बुधवार, 16 सितंबर 2015

सरकारी स्कूलों को बचाइए


शिक्षा/ गोविन्द सिंह
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सचमुच आँखें खोल दी हैं. उसने केवल उत्तर प्रदेश के सरकारी प्राइमरी स्कूलों की दशा की पोल नहीं खोली है, वरन पूरे देश की सरकारी स्कूल व्यवस्था पर करारा तमाचा जड़ दिया है. आखिर ये नेता, ये अफसर, ये अमीर लोग आम जनता को समझते क्या हैं? अपने लिए अच्छे-अच्छे स्कूल, साहब बनाने वाले स्कूल और गरीब जनता के लिए सड़े-गले स्कूल. जहां न पानी है, न टॉयलेट है, न भवन है, न प्रयोगशाला है. जहां न शिक्षक है और न ही किताबें हैं. ऐसी अंधेरगर्दी तो अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं थी. तब इक्का-दुक्का ही स्कूल अमीरों के लिए या राजे-रजवाड़ों के बच्चों के लिए आरक्षित थे, बाक़ी सब एक समान सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे. सरकारी स्कूल भी ठीक-ठाक थे. संख्या में वे ज्यादा नहीं थे, पर जितने थे, अच्छे थे. आज की तरह भलेही साधन-संपन्न नहीं थे, किन्तु वहीं से पढ़कर आज के हुक्मरान निकले थे.
आज से चालीस साल पहले कितने पब्लिक स्कूल थे? लगभग ९८ फीसदी लोग सरकारी स्कूलों में जाते थे. क्या वहाँ से निकल कर लोग डाक्टर या इंजीनीयर नहीं बने? क्या अध्यापक-प्रोफ़ेसर नहीं बने? क्या आईएएस-आईपीएस नहीं बनते थे? क्या वे अंग्रेज़ी नहीं जानते थे? क्या उन्हें विज्ञान या गणित नहीं पढ़ाया जाता था? सचाई यह है कि उन स्कूलों में पढ़े हुए लोग कहीं ज्यादा योग्य, समझदार और प्रतिभाशाली निकलते थे. उनमें पढ़ाने वाले अध्यापक कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध और अपने काम के प्रति समर्पित थे.
अंग्रेज़ी माध्यम के तथाकथित पब्लिक स्कूलों की ऐसी आंधी आयी कि सरकारी स्कूल-व्यवस्था भरभराकर गिर गयी. हमारे राजनेताओं और ब्यूरोक्रेटों ने भी इस आंधी के समक्ष शतुरमुर्ग की तरह आँखें मूँद लीं. उन्होंने यह मान लिया कि सरकारी स्कूल बेकार हैं, वहाँ भेजकर बच्चे को बर्बाद ही करना हुआ. तो उन्होंने सबसे पहले अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूलों में भेजना शुरू किया. समाज के अमीर-वर्ग को तो मौक़ा चाहिए था. धीरे-धीरे पूरे मध्य-वर्ग ने सरकारी स्कूलों से खुद को बाहर निकाला. उनकी देखा-देखी निम्न मध्य-वर्ग और निम्न वर्ग भी पब्लिक स्कूलों की ओर अग्रसर होने लगा. केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए केन्द्रीय विद्यालय खोल दिए. ऐसे ही नवोदय विद्यालय भी कुछ बच्चों के लिए आरक्षित हो गए. यानी हर स्तर के लोगों के लिए पब्लिक स्कूल हाजिर होने लगे. बचे रह गए गरीब और उनके लिए सरकारी स्कूल. नतीजा यह हुआ कि सरकारी स्कूलों में वीरानी का साया मंडराने लगा. इससे भी ज्यादा यह हुआ कि जब समाज के प्रभावशाली वर्ग का इन स्कूलों से रिश्ता टूट गया तो इनकी तरफ ध्यान देना भी बंद कर दिया गया. एक पूरे प्राइमरी स्कूल में एक ही अध्यापक से काम चलाने की प्रथा चल पड़ी. कहीं-कहीं तो वह भी शिक्षा-मित्र यानी ठेके के मुलाजिम से यह काम लिया जाने लगा. सस्ती वाहवाही लूटने के लिए नेता धड़ाधड स्कूल खोलने की घोषणाएँ करने लगे, बिना यह देखे कि कोष में अध्यापक रखने के लिए धन भी है या नहीं? स्कूल के लिए जगह भी है या नहीं. स्कूलों की संख्या जितनी ही ज्यादा होती गयी, शिक्षा का स्तर उतना ही नीचे गिरता गया. लिहाजा आज गाँव के लोग, जो थोड़ा भी खर्च उठा सकते हैं, अपने बच्चों को गाँव के स्कूल में न भेज कर नजदीकी कसबे के कथित पब्लिक स्कूल में पढने भेज रहे हैं. मृग-मरीचिका यह है कि वहां भी जो शिक्षा दी जा रही है, वह बेहद अधकचरी है. ऊपर से हमारे राजनेताओं की अदूरदर्शिता और अज्ञान यह कि कभी वे परीक्षा में खुल्लम-खुल्ला नक़ल करने का क़ानून बनाते तो कभी बिना परीक्षा पास किये अगली कक्षा में प्रोन्नत करने के आदेश देने लगे. जिसने पूरे उत्तर भारत में शिक्षा को बरबाद करके रख दिया.
पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढाई का स्तर कुछ सुधरा है. चंडीगढ़ में सरकारी स्कूलों का स्तर लगभग वैसा ही है, जैसा केन्द्रीय विद्यालयों का होता है. लेकिन उत्तर भारत के बाक़ी राज्यों का हाल बेहद खराब है. इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी अगर कोई है तो वह है राजनेता, जिसके स्वार्थ के कारण शिक्षा का राजनीतिकरण हुआ. जिसकी अदूरदर्शिता के कारण स्कूलों की संख्या तो बढी, किन्तु शिक्षा का स्तर गर्त में चला गया. जिसके गलत फैसलों की वजह से शिक्षा का अपराधीकरण हुआ. उसके बाद ब्यूरोक्रेसी दोषी है. जिसे अदालत ने शायद सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना है. उसने सरकारी स्कूलों की व्यवस्था की तरफ से आँखें मूँद लीं. निस्संदेह हम सब लोग भी उतने ही दोषी हैं, जो अपनी सरकारों की आपराधिक लापरवाही को नजरअंदाज करते रहे.
सवाल यह है कि अब क्या होगा? क्या वाकई उच्च न्यायालय का आदेश लागू होगा? अभी से इसे अव्यावहारिक कह कर मखौल उड़ाया जाने लगा है. अदालत सख्ती करेगा तो शायद अगली अदालत में चुनौती देने की जुगत भी हो रही होगी. वास्तव में नासूर इतना भयावह हो चुका है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले से इसका ऑपरेशन हो पायेगा, संभव नहीं लगता. अलबत्ता न्यायालय ने छः महीने के भीतर इस हेतु जो योजना बनाने का निर्देश दिया है, यदि वह भी बन जाए तो बहुत बड़ी बात होगी. इससे भी जरूरी यह है कि अन्य राज्य भी ऐसी ही योजना बनाएं और अपने स्कूलों को बेमौत मरने से बचाएं. (दैनिक जागरण, 23 अगस्त, २०१५ से साभार)     
  

               

पहले शिक्षा में तो हिन्दी को लाइए


हिन्दी दिवस/ गोविन्द सिंह
हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी मास. यानी सरकारी कामकाज में हिन्दी लागू करने-कराने का अभियान. इस अभियान के तहत हम अक्सर उन नौकरशाहों को जी-भर के कोसते हैं, जो हिन्दी को सरकारी फाइलों में नहीं घुसने देते, जो सरकारी चिट्ठियों में हिन्दी नहीं लिखने देते. हम उस सरकारी व्यवस्था को भी कोसने से नहीं चूकते, जो हर साल हिन्दी लागू करने के फर्जी आंकड़े पेश करवाती है और सरकार के पास यह रिपोर्ट भेजती है कि हिन्दी 99 फीसदी आ चुकी है. जबकि सचाई यह होती है कि हिन्दी वहीं की वहीं होती है. लेकिन कई बार मुझे लगता है कि हम फिजूल ही नौकरशाहों को कोसते हैं. हम उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे मरियल पौधों के फूलों को सींचें और पूरी फुलवारी लहलहा उठे.
