गुरुवार, 5 जनवरी 2012

प्‍लास्टिक की प्‍लेट


पिछले कुछ समय से एक चीज मन को कचोट रही है। गांव के गांव शहर में तब्‍दील तो हो रहे हैं पर उनमें नागर तौर-तरीके नहीं आ रहे हैं। जीने का सलीका अभी गांव का ही है। गांव का होना गलत नहीं है लेकिन शहर की उपभोग उन्‍मुखी जीवन शैली अपनाने के बाद कुछ नागर जिम्‍मेदारियां भी आनी चाहिए।

सुबह-सवेरे टहलने जाता हूं तो जगह-जगह कचरे को जला कर लोग आग सेक रहे होते हैं। क्‍या बाजार, क्‍या मोहल्‍ले वाले लोग, सबने कचरे को ठिकाने लगाने का एक आसान तरीका ढूंढ निकाला है- कचरे को जला दो। चूंकि ये गांव अपने रंग-ढंग से शहर बन गए हैं, लेकिन ये नगर पालिका जैसे किसी निकाय के अधीन नहीं आते। न ही लोगों को मालूम ही है कि शहरी जीवन के क्‍या तौर-तरीके होते हैं। लिहाजा कचरे जैसी मामूली (?) समस्‍या की तरफ कौन ध्‍यान दे। इसलिए लोगों को सबसे आसान तरीका लगता है जला देना।

छोटे शहर तो क्‍या, दिल्‍ली जैसे महानगरों में भी लोगों को नहीं मालूम कि जिस कचरे को वे जला रहे हैं, उससे निकलने वाले धुएं में कितने भयावह जहर घुले रहते हैं। दिल्‍ली में भी अकसर सुबह की सैर को निकलते वक्‍त देखता था कि सफाई कर्मी आस-पड़ोस के कई लोगों को साथ बिठाकर कचरे को जलाकर आग ताप रहे हैं। और उस कचरे में प्‍लास्टिक, पॉलीथीन, थर्मोकोल के टूटे-फूटे बरतन, प्‍लास्टिक की प्‍लेटें, गिलास, प्‍लास्टिक और जिंक कोटेड कागज, पाउच और थैलियां आदि होतीं हैं। इस कचरे से निकलने वाले धुएं को सूंघते हुए ये लोग आग सेकते रहते हैं। यहां हल्‍द्वानी में तो हर गली-मोहल्‍ले में कचरे को जलते हुए और आस-पास खेलते बच्‍चों और गपियाते बड़ों को देखता हूं तो कलेजा मुंह को आ जाता है। प्‍लास्टिक, पॉलीथीन और थर्मोकोल के जलने से जो धुआं निकलता है, उसमें हाइड्रोजन सायनाइड और क्‍लोरो फ्लोरो कार्बन जैसी गैसें होती हैं। यह परखी हुई बात है कि इन गैसों से कैंसर जैसे असाध्‍य रोग होते हैं। ये गैसें सेहत के लिए तो घातक होती ही हैं, पर्यावरण के लिए भी अत्‍यंत नुकसानदेह हैं। यह कोई नई बात नहीं है कि पॉलीथीन धरती के लिए भी घातक है और पानी के लिए भी। रंगीन पॉली बैग्‍स में लेड और कैडमियम जैसे रसायन होते हैं जो जहरीले और सेहत के लिए खतरनाक होते हैं। शहरों में लोग पॉलीथीन की थैलियों में बचा-खुचा खाना, सब्जियां और अन्‍य चीजें रख कूड़े में फेंक देते हैं। ऐसी जगहों पर गाएं अकसर मुंह मारती दिख जाती हैं। प्‍लास्टिक की थैलियां खाकर रोज गाएं मृत्‍यु को प्राप्‍त हो रही हैं। अकेले लखनऊ में ही रोज 60-70 गायें प्‍लास्टिक का कचरा खाकर मर जाती हैं। ग्रीनपीस नामक पर्यावरण हितैषी संगठन का अध्‍ययन बताता है कि प्‍लास्टिक बैग्‍स के कारण हर साल दस लाख चिडि़यां और एक लाख समुद्री जीव मारे जाते हैं। यानी हमारे आसपास पॉलीथीन बैग्‍स और उनसे निकलनेवाले धुएं के कारण कितने ही जीव विलुप्‍त हो चुके हैं और हो रहे हैं। हाल के वर्षों में जिस तरह से कैंसर का ऑक्‍टोपस महानगरों की देहरी लांघ कर गांवों में पहुंचा है, उससे यह साबित होता है कि प्‍लास्टिक और अन्‍य कीटनाशक अपना काम कर रहे हैं। हमारी सरकारें प्‍लास्टिक बैग्‍स पर प्रतिबंध तो लगा देती हैं लेकिन उसे लागू नहीं करवा पातीं। सवाल प्रतिबंध का नहीं है, उसे रीसाइकिल करने का है। अमेरिका में हमसे कहीं ज्‍यादा प्‍लास्टिक इस्‍तेमाल होता है लेकिन वहां उसका नुकसान उतना नहीं होता। क्‍योंकि वे प्‍लास्टिक को जहां तहां नहीं फेंकते, न ही जला कर आग तापते हैं। पर्यावरण के नाम पर मोटे अनुदान डकारने वाले एनजीओ भी इस बारे में कुछ नहीं सोचते।

2 टिप्‍पणियां:

  1. क्या ही अच्छा हो अगर श्री गोविन्द सिंह उनका यह ब्लॉग क्रम यूँ ही लिखते रहें.गोविन्द, जैसा हम सब ने इन्हें जाना है, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, बहुआयामीय व्यक्तित्व लिए, दिए हमारे साथ हैं चुनांचे बतौर- ए- शराफत ही सही इनका पूरा-पूरा साथ देना ही चाहिए. इसके लिए इनके ब्लॉग से जुड़े रहने मैं ही हम सब का परोक्ष एवं हल्द्वानी का अपरोक्ष हित निहित है. आमीन!

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  2. कृपया बेनामी को पढ़ें मुक्तेश पन्त - शुक्रिया!

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