाया लिया था. एक दिन हम लोग निर्धारित समयसे काफी पहले रामलीला स्थल पर पहुँच गए. शुरू में हमें लगा कि शायद लोग नहींआयेंगे लेकिन धीरे-धीरे भीड़ जुटने लगी. जिस हल्द्वानी में लोग नौ बजे तक सोने लगतेहैं, उसी शहर के एक कोने में लोग दस बजे लीला देखने चले आ रहे थे. अनुशासित होकरअपने स्थान पर बैठ रहे थे. पंडाल काफी अच्छा था. मंच में भी कोई कमी नहीं थी. लोगस्वेच्छा से पंडाल के एक कोने में बैठे आयोजकों के पास जाकर चन्दा देने लगे. मैंनेदेखा कि देखते ही देखते दानदाताओं की लाइन लग गयी. मेरी पत्नी भी सौ रुपये दे आयी.कोई पचास दे रहा है, कोई सौ और कोई दो सौ. यानी ये ऐसे लोग थे जो मुफ्त में लीलानहीं देखना चाहते. आयोजकों की हर तरह से मदद करना चाहते हैं. हम लोग दिल्ली में इसफिराक में रहते थे कि किसी तरह मुफ्त का पास मिल जाए और हम नाटक देख आयें. लेकिनये ऐसे प्रेक्षक हैं, जो पैसे देकर नाटक देखना चाहते हैं. जबकि इनकी माली हालत कोईबहुत अच्छी नहीं है.
अब असली बात पर आतेहैं. जिस लीला का हम घंटे भर से इंतज़ार कर रहे थे, वह शुरू हुई. पहले ‘श्री रामचंद्र कृपालु भगवन’ हुआ. फिर कोई और मंगलाचरण. और फिर लीला. लेकिन जल्दी ही मालूमहुआ कि आयोजकों में दर्शकों के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं है. दो मिनट का सीन, और फिरपटाक्षेप. फिर पीछे से कड़-कड़ कड़-कड़. कोई सूत्रधार नहीं. कोई अनाउंसर नहीं. बीच मेंकोई हास्य का सीन भी नहीं. विभिन्न दृश्यों के बीच कोई तालमेल नहीं. इससे लाख गुनाअच्छी रामलीला ४० साल पहले मेरे गाँव में होती थी. कोई साधन नहीं थे, बिजली नहींथी, लालटेन जला कर मंच पर उजाला किया जाता था. किरदार अपना पार्ट याद करके रखतेथे. हर दृश्य की अपनी धुन होती थी. हर चीज एकदम व्यवस्थित होती थी. उद्घोषक सज्जनकी वाचन शैली को तो मैं कभी नहीं भुला सकता.
घंटा भर ‘लीला’देखने के बाद लगा कि इसका हाल भी दिल्ली की नौसिखिया रामलीला जैसा ही है. लेकिन यहाँतो इसका इतना समृद्ध समाज है! फिर ऐसा क्यों? लगा कि हमारी संस्कृति को जैसे घुनलग गया है. लोग तो ऐसे आयोजनों में जाना चाहते हैं, लेकिन आयोजन करने वाले ही जैसेसब कुछ भूल गए हैं. रामलीला का आयोजन ही नहीं भूले, अपना कर्त्तव्य भी भूल बैठेहैं. यह भी लगा कि लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये धनोपार्जन तो करना चाहतेहैं, लेकिन बदले में देना कुछ नहीं चाहते. हम इस रामलीला के आयोजकों को कोसना नहींचाहते पर इतने सारे दर्शकों का सम्मान तो उन्हें करना ही चाहिए. आपकी इस काहिली कानतीजा यह निकलेगा कि एक दिन आप पंडाल सजा के बैठे रहेंगे और कोई घर से नहींनिकलेगा और कोई मल्टीनेशनल आपके ही बगल में भारी टिकट लेकर रामलीला दिखायेगा. तबआप अपसंस्कृति का रोना रोयेंगे.    

