मंगलवार, 21 जनवरी 2014

हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य

मीडिया/ गोविन्द सिंह
पिछले एक दशक में देश में आये परिवर्तनों में एक बड़ा परिवर्तन मीडिया में आया बदलाव भी है. अखबार, रेडियो, टीवी और न्यू मीडिया, सब तरफ जबरदस्त उछाल आया है. हिन्दी का सार्वजनिक विमर्श क्षेत्र जितना बड़ा आज है, शायद उतना कभी नहीं था. यही नहीं भविष्य में वह और आगे बढेगा. हिन्दी का मीडिया न सिर्फ अपने देश में जगह बना पाने में कामयाब हुआ है, बल्कि आज उसकी पहुँच दुनिया भर में है. निस्संदेह इसमें टेक्नोलोजी का बड़ा योगदान है. हिन्दी के अखबार लगातार फ़ैल रहे हैं. उनका प्रसार बढ़ रहा है, उनका राजस्व बढ़ रहा है और सत्ता-व्यवस्था में उसकी धमक भी बढ़ रही है. आजादी से पहले तो हिन्दी की पत्रकारिता विशुद्ध मिशनरी थी और घोषित रूप से ब्रिटिश शासन के खिलाफ थी, इसलिए सत्ता के गलियारों में उसकी पहुँच हो भी नहीं सकती थी, और आज़ादी के बाद भी बहुत दिनों तक वह अंग्रेज़ी की चेरी ही बनी रही. सत्ता केन्द्रों में अंग्रेज़ी पत्रकारिता की ही पूछ होती थी. लेकिन अब वह बात नहीं है. हिन्दी पत्रकारिता को अब के सत्ताधारी नजरअंदाज नहीं कर सकते. टीवी की पहुँच इतनी व्यापक है कि सत्तासीन वर्ग उसके आगे गिडगिडाता नजर आता है. आज वे मीडिया घराने भी हिन्दी में अपना चैनल या अखबार निकाल रहे हैं, जो कभी हिन्दी से नफरत किया करते थे. आजादी के आसपास शुरू हुए अखबार आज देश के बड़े अखबार समूह बन चुके हैं. १९८० के आसपास देश के दस बड़े अखबारों में बमुश्किल १-२ हिन्दी अखबार स्थान बना पाते थे, आज शीर्ष पांच अखबार हिन्दी के हैं, यह हिन्दी की ताकत ही है कि वह बिना किसी सरकारी संरक्षण के तेजी से आगे बढ़ रही है. हिन्दी के ब्लॉग दुनिया भर में पढ़े जा रहे हैं. सोशल मीडिया पर आज हमारी नई पीढी धड़ल्ले से हिन्दी का प्रयोग कर रही है. जो लोग देवनागरी लिपि में नहीं लिख सकते, वे रोमन में ही हिन्दी लिख रहे हैं. यह हिन्दी का विस्तार ही तो है. हिन्दी के प्रति नरम रुख रखने वाले मौरिशश- फिजी जैसे देशों को छोड़ भी दिया जाए तो यूरोप-अमेरिका में भी भारतवंशियों की नयी पीढी हिन्दी की तरफ आकृष्ट हो रही है. यानी इंटरनेट ने हिन्दी के लिए दुनिया भर के दरवाजे खोल दिए हैं. भलेही अभी उसे बाजार का समर्थन उस तरह से नहीं मिल रहा है, जैसे अंग्रेज़ी को मिला करता है, फिर भी उसका विस्तार किसी भी अन्य भाषा से ज्यादा हो रहा है.
अभी हिन्दी भाषी राज्यों में सिर्फ २५ प्रतिशत लोग ही अखबार पढ़ते हैं. इसकी वजह कुछ भी हो सकती है. हिन्दी क्षेत्र में साक्षरता बहुत देर में पहुंची है, यहाँ परिवहन के साधन अन्य राज्यों की तुलना में कम हैं,  यहाँ लोगों की क्रय शक्ति कम है, लोगों में जागरूकता कम है, लेकिन सोचिए की जिस दिन ये सारी बाधाएं दूर हो जायेंगी, उस दिन हिन्दी के पाठकों का कितना विस्तार नहीं होगा. आज देश में हिन्दी के १५ करोड़ से ज्यादा पाठक हैं, जबकि अंग्रेज़ी के महज साढे तीन करोड़. यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही है कि फिर भी अंग्रेज़ी पत्रकारिता की धमक ज्यादा है. सत्ता का यह अलोकतांत्रिक व्यवहार बहुत दिन नहीं चलेगा. एक दिन हिन्दी पत्रकारिता को उसका देय मिलकर रहेगा.
यानी हिन्दी पत्रकारिता का संसार लगातार फ़ैल रहा है, वह बलवान भी हो रहा है, उससे प्रभु वर्ग डरने भी लगा है, लेकिन उसके स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है. यह ठीक है कि हिन्दी को शासक वर्ग का समर्थन नहीं मिल रहा है, धनी वर्ग का स्नेह नहीं मिल रहा है, लेकिन हिन्दी की अपनी ताकत भी तो कुछ मायने रखती है, जिसके बल पर वह प्रसार पा रही है. यदि हम अपना स्तर सुधारें तो निश्चय ही उन हलकों में भी हमें सम्मान मिलेगा, जहां अभी हमें हेय दृष्टि से देखा जाता है.
निस्संदेह आज हमारी पत्रकारिता संक्रमण के दौर में है. पिछली सदी के अंतिम दौर में हमें टीवी ने बहुत भ्रमित किया था. तब यह घोषणाएँ हो रही थीं कि हिन्दी की पत्रकारिता कुछ ही दिनों की मेहमान है. टीवी उसे ग्रस लेगा. कुछ अरसा हिन्दी में मायूसी छाई भी रही लेकिन जल्दी ही वह संभल गयी. आज समाचार-टीवी खुद ही भटक गया है. टीआरपी की अंधी दौड़ में वे खुद भी खबरों से बहुत दूर छिटक गए हैं. निहायत अनुभवहीन लोगों के चलते आज उसकी गंभीरता ख़त्म हो चुकी है. उसके प्रति सम्मान ख़त्म होता जा रहा है. जबकि प्रिंट मीडिया फिर से प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहा है.