असल चुनौती है जड़ों को सींचने की. लेकिन दुर्भाग्य से अपने यहाँ जड़ों में पानी डालने की सख्त मनाही है. हमारी सरकार, हमारे नेता, हमारे राजनीतिक दल, हमारे शिक्षक, हमारे नौकरशाह और समूचे तौर पर हमारा समाज भी इस गुपचुप अभियान में शामिल है कि जड़ों में पानी न दिया जाए. जी हाँ, मैं शिक्षा में हिन्दी की बात कर रहा हूँ. आप राजभाषा के तौर पर हिन्दी को लागू करने के लाख जतन कर लें, वह तब तक लागू नहीं हो सकती, जब तक कि आप शिक्षा में अंग्रेज़ी को बढ़ावा देने की अपनी नीति को नहीं बदल लेते. आप लाख विश्व हिन्दी सम्मलेन कर लें, आप उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बना डालें, लेकिन जब तक अपने नौनिहालों के मन से हिन्दी के प्रति घृणा को नहीं निकाल फेंकेंगे, तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला. क्षमा कीजिए, नौनिहाल ही नहीं, उनके मन में घृणा-भाव भरने वाले अध्यापक भी. हम कैसी दोमुंही बात करते हैं? एक तरफ बच्चों को जबरन अंग्रेज़ी बोलने, लिखने और उसी में सपने देखने को कहते हैं, क्लास में हिन्दी बोलने पर प्रताड़ित करते हैं, यही नहीं उन्हें हिन्दी से घृणा करने की हिदायत देते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं स्कूलों-कालेजों से पढ़कर ऊंचे पदों पर बैठे अफसरों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अंग्रेज़ी छोड़ कर हिन्दी को अपनाएँ. वे ऐसा क्यों करें? उन्हें ऐसा क्यों करना चाहिए?
अनेक बार ऐसा लगता है कि शिक्षा की दुनिया का इस देश से, इस राष्ट्र के लक्ष्यों से कोई लेना-देना नहीं है. शिक्षा नीति के करता-धरता चाहते ही नहीं कि अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी को स्कूलों-कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए. इस देश का शिक्षाविद, अपना शोध पत्र यूरोप-अमेरिका की शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाना चाहता है. हिन्दी में छपने वाले पत्र-पत्रिकाओं का उसके लिए कोई महत्व नहीं है. आज भी अध्यापक के चयन में विषय-ज्ञान की जगह अंग्रेज़ी भाषा ज्ञान को तरजीह दी जाती है. अब, हिन्दी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा के रूप में लागू करवाने के लिए हर साल तरह-तरह के संकल्प लिए जाते हैं. लक्ष निर्धारित किये जाते हैं. हर मंत्रालय से कहा जाता है कि वह इस लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भरसक कोशिश करे. लेकिन शिक्षा जगत इस सबसे अछूता रहता है. पता नहीं शिक्षा मंत्रालय क्यों चुप्पी साध लेता है? यहाँ लगातार हिन्दी पिछडती जा रही है. जब मैं बच्चा था, मेरे जिले में एक भी अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल नहीं था. अमीर-गरीब सब हिन्दी माध्यम की समान शिक्षा ग्रहण करते थे. आज उस जिले के दो जिले हो गए हैं और अकेले मेरे जिले में ही तथाकथित अंग्रेज़ी माध्यम के 500 स्कूल खुल गए हैं. वे अंग्रेज़ी सिखा रहे हों या नहीं, नहीं मालूम, इतना तय है कि वे हिन्दी से दूर रहने की हिदायत जरूर देते हैं. गाँव-गाँव तक यह सन्देश पहुंचा दिया गया है कि यदि आगे बढना है तो अंग्रेज़ी सीखना जरूरी है. हम यह नहीं कहते कि हिन्दी नहीं बढ़ रही. वह भी बढ़ रही है लेकिन अंग्रेज़ी उससे दस गुना तेज रफ्तार से बढ़ रही है. पहले समझा जाता था कि हिंदी दलितों-पिछड़ों की भाषा है. लेकिन उन्हें भी यह समझ में आ गया है कि हिन्दी के भरोसे वे बहुत आगे नहीं बढ़ पायेंगे. उनके एक नेता चन्द्रभान प्रसाद ने इसीलिए ‘अंग्रेज़ी देवी’ की पूजा करने का आह्वान किया है. उनका कहना है कि तरक्की का राजमार्ग अंग्रेज़ी से होकर ही गुजरता है.
