शनिवार, 5 मई 2012

वनफूलों के बीच

प्रकृति/ गोविंद सिंह

मुक्तेश्वर के पास सोनापानी के लिए रवाना होने से पहले मन में कई विचार आ रहे थे. दो साल पहले जून की गर्मी में एक बार सोनापानी को मैं और मेरी बेटी बस छू भर आये थे. यह बड़ी मजेदार जगह है. एक जंगल के बीच फलों का बगीचा है. जिसे लोग सोनापानी एस्टेट के नाम से जानते हैं. किसी अँगरेज़ का लगाया हुआ. लेकिन आजकल यहाँ एक खूबसूरत रिसोर्ट है. एस्टेट में १२ छोटी -छोटी कोटेज हैं. पहाड़ी शैली की. शहर की आपाधापी से दूर दो-एक दिन के लिए यहाँ रहना किसी क्रिएटिव विचार से कम नहीं. इस बार दो दिन रहने का न्योता मिला तो मन में तसल्ली का भाव था. हल्द्वानी से भीमताल-भवाली होते हुए जैसे ही हम रामगढ़ की तरफ दाखिल हुए, नज़ारा देख कर मन आनंद से भर उठा. यहाँ प्रकृति इन दिनों पूरे शबाब पर है. पूरी की पूरी पहाडियां जैसे खिल उठी हैं. सबसे पहले हमारा स्वागत उस ध्वयाँ या धौल्या के फूलों ने किया, जिसके छोटे-छोटे फूलों के लाल गुच्छों से हम बचपन में खूब रस चूसा करते थे. इन दिनों यह खूब खिला हुआ है. सवेरे ११-१२ बजे तक इनके भीतर अत्यंत मधुर रस भरा होता है. उसके बाद धूप इस रस को सोख लेती है. बचपन में स्कूल जाते हुए, गैयाँ चराने वन जाते हुए हम किसी तरह धूप, मधुमक्खियों और भौंरों से पहले ध्वयाँ के रस को पी लेने की फिराक में रहते थे. यूं ध्वयाँ की झाडियाँ जानवरों के चारे और जलावन के काम भी खूब आती हैं. मगर हमारी नज़र तो इसके रस पर टिकी होती.
ध्वयाँ के साथ साथ किलमोड़े के पीले फूलों से हमारी मुलाक़ात होती है. इसकी झाडियों ने भी इन दिनों पीले वस्त्र धारण कर लिए हैं. इसके फूलो का स्वाद कुछ खट्टा होता है. इसके काले-काले फल स्वाद और गुणवान तो बहुत होते हैं, पर कभी-कभी उनमें कीड़े भी मिलते हैं. इसलिए स्वाद होते हुए भी हम उसकी तरफ देखना मुनासिब नहीं समझते थे. सोनापानी से लौटते वक्त कुमाउनी के प्रसिद्ध कवि जुगल किशोर पेटशाली किलमोड़े को लेकर एक कहानी सुनाते हैं. भादों के महीने में जब हिमालय पुत्री गौरा शादी के बाद पहली बार अपने मायके लौट रही थी तब वह वन में राह भटक गयी थी. उसने किलमोड़े के पेड़ से पूछा, भाई मैं अपने घर का रास्ता भूल गयी हूँ. क्या तू मेरी कुछ मदद करेगा? किलमोडे ने अपने कंटीले स्वभाव के अनुरूप झिडक कर कहा, मुझे क्या पता, तेरा घर कहाँ है? मुझे अपने ही काम से फुरसत नहीं, तेरी किसे पड़ी है? जा-जा मुझे तंग मत कर. उसका ऐसा व्यवहार देख गौरा बहुत दुखी हुई. जिन पेड़-पौंधों के साथ वह खेली-कूदी, आज वही ऐसा बर्ताव कर रहे हैं. उसने किलमोड़े को शाप दिया कि जा तेरे फलों में कीड़े पड़ें और तेरी छाँव में कोइ ना बैठ सके. तब से किलमोड़े की कंटीली झाडियों में कोइ नहीं बैठता और उसके फलों में भी अक्सर कीड़े पड़ जाते हैं. जबकि किलमोड़े में गुण ही गुण हैं. उसकी जड़ों का रस पीने से मधुमेह दूर भागता है, मोटापा पास नहीं फटकने पाता. लेकिन क्या करें, सब गुण होते हुए भी लोग उस से दूर ही छिटकते हैं.
कुछ आगे चले तो रामगढ़ की घाटियाँ आड़ू, पुलम, खुबानी, नाशपाती, सेब और मेल के फूलों से महक रही थीं. कहीं झक्क सफ़ेद फूल तो कहीं लाल-गुलाबी और कहीं बैंगनी रंग के फूल. थोड़े आगे निकले तो बुरांस वृक्ष अपनी छटा बिखेर रहे थे. फल्यांट, कटूंज, बांज, रयांज, उतीस, काफल, पयां, क्वेराल यानी कचनार, मालू, सानन और इसी तरह की पहाड़ी प्रजाति के पेड़ों में आ रहे नए पल्लव अलग ही सौंदर्य बिखेर रहे थे. इन सब की अपनी-अपनी कहानियाँ हैं. जंगली रास्तों पर कई पेड़ों को देख कर मैं दंग रह गया. टुनि के पेड़ में आये नए पत्ते ऐसे लाल-ताम्रवर्णी थे कि पूरे जंगल में इसका पेड़ एकदम अलग ही दिखाई पड़ता था. कहीं-कहीं लाल पेड़ में भूरे रंग की बेहद खूबसूरत गुच्छियाँ हैं तो कहीं एक भी पत्ता नहीं दिख रहा, सिर्फ गुच्छे ही गुच्छे. मैं इसको पहचान नहीं पाया. हालांकि मेरा बचपन भी पहाड़ी गाँव में ही बीता है, लेकिन