इसलिए यह जरूरी है कि पत्रकारिता इस अवसर को लपके और अपने स्तर में सुधार करे. यह तभी हो सकता है, जब पत्रकारिता की पवित्रता को बरकरार रखा जाएगा. पेड  न्यूज बंद होनी चाहिए. इसकी वजह से पत्र और पत्रकार जगत को बहुत शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है. इसके लिए पत्रकारों को ही नहीं, पत्र-स्वामियों को भी आगे बढ़ कर पहल करनी होगी. यह सही है कि पत्र निकालना आज एक महँगा सौदा है, लेकिन यकीन मानिए, यदि आप अच्छा काम करेंगे तो आपको पाठक सर-आँखों पर बिठाएँगे. गांधी जी से बड़ा पत्रकार समकालीन विश्व में कोइ नहीं हुआ. अपनी आत्म कथा में उन्होंने कहा था कि, ‘मैं महसूस करता हूं कि पत्रकारिता का केवल एक ही ध्येय होता है और वह है सेवा। समाचार पत्र की पत्रकारिता बहुत क्षमतावान है, लेकिन यह उस पानी के समान है जो बांध के टूटने पर समस्त देश को अपनी चपेट में ले सकती है.’ यानी एक नए युग के निर्माण का अवसर सामने है. हिन्दी पत्रकारिता आगे बड़े और इस बीड़े को उठाये. 
(कैनविज़ टाइम्स, बरेली के लोकार्पण अंक, २२ जनवरी,१४ को प्रकाशित)  