आजादी के समय कहा गया था कि दस साल के भीतर हिन्दी में अनुवाद की सारी व्यवस्था कर ली जाये. विज्ञान और इंजीनियरिंग की किताबों को हिन्दी में कर लिया जाए. यानी भविष्य में उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी की बजाय हिन्दी में हो. उसके लिए कोशिशें भी हुईं. वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग बना. केन्द्रीय हिन्दी संस्थान बना, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय बना, राज्यों के भाषा विभाग और हिन्दी अकादमियां बनीं. शब्दकोष बने. किताबें लिखी गयीं. लेकिन हिन्दी माध्यम लागू करने की दिशा में हम एक कदम आगे तो दो कदम पीछे ही रहे. गणतंत्र हुए 65 साल हो गए. 1950 में हिन्दी माध्यम की जो किताबें थीं, वे भी गायब हो गयीं. जिन राज्यों में छठी कक्षा से अंग्रेज़ी लागू होती थी, उन्हें भी लगा कि उनके बच्चे पिछड़ रहे हैं. लिहाजा वहाँ भी पहली से ही अंग्रेज़ी लागू होने लगी. उच्च शिक्षा तो दूर, स्कूलों से ही हिन्दी-माध्यम गायब होता जा रहा है. हिन्दी पढ़ना मजबूरी की भाषा बन गयी है. इस देश में जर्मन को तो पिछले दरवाजे से जबरन लागू किया जा सकता है, लेकिन हिन्दी को नहीं.
यही हाल उच्च शिक्षा में हिन्दी का है. एक तरफ कहा जाता है कि हिन्दी में विज्ञान की किताबें नहीं हैं. केंद्र सरकार की राजभाषा नीति के तहत ही हर मंत्रालय हिन्दी में मौलिक लेखन के लिए, अंग्रेज़ी किताबों को हिन्दी में अनूदित करने के लिए लेखकों को हर साल लाखों रुपये के पुरस्कार देता है. इस नज़रिए से देखें तो विज्ञान की सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं. समाज विज्ञानों में तो पहले ही हिन्दी में पुस्तकें हैं. लेकिन ये किताबें पुस्तकालयों में घुन का भोजन बनती रहती हैं. क्योंकि इन्हें विद्यार्थियों तक नहीं पहुँचने दिया जाता. हिन्दी माध्यम लागू हो तब न! अब पत्रकारिता का ही उदाहरण लीजिए. यहाँ 70 प्रतिशत नौकरियाँ हिन्दी में हैं. लेकिन नए खुले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता का माध्यम केवल अंग्रेज़ी रखा गया है. हिन्दी माध्यम से स्नातक परिक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्रो के लिए इन विश्वविद्यालयों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं. पिछले दिनों दिल्ली से दूर एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में जाने का मौक़ा मिला. वहां जो छात्र स्नातकोत्तर कर रहे थे, उन्हें देखकर कहीं से भी नहीं लग रहा था कि वे अंग्रेज़ी वाले होंगे. फिर उसी शहर के एक प्रमुख हिन्दी अखबार के सम्पादक से मिलना हुआ. (वहाँ से हिन्दी के ही अखबार छपते हैं.) उनका कहना था कि जो बच्चे उनके पास प्रशिक्षण के लिए आते हैं, उन्हें भाषा आती ही नहीं. कहाँ से आयेगी? उन्हें तो जबरन अंग्रेज़ी रटाई जा रही थी. वास्तव में वे न हिन्दी के रह गए थे और न अंग्रेज़ी ही सीख पाए थे. यानी गणतंत्र के 65 वर्ष बाद भी जिस देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालय हिन्दी के साथ इस तरह का भेदभाव बरतते हैं, उस देश में आप किस भाषाई आजादी की बात करते हैं? तमाम निजी विश्वविद्यालयों से हिन्दी बाहर है. इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन संस्थानों में हिन्दी के लिए कोई स्थान नहीं है. सब जगह अंग्रेज़ी के विभाग हैं, हिन्दी के नहीं. ऐसे में आप हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा भी बना लेंगे तो कौन-सा एवरेस्ट फतह कर लेंगे?    
हम चाहे लाख विश्व हिन्दी सम्मलेन आयोजित कर लें, जब तक शिक्षा से हिन्दी को दूर रखेंगे, तब तक कोई लाभ होने वाला नहीं है.( हिंदुस्तान, १४ सितम्बर, २०१५ को प्रकाशित लेख का विस्तारित रूप.)  