अनेक पेड़ ऐसे थे, जिन्हें मैं नहीं पहचानता था. कई-कई पेड़ पूरे के पूरे किसी खास रंग में नहाये हुए से दीख रहे थे. साथ में बैठे वनस्पति विज्ञानी प्रो. कौल से पूछता हूँ, लेकिन वे भी निरुत्तर हैं. लेकिन लौटते वक्त मेरी जिज्ञासाओं का शमन पेटशाली जी ने किया. ‘ताम्बई रंग के जिस पेड़ में भूरे रंग की गुच्छियाँ हैं, वह टुनि का ही भाई शुनि है. फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें फूल खिले हैं, दूसरे में नहीं. और वह जो पूरा का पूरा पीले कपडे पहने हुए है, वह अकेशिया है. हम लोग इसे अकेशी कहते हैं.’ मैंने अपने गाँव की तरफ ऐसा पेड़ नहीं देखा. आंवले जैसे छोटे-छोटे पत्ते और छोटे ही फूल. जब फूल खिले तो पत्ते पूरी तरह ढक गए. यह वसंत आने से पहले ही खिल उठता है. ऋतुराज के स्वागत में पूरी तरह से सजा-धजा हुआ..... नायिका की तरह.
रामगढ़ से नथुवाखान और नथुवाखान से सोनापानी तक की फल-पट्टी में गज़ब का ऋतुराज पसरा हुआ है. जंगली फूलों को छोड़ दें तो ज्यादातर का रंग सफ़ेद, गुलाबी और बैंगनी हैं. यहाँ सफ़ेद के भी अनेक रूप दिख जायेंगे. कलियों और फूलों की उम्र के आधार पर भी रंग तय होते हैं. रंग सफ़ेद ही होगा, लेकिन किसी पेड़ से हरित आभा निकल रही होती है तो किसी से गुलाबी और किसी से नीली. प्रकृति के इन रंगों को कोइ चित्रकार या रंग बनाने वाला नहीं पकड़ सकता. अब बांज को ही देखिए. यह सदाबहार वृक्ष कभी पूरा नग्न नहीं होता. शिखर से जीर्ण होना शुरू होता है. पहले शिखर के पत्ते झड़ते हैं, फिर बीच के और अंत में सबसे नींचे के. जब नींचे के झड रहे होते हैं तब तक शिखर में नए आ चुके होते हैं. इन दिनों शिखर पर नन्हीं-नन्हीं रजत-कोंपलें आ रही हैं. उनमें हलकी भुरभुरी भी होती है. उसके नीचे के पत्ते पीले पड़ चुके हैं. हफ्ते-दस दिन में गिर जायेंगे. और उसके नींचे के द्रुम दल अभी हरे भरे हैं. यानी एक ही पेड़ में जैसे अपने तिरंगे की तरह तीन रंग समाये हुए हैं. अद्भुत वृक्ष है यह बांज. पहाड़ की प्रकृति समझने वाले लोग इसे कल्पवृक्ष कहते हैं. जहां बांज होगा, वहाँ गरीबी हो ही नहीं सकती. क्योंकि इसकी जड़ों में संचित ठंडा पानी हमेशा आस-पास के गांवों को आबाद रखता है. इसकी  पत्तियों को खाने वाले जानवर ऐसा गाढ़ा दूध देते हैं कि पीते ही बनता है. इसके जर्जर पत्तों से बनने वाली खाद खेतों की उर्वरा शक्ति को लगातार पोसती रहती है.
लेकिन अब वर्चस्ववादी चीड़ इसके इलाके में भी घुसपैठ कर रहा है. वनों की समृद्धि में अपनी जिंदगी खपा देने वाले डॉ जे एस मेहता कहते हैं कि एक ज़माना था जब यह चीड़ ३००० फुट से अधिक ऊंचाई पर नहीं चढ पाता था और १००० फुट से नीचे उतरने की भी इसकी हिम्मत नहीं होती थी. नीचे साल का इलाका है, जबकि ऊपर बांज का. अब चीड़ ६००० फुट ऊपर और ५०० फुट तक नींचे पहुँच चुका है. यह जंगल का माफिया है. सबकी जमीन को लील लेना चाहता है.
लेकिन चीड़ ही क्यों, हम भी क्या कम दुश्मन हैं वनों की इस खूबसूरती के? पेड़ काटने वाले अपनी जगह हैं, हमारी व्यापारिक मनोवृत्ति भी वनों को लगातार बदरंग कर रही है. रामगढ़ क्षेत्र में दाखिल होने से पहले मैं मन ही मन यह सोच रहा था कि अब हमारा स्वागत फूलों से लदे बुरांस वृक्ष करेंगे. लेकिन वे अपेक्षा से कहीं कम नज़र आये. मन मसोस कर रह जाना पड़ा. मेरे मुंह से निकला, शायद इस बार बुरांस कुछ कम खिला है. मुंह में सुपारी दबाये पेटशाली जी ने हाथ से इशारा करके मुझे ऐसा कहने से रोक दिया. फिर पीक थूक कर बोले, जब से बुरांस का रस निकाला जाने लगा है, तब से लोग खिलने से पहले ही उन्हें तोड़ कर सारे के सारे वन-प्रांतर से थैलों में भर-भर कर ले जाते हैं. अब एक दिन आएगा, जब बुरांस खिलना ही बंद कर देगा. फूल नहीं बचेंगे तो बीज कहाँ से होंगे और बीज नहीं बचेंगे तो नए पेड़ कहाँ से जन्म लेंगे? शायद हम अपनी ही सभ्यता को लहू-लुहान कर के आगे बढ़ रहे हैं. (कादम्बिनी, मई, २०१२ में प्रकाशित, साभार)     


