बुधवार, 13 अप्रैल 2016

किसकी नजर लगी हमारे गांवों को?

पहाड़-यात्रा-1/ गोविन्द सिंह
अपने गाँव के नौले पर मेरी पत्नी द्रौपदी 
लगभग दो साल बाद पिछले हफ्ते पहाड़ यात्रा का सौभाग्य मिला. हल्द्वानी से अल्मोड़ा, शेराघाट, बेरीनाग, थल, मुवानी होते हुए अपने गाँव सौगाँव. अपने गाँव में ईस्ट देव अलायमल के थान में एक गोदान, स्कूल में एक छोटा-सा कार्यक्रम और वापसी. गंगोलीहाट, पाताल भुवनेश्वर, पांखू में कोटगाडी मंदिर होते हुए, डीडीहाट, जौराशी, कनालीछीना और पिथौरागढ़. और फिर घाट, दन्या, दोल., पहाड़पानी, धानाचूली, धारी और भीमताल होते हुए हल्द्वानी वापस आये.
बचपन में जब साल में एक बार गाँव जाते थे तो अनुभूतियाँ कुछ और ही हुआ करती थीं. घर से छः-सात किलोमीटर दूर चौबाटी या मुवानी या बूंगाछीना तक बस या जीप से उतरने के बाद पैदल ही जाना पड़ता था. दूर देश से आते हुए लड़के को देखने को खेतों में काम करते लोग खड़े हो जाते और आपस में ही पूछते, आज किसका लड़का घर आ रहा है! उनके चेहरों पर खिली मुस्कान से लगता कि जैसे उनका अपना लड़का ही घर आ रहा है. कोई-कोई महिला पूछ लेती, इजा, किस गाँव का है, किसका बेटा है! कहाँ से आ रहा है? कितने दिन की छुट्टी आया है? घर पहुँचने की उत्सुकता दिल में धुकधुकी बन कर आती. गाँव का नौला सबसे पहले आता. वहाँ पर पौस (अंजुरी) भर-भर के अपने गाँव का पानी पिया जाता. क्या मिठास होती! कोई हाथ का थैला उठाता, कोई लड़कपन की यादें ताजा करता. तब घर पहुँचते. गाँव भर के लोग मिलने पहुँचते. देखते ही देखते कब महीना गुजर गया, पता ही नहीं चलता था. जब गाँव से लौटते तो गाँव भर के लोग, खासकर महिलायें दूर तक छोड़ने आतीं. सर पर दूब के तिनके रखतीं और सलामती का आशीर्वाद देतीं.
सौगाँव में हमारा पत्रिक घर 
अब पहाड़ के गाँव भी बहुत बदल गए हैं. वो गर्मजोशी अब कहाँ!
ज्यादातर लोग पलायन कर चुके हैं या पलायन की तैयारी कर रहे हैं. पलायन भी कई सस्तरों का है. कुछ लोग हैं, जो पास के ही कस्बों में चले गए हैं. उनकी जमीनें अभी गाँव में भी हैं. खेती भी करते हैं और दुकानदारी भी. वैसे खेती में अब उनका मन कम ही लगता है. कुछ लोग दूर जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ चले गए हैं. उन्होंने वहाँ मकान बना लिए हैं. वे दो-चार महीने में कभी-कभी ही गाँव में दर्शन देते हैं. कुछ परिवारों के बुजुर्ग ही गाँव में रह गए हैं. उनकी बहुएं अपने नौनिहालों को लेकर पिथौरागढ़, डीडीहाट या किसी और शहर में चली गयी हैं. वहाँ वे किराए का कमरा लेकर बच्चों को तथाकथित अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ा रही हैं. उनके फ़ौजी पति फ़ौज से छः महीने-साल में अब शहरों में ही अपनी बीबी-बच्चों से मिल लेते हैं. गाँव कभी-कभार ही जाते हैं. बूढ़े मां-बाप की आँखें अपने फ़ौजी बेटे की सूरत देखने को तरसती रह जाती हैं.      
गोदान की तैयारी में पंडित जी.
जब हम बच्चे थे, तब गाँव में सिर्फ प्राइमरी स्कूल था. अब हाई स्कूल बन गया है. पांच-छः गाँव आस-पास हैं, लेकिन संख्या सिर्फ 44 रह गयी है. दो साल पहले 56 थी. मेरे गाँव के बुजुर्गों ने इस स्कूल को खोलने के लिए अपनी जान लगा दी थी. लेकिन आज मेरे गाँव के एक-दो बच्चे ही इस स्कूल में जाते हैं. बाक़ी सब शहर के स्कूल चले गए हैं. शहर के तथाकथित अंग्रेज़ी स्कूलों में जिस तरह की पढाई हो रही है, मुझे नहीं लगता कि गाँव के हाई स्कूल में उससे कमतर होती होगी. गाँव में जो माहौल उन्हें मिलता, वह शहर में कहाँ. एक बुजुर्ग कहते हैं कि ‘न हवा अच्छी, न पानी अच्छा. वहाँ तो सब मोल ही लेना हुआ.’ स्कूल के अध्यापक बताते हैं कि यहाँ पढाई अच्छी होती है. छः अध्यापक हैं. बच्चे अब फर्स्ट डिवीजन भी ला रहे हैं. फिर भी एक अंधी दौड़ लगी है. भेडचाल है.
गाँव के हाई स्कूल में 
गाँव के युवाओं को शहर जाने का रोग लग गया है. फ़ौजी भी चाहने लगे हैं कि उनकी बीवियां शहर में रहें. ताकि जब वे घर लौटें तो बीवी उनका स्वागत फिल्मी अंदाज में करे. इसलिए जिनके बच्चे नहीं हैं, वे भी किराए में कमरा लेकर शहर में रहने लगी हैं. ताकि गाँव में खेती-बाडी का काम न करना पड़े.
पहले हर घर के गोठ में बैलों की जोड़ी होती थी, भैंस होती थी, गायें होती थीं, बकरियां होती थीं. गोधूलि वेला में जब मवेशियों का रेवड़  जंगल से घर लौटता था, एक अलग ही रौनक गाँव में होती थी. अब गाँव में गाय-भैंस के अल्लाने की आवाज तक सुनाई नहीं पड़ती. न बैल हैं न बकरियां. हमें गोदान के लिए बछिया की जरूरत पड़ी, तो तीसरी बाखली से मंगवानी पड़ी.
अच्छे-अच्छे खेत बंजर दिखाई पड़े. मन में बड़ा दर्द हुआ. एक ज़माना था, जब जमीन के एक-एक टुकड़े के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना खून-पसीना बहाया, हमारी पीढी उसकी तरफ देखती तक नहीं. बुजुर्ग कहते हैं कि जब बच्चे करना ही नहीं चाहते तो हम कब तक अपनी हड्डी तोड़ें? लिहाजा वे भी अब समर्पण कर चुके हैं. किसी ने एकाध गाय रख ली तो रख ली, वरना वह भी किसलिए?
यानी गाँव की तस्वीर बड़ी दर्द भरी है.
खटीमा दीप, 16 मार्च, 2016 में प्रकाशित   

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-04-2016) को ''सृष्टि-क्रम'' (चर्चा अंक-2313) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बिन पानी सब सून - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. यह तो अब हर गाँव की तस्वीर है

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