9 टिप्‍पणियां:

  1. वेड विलास उनियाल :
    "आपने बहुत अच्छा लिखा। रामलीला महज श्रीराम की आराधना नहीं। बल्कि लोकमंच की अभिनव प्रस्तुति भी है। दोहा, चौपाई, बहरे तबील, राग रागिनियों और संवाद की प्रस्तुति के साथ इसका मंचन देखते ही बनता है। हर रस से परिपूर्ण है रामलीला। टीवी पर इसे कितना ही देखे। पर मंचन का अपना अलग महत्व है। इस विधा को बचाने की जरूरत है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कुंमाऊ की बैठी और खड़ी होली। आप अब हल्द्वानी में हैं तो इस दिशा में काम होगा ही। यही विश्वास है।"

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  2. दीपक दुआ:
    "बहुत बढ़िया लेख सर... संस्कृति आज हर जगह ढह रही है... रामलीलाओं के शहर दिल्ली में इनका व्यवसायीकरण तो हो ही गया है... यह असर बाकी जगह भी देर-सवेर आना ही है..."

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  3. आपने बचपन में देखी रामलीला की याद दिला दी जिसकी छवियां अमिट हैं. इस संस्‍कृतिकर्म में आई गिरावट चिंता का विषय है.

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  4. बटरोही:
    अतीत की लोक सस्कृति को इस तरह स्मरण किया जाना एक नयी ताकत देता है. विश्व-परिवार का अन्तरंग अंग हो जाने के बाद भी उस प्यारे कोने की यात्रा कितनी सुखद है, इसे सिर्फ महसूस ही किया जा सकता है.

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  5. पूरण मनराल:
    "dhahti sanskruti kumaoni ramleela mein jo tees hai use gobind bhai ne uthaker her pahadpremi ki tees ko ujagar kiya hei.uttarakhand ki ramleela ,holi ,pandav nratya,cholil sarankaar nratiya, nanda utsav mahasu aaradhana sanskruti ke anek aayam hein jo uttarakhand ki dharohar hein lekin aaj inmein jo pradoosan phail raha hei uska namoona lekhak ne diya hei.uttarakhand ko isse bachne ke liye saanskrutik navjagran ki pahal karni hogi. gobind bhai sawal ko uthane ke liye aabhar."

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  6. बिमला बिष्ट:
    आपका लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. बचपन में देखी रामलीला की यादें ताज़ा हो आयीं. कुमाऊं की संस्कृति बची रहे, इसी में हम सबका भला है.

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  7. गोविंदजी आप हल्द्वानी से एक एक कर उन मासूम सुंदर स्मृतियों और स्वप्नों को मानो पुनर्जीवित करने के ढंग से लाइव कर रहे हैं, ये कितना अच्छा है हम सब के लिए. भूमंडलीकरण ने जैसे मानों हमसे वे निश्चल यादें भी छीन ली हैं. इतनी तमाम क्रूरताओं के इस अजीबोग़रीब और भयावह वक़्त में हल्द्वानी लाइव के नज़ारे "सब कुछ होना बचा रहेगा" की सामर्थ्य देते रहते हैं.

    -शिवप्रसाद जोशी

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  8. अनिल शुक्ल:
    "govindji, yeg sankat akele Haldwani Ramleela ka nahi, samoochi hindi patti ke lok natakon ka hai.samajik lok chetna ki mukhya lok dhara se nikal kar jab tak unke samanantar chali rahee hein lok vidhayen, jeevant bani rahi hai. ho ye raha hai ki lok chetna ki dhara aage badh gayi hai lekin lok kalakar aur iske ayojak puratan choti se chipke rah gaye hein. tretment ke star par unhe nayee sadee ke darshakon ke chashme ka katayi khyal naheen. nateeja hai ki apsanskriti aur bazarwad ka kolhu unhe araam se rounde daal raha hai.ramleela, noutanki, bhagat, raasleela ,khayal... sabki yahi trasdee hai."

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