शुक्रवार, 16 मार्च 2012

उत्तराखंड में नेतृत्व का संकट

गोविंद सिंह

उत्तराखंड में राजनीतिक नेतृत्व को लेकर जिस तरह का बवाल मचा हुआ है, वह इस प्रदेश के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. हर व्यक्ति यही सवाल कर रहा है कि उत्तराखंड की जिस धरा ने उत्तर प्रदेश को तीन-तीन मुख्यमंत्री दिए, आज वह धरा नेताविहीन क्यों नज़र आ रही है? कांग्रेस को अपना नेता चुनने में एक हफ्ता लग गया. जो नेता चुना भी तो उसके खिलाफ बगावत पहले शुरू हो गयी. भाजपा भी सदन में अपना नेता नहीं चुन पा रही है. सारा राजनीतिक परिदृश्य अत्यंत निराशाजनक है. जहां देश में उत्तराखंड की फजीहत हो रही है, वहीं उत्तराखंड की जनता सकते की स्थिति में है.
उत्तराखंड की जनता को राजनीतिक तौर पर जागरूक समझा जाता रहा है. लेकिन नए राज्य का दुर्भाग्य यह रहा कि उसे कोई दृष्टिसम्पन्न नेता नहीं मिल पाया. हमें बार बार यह याद दिलाया जाता है कि यदि उत्तराखंड को भी यशवंत सिंह परमार जैसा कुशल और दूरदृष्टिपूर्ण नेता मिल जाता तो प्रदेश का यह हश्र न होता. यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति ही समाज के मूल्यों का निर्माण करती है. आज यदि प्रदेश की जनता गलत निर्णय ले रही है, वह हताश नज़र आ रही है, तो उसके लिए भी राजनीति ही जिम्मेदार है. दरअसल इसके लिए प्रदेश की तुलना में केंद्र की राजनीति ज्यादा जिम्मेदार है. उसने जान बूझकर यह कोशिश की कि राज्य में कोई कद्दावर नेता पैदा ही न हो. पता नहीं राजनीति के किस सिद्धांत के तहत उन्होंने राज्य बनाने के पहले ही दिन से स्थानीय नेताओं पर अविश्वास किया. पहले मुख्यमंत्री के तौर पर नित्यानंद स्वामी को शपथ दिलाई गयी. साल भर के अंदर ही उन्होंने यह हालत कर दी कि भाजपा को उन्हें बदलना पड़ा. आखिरी तीन महीने भगत सिंह कोशियारी को सत्ता सौंपी गयी. तब तक चिड़िया खेत को चट कर चुकी थी.
उसके बाद हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव जीती. लेकिन सत्ता की बात आयी तो नारायण दत्त तिवारी को गद्दी पर बिठा दिया गया. हरीश रावत ठगे से रह गए. खैर तिवारी के रूप में राज्य को एक बड़ा नेता मिलने की खुशी भी थी. लेकिन तिवारी जी की विकास की परिकल्पना उत्तर प्रदेश वाली ही थी. वे उत्तराखंड के हिमायती ही नहीं थे तो विकास की अवधारणा भी कहाँ से आती? उन्होंने राज्य का विकास तो किया लेकिन वह तराई तक ही सीमित रह गया. पहाड़ों को लेकर उनके पास जैसे कोई दृष्टि ही नहीं थी. फिर भाजपा की बारी आयी. उसने भी पांच साल प्रदेश में भाजपा संगठन को खडा करने वाले भगत सिंह कोशियारी को धता बताते हुए भुवन चंद्र खंडूरी को गद्दी पर बिठा दिया. लिहाजा जब तक वह सत्ता में रहे लगातार बगावत होती रही. अपने दो साल के कार्यकाल में वे कोइ खास काम नहीं कर पाए. शायद राष्ट्रीय दलों ने अपने स्थानीय पकड़ वाले नेताओं पर भरोसा किया होता तो यह नौबत ना आती.
सच बात यह भी है कि उत्तराखंड का एकछत्र नेता बन पाना आसान भी नहीं है. उसके लिए स्थानीय पकड़ के साथ ही राष्ट्रीय दृष्टि की अपेक्षा रहती है. गोविंद बल्लभ पन्त के अलावा वह स्थान किसी को नहीं मिल पाया. वह भी इसलिए कि स्थानीय जनान्दोलोनों से उभर कर वह शीर्ष तक पहुंचे थे. उसके बाद हेमवती नंदन बहुगुणा बड़े नेता हुए, लेकिन वह भी पूरे पहाड़ के नेता नहीं बन पाए. इसीलिए उन्हें अपना चुनाव क्षेत्र इलाहाबाद को बनाना पड़ा. तिवारी जी ने खुद को कभी तराई से ऊपर का नेता नहीं समझा. मुरली मनोहर जोशी जैसे कद्दावर नेता को एक हार के बाद ही अल्मोडा को टा-टा कह देना पड़ा. अब वे भी कभी इलाहाबाद तो कभी बनारस को अपना चुनाव क्षेत्र बनाते हैं. वास्तव में पहाड़ की समस्याएं भी पहाड़ सरीखी हैं. जो नेता उन्हें समझ पायेगा, वही यहाँ के लोगों के दिलों में राज करेगा. यहाँ के नेता को कृपया मैदानी चश्मे से मत देखिए. 
अमर उजाला, १६ मार्च, २०१२ से साभार

  

  



 

1 टिप्पणी:

  1. वाह !...'वास्तविकता' को पटल पर रखता हुआ, सटीक आलेख.

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