गुरुवार, 23 जुलाई 2015

हिंदी के विस्तार को व्यवस्था दीजिए

भाषा समस्या/ गोविंद सिंह
क्या आप जानते हैं कि हिंदी की झोली में कितने शब्द हैं? शायद नहीं जानते होंगे। हम भी नहीं जानते थे। जानें भी कैसे? कौन बताए? भला हो ग्लोबल लैंग्वेज मॉनीटर का, जिसने गत वर्ष अपनी सालाना रिपोर्ट में यह बताया था कि हिंदी में महज एक लाख 20 हजार शब्द हैं। जबकि तभी अंग्रेजी ने 10 लाखवां शब्द अपने शब्द भंडार में शामिल करने की घोषणा की थी। है ना आश्चर्य की बात? दुनिया में जितनी बड़ी आबादी हिंदी बोलने वालों की है, लगभग उतनी ही अंग्रेजी बोलने वालों की भी होगी। यह ठीक है कि अंगे्रजी का फैलाव बहुत ज्यादा रहा है, दुनिया के लगभग हर महाद्वीप में उसके बोलने वाले हैं, और हर भाषा से उसने कुछ न कुछ लिया ही है, इसलिए उसके पास शब्दों का भंडार भी उतना ही समृद्ध है, जबकि हम लगातार सिमटते जा रहे हैं। तो शब्दों का भंडार भरे भी तो कैसे? सतही तौर पर देखने पर यह एक जायज तर्क लगता है, लेकिन थोड़ा सा गहराई से पड़ताल करें तो पाएंगे कि हिंदी का क्षेत्र भी कम चौड़ा नहीं है। हिंदी की मां तो संस्कृत है ही, उसकी अपनी बहनें भी कम नहीं हैं। 22 तो संविधान में सूचीबद्ध भाषाएं हैं ही, उनके अलावा सैकड़ों बोलियां और उपबोलियां हैं। जिन-जिन देशों में भारतवंशी पहुंचे हैं, उनकी अपनी भाषाएं बन गई हैं, वे भी हिंदी का विस्तार ही हैं। फिर अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, जर्मन, इटैलियन, चीनी और जापानी  जैसी दर्जनों भाषाएं हैं, जिनके साथ हमारा आदान-प्रदान हो रहा है, जहां से हम शब्द ग्रहण कर सकते हैं या करना चाहिए।
आश्चर्य की बात यह है कि दस लाख से अधिक शब्द होते हुए भी अंग्रेजी भाषा का मूल स्वरूप बना हुआ है या कहिए कि वह विकृत नहीं हुई है, जबकि हिंदी हर रोज लांछित होती रहती है। हिंदी से परहेज रखने वाले लोग हिंदी पर आरोप लगाते हैं कि वह संस्कृतनिष्ठ शब्दों से भरी हुई है, कि हिंदी के कुछ ठेकेदार उसे कुएं के मेंढक की तरह बनाए रखना चाहते हैं, उसे अपनी लक्ष्मण रेखा से बाहर नहीं निकलने देते। जबकि हिंदीवाले इसलिए खफा हैं कि उसमें जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे जा रहे हैं। ऐसा है भी। कुछ अखबार बीच-बीच में सिर्फ इसलिए अंग्रेजी के शब्द छिड़क देते हैं ताकि लगे कि उनके अखबार को अमीर वर्ग के लोग पढ़ते हैं। ऐसी स्थिति में हिंदी विकृत लगेगी ही। लेकिन सोचने की बात यह है कि लाखों शब्द बाहर से लेने पर भी अंग्रेजी नहीं बिगड़ी, जबकि हिंदी एक ही झोंके में धराशायी होती नजर आ रही है। इसलिए कि हमारे यहां भाषा के स्वरूप और पहचान को बचाए रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। 
दरअसल शब्द तो इस सारे परिदृश्य का एक छोटा सा पहलू हैं, जिनसे हिंदी लड़खड़ाती नजर आ रही है। आज जिस तरह से युवा वर्ग हिंदी के लिए देवनागरी के बजाए रोमन का इस्तेमाल कर रहा है, उससे हिंदी के पारंपरिक रूप को एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। जितनी तरह की सूचनाएं और ज्ञान की सामग्री बाहर से आ रही है, उसे अपनी भाषा में अपने बच्चों को देने के लिए हम कतई तैयार नहीं हैं। जितने बड़े पैमाने पर अनुवाद की तैयारी होनी चाहिए, वह कहीं नहीं दिखाई देती। जिस तरह से हिंदी अपने ही देश में फैल रही है, उसकी वजह से सहोदरा क्षेत्रीय भाषाओं के साथ उसके रिश्तों में खटास पैदा हो रही है, उसे संभालने के लिए हमारे पास कोई नीति नहीं है। आरंभिक शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा के मुद्दे को जिस संवेदनशीलता के साथ लिया जाना चाहिए था, वह नहीं लिया गया, लिहाजा जिस गति से हिंदी बढ़ रही है, उससे कहीं अधिक तेजी से अंग्रेजी का फैलाव हो रहा है। पहले वह बड़े शहरों तक ही सीमित थी, आज वह गांव-गांव तक पहुंच रही है। इससे मुकाबले के लिए कहीं कोई छटपटाहट नहीं दिखाई पड़ती।  