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

बामुसि के रिटायर होने पर

संस्मरण/ गोविन्द सिंह 

दिसंबर के आख़िरी दिन अर्थात ३१ दिसंबर, २०१३ को बाल मुकुंद नव भारत टाइम्स के वरिष्ठ सम्पादक पद से चुपचाप रिटायर हो गया. और रह रह कर याद आ रहा है उसका लिखा पहला व्यंग्य ‘मुन्ना बाबू के रिटायर होने पर’. तब हम लोग नभाटा, मुंबई में ट्रेनी थे. यह लगभग १९८३ की बात है. वहाँ हमारे चीफ रिपोर्टर श्रीधर पाठक हुआ करते थे. वे पुराने जमाने के पत्रकार थे. शायद मैट्रिक पास थे. तीखी नाक वाले, बड़े गुस्सैल आदमी थे. अपने मातहतों को दबा कर रखते थे. मुंबई का अकेला अखबार होने के नाते तब वहाँ नभाटा की तूती बोलती थी. खासकर हिन्दी भाषी मारवाड़ी समाज में उसकी बड़ी पैठ हुआ करती थी. लेकिन वहाँ के बौद्धिक समाज में उसे खरीद कर पढ़ना एक मजबूरी थी क्योंकि कोई विकल्प नहीं था. अखबार का स्तर भी कोई ख़ास नहीं था. हम जैसे युवा पत्रकार इसे नए जमाने का अखबार बनाना चाहते थे. पर पुराने लोग बदलने को तैयार नहीं थे. नए पत्रकारों के निर्विवाद लीडर राम कृपाल जी हुआ करते थे. विश्वनाथ जी दोनों पीढ़ियों के बीच सेतु थे. नए और पुराने लोगों के बीच हमेशा एक टकराव बना रहता था. उन्हीं दिनों पता चला कि पाठक जी के रिटायर होने का समय आ गया है. कंपनी उन्हें दो वर्ष का एक्सटेंशन पहले ही दे चुकी थी. वह समय भी बीत गया था. इसलिए रिटायर तो होना ही था. पाठक जी पूरी तरह से स्वस्थ थे, लिहाजा वे किसी हाल में इस स्थिति के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे. रोज-ब-रोज मारवाड़ी व्यवसाइयों के घर बुलाया जाना, छोटी-छोटी गोष्ठियों की अध्यक्षता करना, फीता काटना, साधूवेला से प्रसाद ग्रहण करना, सम्मान प्राप्त करना, यही उनकी दिनचर्या थी. वे स्वयं ‘आज के कार्यक्रम’ जैसा मामूली कालम बनाया करते थे. शहर में होने वाले इन छोटे-छोटे कार्यक्रमों में उनकी बड़ी दिलचस्पी रहा करती थी. और यह सब टिका था एक अदद चीफ रिपोर्टरी पर. वरना घर और दफ्तर के अलावा उनकी कोई जिन्दगी नहीं थी. इसलिए ऐसे व्यक्ति के लिए रिटायर हो जाने का एहसास ही बड़ा दुखदायी था.
मैं चूंकि एक आज्ञाकारी बालक था, इसलिए वे मुझे बहुत चाहते थे. वे मुझे हर शाम किसी बड़े होटल में भेजते, जहां खाने-पीने की प्रचुर व्यवस्था होती. खबर चार लाइन की बनती. इस तरह की लोकल रिपोर्टिंग में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं उनसे दूर भागता रहता. बाल मुकुंद स्वभाव से ही नटखट था और अक्सर उसकी बातों में भी व्यंग्य रहता था, बेवजह छेड़खानी की उसकी आदत थी. इसलिए पाठक जी की नज़रों में खटकता रहता था.
तो पाठक जी के रिटायर होने की खबर ने ताज़ा हवा के झोंके की तरह दस्तक दी. बाल मुकुंद को बड़ी क्रिएटिव-सी शरारत सूझी. उसने एक व्यंग्य लिख डाला. बहुत चुटीला. व्यंग्य क्या था, सीधे-सीधे पाठक जी पर हमला था. शाम को कमरे में पहुंचे तो हम दोनों ने उसे कई बार पढ़ा. फिर उसमें से वे हिस्से संपादित कर दिए गए, जिनसे लगे कि यह किसके बारे में लिखा गया है. दो-तीन दिन में उसे कई बार तराशा गया. हम दोनों ने उसे संपादित करने में अपनी पूरी सम्पादन कला लगा दी. इस तरह जब वह परफेक्ट व्यंग्य बन गया तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए प्रधान सम्पादक राजेंद्र माथुर के पास दिल्ली भेज दिया एयर बैग से. हमने सोचा था कि यदि सेलेक्ट हो गया तो चार-पांच दिन में छपने का नम्बर लगेगा, तब तक पाठक जी रिटायर हो जायेंगे. लेकिन व्यंग्य जैसे ही दिल्ली पहुंचा, वैसे ही छपने के लिए क्रीड हो गया. और ठीक उसी दिन छप गया, जिस दिन पाठक जी रिटायर हो रहे थे. सम्पादकीय पेज वाले व्यास जी, जो शास्त्रीय संगीत के उद्भट समीक्षक थे, को वह समझ में नहीं आया. उन्होंने उसे चुपचाप छाप दिया. लेकिन जब छप गया तो हडकंप