बुधवार, 3 जुलाई 2013

उत्तराखंड की तबाही के सबक

घटनाक्रम/ गोविंद सिंह 

किसी को भी कल्पना नहीं थी कि मौसम की पहली बरसात ही हज़ारों-हज़ार लोगों की जीवन लीला समाप्त कर देने वाली विभीषिका साबित होगी. १५-१६-१७ जून को उत्तराखंड में हुई भारी बारिश और बादल फटने की घटनाओं के कारण मरने वालों की संख्या २०० से बढ़ कर दस हज़ार तक पहुँचने वाली है. गायब होने वालों की संख्या तो और भी ज्यादा है. जो गाँव के गाँव साफ़ हो गए हैं, उनका हिसाब लगते सालों लग जायेंगे. जो लोग मौत के जबड़ों से बच कर लौट रहे हैं, वे बता रहे हैं कि हालत कितनी भयावह है. अकेले केदारनाथ मार्ग पर ही हज़ारों के मरने की आशंका जताई जा रही है. साथ ही फ़ौज की मदद से ६० हज़ार के लगभग तीर्थ यात्री बचाए जा सके. सैकड़ों तीर्थ यात्रियों, कुलियों, डांडी-कांठी ( डोली) उठाने वालों और घोडेवालों का आता-पता ही नहीं है. नदियों के किनारे बने हुए निर्माण कार्य, होटल, गेस्ट हाउस, रिसोर्ट, दूकानें और गाँव सदा-सदा के लिए नदी के गर्त में समा गए हैं. कारें, ट्रक और अन्य वाहन इस तरह बहते हुए कभी नहीं देखे गए. केंद्र सरकार ने एक हज़ार करोड की मदद का ऐलान किया है, अन्य सरकारें और स्वयं सेवी संस्थाएं भी दे रहे हैं, लेकिन यह सब नाकाफी है क्योंकि नुक्सान कहीं ज्यादा हुआ है. फिर सवाल यह भी है कि अपने देश में राहत पहुँचते-पहुँचते बहुत देर हो जाती है. जिसका तब तक कोई अर्थ नहीं रह जाता. और यही नहीं, इस पर भी अनेक गिद्धों की दृष्टि लगी रहती है, जो किसी भी हाल में उसे बीच में ही हड़प लेने को लालायित रहते हैं. अब देखिए, खबर है कि राहत से भरे हुए अनेक ट्रक ऋषिकेश से ही लौट आये क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि जाएँ तो जाएँ कहाँ.