यह बात बड़ी दिलचस्प है कि आज की तुलना में आजादी से पहले हिंदी का विकास बेहतर और समन्वित तरीके से हुआ। हिंदी साहित्य, भाषा, पत्रकारिता और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के बीच जैसा तालमेल उस दौर में दिखाई देता है, वह अद्भुत है। आज हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। आजादी से पहले बनी दो संस्थाएं - नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन की ही गतिविधियों पर एक नजर डालें तो आश्चर्य होता है। जहां नागरी प्रचारिणी सभा हिंदी में तमाम तरह के विषयों पर साहित्य निर्माण करवा रही थी, वहीं साहित्य सम्मेलन राजनीतिक, सांस्कृतिक क्षेत्र में उसके लिए ठोस जमीन तैयार कर रही थी। सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन भी लगभग उतनी ही गर्मजोशी के साथ होते थे, जितने कि कांग्रेस पार्टी के। मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास, प्रेमचंद, बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे लोग इन अधिवेशनों की अध्यक्षता किया करते थे। इन अधिवेशनों में न सिर्फ साहित्य सृजन पर विमर्श होता था, बल्कि भाषा, पत्रकारिता, अनुवाद और उसके मानकीकरण पर भी गंभीर चर्चा होती थी। सबसे बड़ी बात यह है कि इन सम्मेलनों में जितने जोश के साथ हिंदी भाषी भाग लेते थे, उसी गर्मजोशी के साथ अहिंदी भाषी नेता, विचारक भी भाग लेते थे। आजादी के बाद हमने चूंकि हिंदी के काम को सरकार को सौंप दिया, और सरकार के मन में इसको लेकर सदा एक खोट रहा, इसलिए यह काम पतन के गर्त में धंसता चला गया। गोष्ठियां आज भी हो रही हैं, सरकार के हर पायदान पर हिंदी कार्यान्वयन समितियां हैं, संसदीय सलाहकार समिति है, केंद्रीय हिंदी समिति है, लेकिन परिणाम फिर भी सिफर ही है। जिस व्यवस्था में केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक में एजेंडा अंग्रेजी में परोस दिया जाता है, उस व्यवस्था से आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं।

हमारा निवेदन यह है कि तमाम अवरोधों के बावजूद आज हिंदी अपने ही बूते पर फैल रही है, उसका बाजार फैल रहा है, दुनिया भर में उसे लेकर एक जागरूकता बनी है, इसलिए आज चुनौतियां कहीं ज्यादा हैं। क्योंकि फैलना या विस्तार पा लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि उसे बनाए रख पाना। हम उसे तभी बनाए रख पाएंगे, जबकि हमारे पास एक मजबूत व्यवस्था हो। दुर्भाग्य से आज संस्थाओं को बनाए रखने में हिंदी समाज की कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई है। आजादी से पहले जिन संस्थाओं ने हिंदी के लिए महान कार्य किए, वे आज मृतप्राय हैं। आजादी के बाद सरकार ने जो संस्थाएं बनाईं, वे सरकार की लालफीताशाही का शिकार हैं। नख-दंत विहीन राजभाषा अधिनियम की तरह सरकारी संस्थाओं की दिलचस्पी भी हिंदी को लागू करने की बजाए उसे उलझाए रखने में रहती है। और निजी क्षेत्र यानी प्रकाशन ग्रहों, मीडिया घरानों के बीच कोई एकता नहीं दिखती। तो हिंदी को कौन बचाएगा? उसका विस्तार अवश्यंभावी है, लेकिन वह अराजक नहीं होना चाहिए। उसे व्यवस्था चाहिए। इसलिए हिंदी समाज अपनी निद्रा तोड़ कर जागे ताकि अपनी भाषा को बचाया जा सके। (दैनिक हिन्दुस्तान, १४ सितम्बर, २०१० से साभार)        

बुधवार, 1 जुलाई 2015

हिन्दी को चाहिए राम चौधरी जैसे सेवक

श्रद्धांजलि/ गोविन्द सिंह 
पिछले दिनों (२० जून, २०१५) अमेरिका में हिन्दी की छत्र-छाया समझे जाने वाले डॉ राम चौधरी का निधन हो गया. डॉ चौधरी के जाने का तो दुःख है ही, लेकिन इससे भी दु:खद यह है कि हिन्दी मीडिया में इसकी सूचना तक नहीं दिखी. आप कहेंगे कौन थे डॉ. चौधरी? 