8 टिप्‍पणियां:

  1. वेड विलास उनियाल:
    आपने प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। फूल और वृक्षों पर बहुत उपयोगी लेख है। उत्तराखंड के लोगों को सब कुछ पता रहता है सिवा अपनी
    जमीन और जड़ों के। युवा बच्चे अब पेड़ों को नहीं पहचानते। बांज और बुरांश में अंतर नहीं कर पाते। हमारी शिक्षा प्रणाली उन्हें मिसिसिपि और राइन नदी के बारे में तो बताती है, पर गांव की छोटी नहर का उद्गम कहां से हैं यह पता नहीं रहता। लेख इसलिए भी शानदार है।

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  2. प्रकृति का यह सौंदर्य देखने का समय और दृष्टि भी सिमटती जा रही है शायद.

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  3. फूल नहीं बचेंगे तो बीज कहाँ से होंगे और बीज नहीं बचेंगे तो नए पेड़ कहाँ से जन्म लेंगे? बिल्कुल सही सवाल उठाया है आपने।

    धरती की धूल, वन के फूल और नदियों के कूल बेच देने वाला समाज एक दिन अपनी भूल पर पछताएगा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

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  4. अति सुंदर, बुरांस के साथ साथ इस निबंध कला को भी जिलाए रखो प्रभु !

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  5. और इस वेरिफिकेशन की बाधा को हटाइए स्‍वामी

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  6. शिव कुमार राय:
    "वन फूलों के बीच जाने की ख्वाहिश मेरी भी है...आपकी कलम उत्तरांचल की धरती से लोगों को जोड़ रही है...प्रदेश सरकार भले ही इस दिशा में कुछ नहीं करे लेकिन हल्द्वानी लाइव का असर लोगों पर होने लगा है..।"

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  7. दिनेश चंद्र सेमवाल8 मई 2012 को 4:34 am

    हम अपनी जड़ों को भूल गए हैं, अमर बेल की तरह। भूल गए हैं कि जिसके आधार पर सांस ले रहे हैं (प्रकृति) उसका गला भी दबोज रहे हैं।.... कई वनस्पतियों की याद ताजा करा दी आपने तो..... मानो मैं ही कुछ क्षण के लिए वन- विहार कर रहा था।
    दूसरी तरफ बेचारे चीड़ को प्रश्नों के घेरे में लाने की भी कोषिश् है। मैं नहीं मानता यह कि चीड़ कुछ बुरा कर रहा है। यह भी एक प्राणी है। जिस तरह से जंगलों का खात्मा हो रहा है... और इतेफाक से बचे जानवर गांवों- कस्बों की ओर आने पर मजबूर हैं। उसी तरह से हमने चीड़ के जीने लायक आबोहवा और मिट्टी पानी छीन लिया है वह भी कर रहा है। सवाल उसके अस्तित्व का भी है। अब प्रकृति द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा लांघना ही उसके बूते मैं है। हम हैं कि चीड़ को गुंडा- एलीमेंट्स की तरह देख रहे हैं। अब बुरांष के साथ भी यही होने जा रहा है, जिंदगी उसकी भी खतरे में है। देखते हैं, उत्तराखंड का यह राज्य वृक्ष क्या हथकंडा अपनाता है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन वनस्पतियों की सरकार ही हम हैं!

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