हालांकि पिछले कुछ वर्षों से मौसम का मिजाज अजीब हरकतें कर रहा है, बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, उससे हमें चौकन्ना हो जाना चाहिए था, लेकिन हम, हमारी सरकारें कहाँ सुधरती हैं? यानी यदि हम थोड़े भी सावधान होते और समय रहते प्रकृति के इस बिगड़े हुए मिजाज को भांप पाते तो इतना नुक्सान नहीं होता. प्रकृति का रौद्र रूप तो पहले भी दिखाई पड़ता था लेकिन आदमी उसे झेल लेता था क्योंकि तब वह इतना लालची नहीं था, प्रकृति के साथ तादात्म्य कायम करके चलता था. वह प्रकृति से उतना ही लेता था, जितना आवश्यक होता था. लेकिन अब हम सब बेहद लालची हो गए हैं, हम प्रकृति का दोहन कर लेना चाहते हैं. मुर्गी के पेट से एक साथ ही सारे के सारे अंडे निकाल लेना चाहते हैं. यानी जहां यह आपदा प्राकृतिक थी, वहीं इससे हुई तबाही सिर्फ और सिर्फ आदमी के लालच का फल है.
उत्तराखंड की यह विभीषिका हमारे सामने एक गंभीर सवाल छोड़ गयी है कि क्या यह आधुनिक विकास का नतीजा है? कहा जा रहा कि ज्यों ज्यों विकास बढ़ रहा है, प्रकृति का कोप भी बढ़ता जा रहा है. विकास की यही गति रही तो कोई भी हमें प्रकृति के कोप से नहीं बचा सकता. लेकिन पश्चिमी देशों को भी तो देखिए. विकास वे भी कर रहे हैं, लेकिन वे प्रकृति का इस तरह से दोहन नहीं कर रहे हैं. आज उत्तराखंड में २२० के आस पास विद्युत संयंत्र हैं. लगभग ६०० संयंत्र प्रस्तावित हैं. टिहरी जैसे संयंत्र भी हैं. जिनके लिए बड़े पैमाने पर धरती के भीतर सुरंगें बनती हैं. ये सुरंगें यों ही नहीं बन जातीं. पृथ्वी के भीतर भारी छेड़-छाड़ करनी पड़ती है. पहाड़ों में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है. सड़कें बनाना गलत नहीं है, लेकिन इस काम के लिए डायनामाईट के बम फोड कर धरती की छाती को चीरना गलत है. खास कर के नदियों के किनारे ऐसी गतिविधियां बेतहाशा बढ़ गयी हैं. यही नहीं हमारी पर्यटन नीति भी पर्यावरण विरोधी है. न हमारी सरकारों के पास कोई दृष्टि है और न हमारे पर्यटकों को ही पर्यटन की तमीज है. हर कोई अधिक से अधिक दोहन करने पर तुला हुआ है. बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हो रहे हैं. लोग नदियों के एकदम किनारे रिसोर्ट बना रहे हैं. दुकानें भी एक तरह से नदी-तट पर ही बनती रही हैं. लोग केवल आज का फायदा देखते हैं, भविष्य की किसी को चिंता नहीं होती. यह सब कुछ व्यापार बढाने के लिए हो रहा है.
इस बार की तबाही का असर आखिर क्यों नदी तटों पर ही ज्यादा पड़ा. भागीरथी, मंदान्किनी, अलकनंदा, विष्णु गंगा, यमुना, पिंडर, धौली, काली, गोरी गंगा, राम गंगा और विष्णु गंगा के तटवर्ती इलाकों पर ही ज्यादा कहर बरपा है. क्योंकि इन्हीं इलाकों में खनन हुआ है, सुरंगें बिछी हैं और बड़े पैमाने पर डायनामाईट के विस्फोट हुए हैं. गढवाल अंचल की नदियों में नदियों के बहाव को बार-बार रोका गया है. पर्यावरणविद बार-बार कहते रहे कि नदियों को अविरल बहने दो, उससे छेड़-छाड मत करो. मगर उनकी कौन सुने? इसरो का कहना है कि हाल के वर्षों में केदारनाथ इलाके में बड़े पैमाने में निर्माण कार्य हुए हैं. जिससे इस नाजुक क्षेत्र की शान्ति ही भंग नहीं हुई, उसकी पारिस्थितिकी पर भी विपरीत असर पड़ा है. पर्यावरण संस्थाओं ने गंगा और यमुना के जलागम क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील इलाका घोषित कर रखा है. लेकिन उन निर्देशों की अवहेलना करते हुए बेहिसाब निर्माण कार्य हो रहे हैं. निर्माण करने के लिए जो मानदंड होते हैं, उनकी जम कर धज्जियां उडाई जाती हैं. सामान्य कायदा है कि यदि आप किसी निर्माण कार्य के लिए पेड़ काट रहे हैं तो बदले में उतने ही पेड़ लगा भी दीजिए. हालांकि उससे भी पर्यावरण को होने वाले नुक्सान की भरपाई तो नहीं हो पाती, फिर भी कुछ तो जिम्मेदारी पूरी होती है. लेकिन सी ए जी की रिपोर्ट कहती है कि बहुत कम परियोजनाएं ही इसका पालन कर रही हैं. दरअसल हमारा तंत्र इतना भ्रष्ट हो चुका है कि कोई भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहता. न सरकार, न प्रायवेट सेक्टर और न ही जनता. ऐसे में प्रकृति का कोप झेलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता.


2 टिप्‍पणियां:

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    1. सबसे बड़ी गलती तो हम लोगों ने की जो वहां से पलायन कर यहां-वहां मैदानी इलाकों में आ गए हैं। वहां के लिए आवाज उठाने, पर्यावरण-विरोधी सरकारों का विरोध करने के लिए जब वहां कोई नहीं है तो तब बात कैसे बनेगी। अपनी धरती-मां को लुटने से बचानेवाले यहां-वहां विसंगतियों के हवाले पड़े हुए हैं।

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