संक्षेप में उनका परिचय कुछ यों है: वे उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भूलपुर गाँव में १९२७ में पैदा हुए थे. अपने गाँव के  हाईस्कूल से ही उन्होंने आरंभिक शिक्षा ली. अपने गाँव के वे पहले हाई स्कूल पास थे. बाद में आगरा विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पाई. कुछ साल भोपाल के मोतीलाल नेहरू कालेज में पढ़ाया भी लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें अमेरिका पहुंचा दिया, जहां उन्होंने पीएच डी और उससे आगे की पढाई की और न्यूयॉर्क के राज्य विश्वविद्यालय, ओसवेगो में भौतिक शास्त्र के प्रोफ़ेसर बन गए. जहां वे मृत्युपर्यंत (८८ साल की उम्र में) एमिरेटस प्रोफ़ेसर रहे. बेशक फिजिक्स शिक्षा में उनका बड़ा योगदान था, लेकिन हम उन्हें यहाँ उनकी हिन्दी सेवा के लिए याद कर रहे हैं.
प्रो. चौधरी भलेही अमेरिका में थे, लेकिन वे अपने गाँव को कभी नहीं भूले. उन्होंने अपने गाँव में गरीब लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला, जो किसान इंटर कॉलेज नाम से विख्यात हुआ. जिसमें खुद की जेब से एक लाख डॉलर और अपनी पैत्रिक संपत्ति दी और अमेरिका से काफी चन्दा जुटाया. वे आजीवन हिन्दी को उसका स्थान दिलाने के लिए संघर्षरत रहे. उनका कहना था कि हमारे बच्चे अपनी पूरी ऊर्जा अंग्रेज़ी सीखने में ही लगा देते हैं, जिससे मूल विषयों में ध्यान ही नहीं दे पाते.
उन्होंने अमेरिका में हिन्दी के विकास हेतु पहले अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति और बाद में विश्व हिन्दी न्यास गठित कर संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को पहुंचाने की भरसक कोशिशें कीं. जो लोग कहते थे कि विज्ञान को हिन्दी में नहीं पढ़ाया जा सकता, उन्हें उन्होंने हिन्दी में विज्ञान की पुस्तकें लिखकर करारा जवाब दिया. हिन्दी जगत, बाल हिन्दी जगत और विज्ञान प्रकाश आदि पत्रिकाएं प्रकाशित कर हिन्दी की मशाल जलाए रखी. ये पत्रिकाएं अमेरिका में तो हिन्दी भाषियों के बीच सेतु का काम करती ही थीं, साथ ही विश्व भर में फैले हिन्दी प्रेमियों के लिए भी संबल थीं. हिन्दी जगत अब भी डॉ सुरेश ऋतुपर्ण के सम्पादन में सफलतापूर्वक निकल रही है. कुछ समय मुझे भी विज्ञान प्रकाश के प्रकाशन से जुड़ने का मौक़ा मिला. तब उनसे वार्तालाप का अवसर मिला. वे अक्सर रात को फोन करते और देर तक अपने मंतव्य को समझाते. उनका दृढ विश्वास था कि हिन्दी में विज्ञान के गूढ़ विषयों को आसानी से व्यक्त किया जा सकता है. विज्ञान प्रकाश का प्रकाशन इसीलिए किया गया था. वे चाहते थे कि विज्ञान प्रकाश बंद नहीं होना चाहिए, इससे भारत में विज्ञान-शिक्षण हिन्दी में करने में मदद मिलेगी. विज्ञान प्रकाश में विज्ञान के इतिहास पर उनका लंबा कॉलम काफी ज्ञानवर्धक हुआ करता था. वे अंग्रेज़ी शिक्षण के विरोधी नहीं थे, बल्कि हिन्दी का हक छीने जाने के विरुद्ध थे. उन्होंने बताया कि किस तरह एक बार उन्होंने अपने स्कूल में आये अँगरेज़ स्कूल इन्स्पेक्टर के अंग्रेज़ी सवाल का सही उत्तर दे दिया था और बदले में अफसर ने उन्हें पुरस्कार स्वरुप पेन भेंट किया था. वे अक्सर कहा करते थे कि डेढ़-दो सौ साल पहले मॉरिशस, फिजी, ट्रिनिडाड पहुंचे गिरिमिटिया मजदूरों से हमें सबक लेना चाहिए, जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी भाषा और संस्कृति को बचा कर रखा. अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों से उनका कहना था कि हम लोग तो सम्पन्न हैं. हम लोगों ने तरक्की के लिए देश छोड़ा है. हम तो अपनी बोली-भाषा को आसानी से बचा सकते हैं. 
अमेरिका में रह रहे सम्पन्न भारतीयों से वे हिन्दी के लिए धन की गुहार लगाते हुए कहते थे कि हिन्दी को मजबूत करने से केवल हिन्दुस्तान ही मजबूत नहीं होगा बल्कि यह प्रवासी भारतीयों के भी हित में है. उनका कहना था कि भारतीय सरकारों ने हिन्दी की अवहेलना करके संविधान का अनादर किया है.
वे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनवाने के लिए भी निरंतर सक्रिय रहे. इसके लिए वे अमेरिका में सकारात्मक माहौल बनाने में लगे हुए थे. वे इस बात पर दुखी थे कि अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में हिन्दी की पढाई बहुत कम होती है जबकि हिन्दी से कमजोर भाषाओं की पढाई बेहतर तरीके से हो रही है. विश्व हिन्दी न्यास के प्रयासों से रटगर्स विश्वविद्यालय में सन २००१ में आरंभिक हिन्दी कक्षाएं शुरू हो पायीं, इसके लिए न्यास को ८००० डॉलर का अनुदान विश्वविद्यालय को देना पड़ा. उसके बाद १०,००० डॉलर देकर माध्यमिक स्तर की कक्षाएं शुरू की गयीं. उनके मुताबिक़ यदि “ हमें भारत सरकार एवं अमेरिका के धन कुबेरों का समर्थन मिल जाए तो वहाँ एक हिन्दी पीठ की स्थापना की जा सकती है”. एक पीठ के लिए तब तीस लाख डॉलर विश्वविद्यालय को देने होते थे. वर्ष २००८ में उन्होंने लिखा था कि ‘अमेरिका में हिन्दी का कोइ पीठ नहीं है. जबकि कोरियाई भाषा के २७ पीठ हैं. 
अमेरिका के पांच राज्यों में, जहां हिन्दुस्तानियों की संख्या अच्छी-खासी है, वहाँ हिन्दी पीठ बनने चाहिए.’ इसमें भारत सरकार और अमेरिका के भारतवंशी समान भागीदारी करें.’ दुर्भाग्य से बाद के वर्षों में उनकी सेहत कम्रजोर होने लगी और अमेरिकी धन कुबेर भी आगे नहीं आये. वे इस बात के लिए चिंतित रहते थे कि भारतीय धनकुबेर धार्मिक कार्यों के लिए तो जी भर के धन देते हैं लेकिन हिन्दी के लिए नहीं देते. वे चीनियों का उदाहरण देते थे कि किस तरह से वे अपनी भाषा-संस्कृति को दुनिया भर में स्थापित करने की जुगत में लगे रहते हैं. भारत सरकार ने डॉ. राम चौधरी को उनकी हिन्दी सेवा के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर सर्वोच्च सम्मान दिया. साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ से भी सामुदायिक सेवा के लिए पुरस्कृत किया. 
बेशक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कूटनीतिक स्तर पर हिन्दी कुछ आगे बढी है, पर हिन्दी को उसका उचित स्थान दिलाने का उनका सपना अब भी अधूरा है. सिर्फ संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को स्थापित कर देने भर से यह सपना पूरा नहीं होगा. देश के भीतर और बाहर दोनों जगह हिन्दी को उसका जायज हक मिलना चाहिए. हिन्दी को आगे बढाने के लिए चहुंमुखी प्रयास करने होंगे. देश से बाहर बसे ढाई करोड़ भारतवंशियों को जोड़ने का इससे बेहतर और कोई उपाय नहीं हो सकता. (गर्भनाल, भोपाल, अगस्त,२०१५ से साभार)