मच गया. पाठक जी उस रोज भी निर्धारित समय पर ऑफिस पहुंचे. उनका चेहरा तमतमाया हुआ था. किसी से बोले नहीं. चुपचाप सीट पर बैठ गए. ‘आज के कार्यक्रम’ बनाने लगे. न्यूजरूम में लोग सिर्फ और सिर्फ बाल मुकुंद के व्यंग्य के बारे में ही खुसुर-पुसुर कर रहे थे. सीनियर-जूनियर, किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी पाठक जी के पास जाने की. तभी किसी वरिष्ठ ने उनके पास जाकर विदाई समारोह के बारे में सूचना देने की कोशिश की. बस फिर क्या था! पाठक जी बिफर पड़े. बोले, ‘यहाँ लोग मेरे बारे में व्यंग्य लिख रहे हैं. मुझे मुन्ना बाबू कह रहे हैं...’ फिर बाल मुकुन्द को ललकारते हुए बोले, ‘क्यों बाल मुकुंद जी, आपने मुझे नाली का कीड़ा लिखा?...मुन्ना बाबू नाली के कीड़े थे, नाली में चले गए... यही लिखा ना?’ बाल मुकुंद को काटो तो खून नहीं. मंद स्वर में गिडगिडाया, ‘ये आपके बारे में थोड़े ही लिखा है?’ लेकिन सच यही था कि लिखा गया था पाठक जी के ही लिए. हाँ, जब लिखा गया तब उसके अंजाम के बारे में सोचा नहीं गया था. खैर बात आयी-गयी हो गयी. पाठक जी का विदाई समारोह हुआ. लेकिन पाठक जी फिर कभी ऑफिस नहीं आये.
आज यह कहानी इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि आज बाल मुकुंद स्वयं रिटायर हो गया है. पिछले ३२ साल वह टाइम्स संस्थान से चिपका रहा. मैं या मेरे जैसे और साथी तो बीच-बीच में बहुत उछल-कूद करते रहे लेकिन उसने कभी इधर-उधर नहीं देखा. एकाध बार मौक़ा आया भी, लेकिन वह नहीं गया. हमारे बीच में वही सबसे प्रतिभाशाली था. उसकी भाषा में गजब की तार्किकता थी. हम चार लोगों ने एक साथ टाइम्स ग्रुप ज्वाइन किया ट्रेनी के रूप में, बाल मुकुंद सिन्हा, अनंग पाल सिंह, अरुण दीक्षित और मैं. शायद मैं सबसे कम उम्र का था. अनंग पाल कई साल पहले वीआरएस लेकर बैठ गया, अरुण दीक्षित भी अभी तक नभाटा में विशेष संवाददाता के रूप में जमा हुआ है, शायद वह ५७ के आसपास होगा. मैं पत्रकारिता की दुनिया को छोड़ कर अध्यापन में आ गया हूँ.
रिटायरमेंट से पहले मैंने बाल मुकुंद से कहा, क्यों नहीं टाइम्स ग्रुप में ही दो-एक साल एक्सटेंशन का प्रयास करते. बोला, ‘नहीं, मैं इस नई तरह की पत्रकारिता से ऊब गया हूँ. कुछ सार्थक करना चाहता हूँ.’ अब देखना है कि वह क्या करता है?
मुझे लगता है कि वह एक श्रेष्ठ व्यंग्यकार है. उसकी पूरी फितरत में ही व्यंग्य छुपा है. मैं उससे हमेशा यही कहता रहा कि उसे बाक़ी सारे काम छोड़ कर व्यंग्य-लेखन करना चाहिए. शुरू में उसने कई अच्छे व्यंग्य लिखे. कई रचनाओं का प्रकाशन-पूर्व का पाठक-सम्पादक मैं रहा. बाद में ‘चौथी दुनिया’ में उसने कुछ अरसा एक व्यंग्य कॉलम लिखा. लेकिन पता नहीं क्यों उसने इसे अपनी स्थायी विधा नहीं बनाया! वह राजनीतिक टिप्पणीकार बनना चाहता था. बौद्धिक बिरादरी में विद्वान् कहलाना चाहता था. तब की पत्रकारिता में यह संभव भी था. उसने टाइम्स फेलोशिप के तहत एक अच्छा काम किया, हिन्दी की पहली शैली पुस्तक लिख कर. यह माथुर साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट था, जिसे बाल मुकुंद ने अंजाम दिया. लेकिन हिन्दी के अखबारों ने उसे नजरअंदाज कर दिया. खुद नभाटा में ही निजाम बदलने से उसकी उपेक्षा हुई तो और अखबार उसे क्यों अपनाते?
एक बार धर्मयुग से मुझे कश्मीर समस्या पर एक लंबा राजनीतिक विश्लेषण लिखने को मिला. तब हम ट्रेनी थे. आज कहा और कल लिखकर देना था. मैं लाइब्रेरी में बैठ कर पढने लगा. क्लिपिंग ले आया. रात भर नोट्स बनाता रहा. सुबह लिखने बैठा तो शरीर कांपने लगा. दस्त लग गए. हालत खराब हो गयी. किसी तरह ऑफिस पहुंचा और धर्मयुग में गणेश मंत्री जी को समस्या बतायी. उन्होंने कहा, अब लेख को ड्राप तो नहीं किया जा सकता. भारती जी को बताना भी ठीक नहीं होगा. वे नाराज हो जायेंगे. कोई विकल्प है? मेरे साथ बाल मुकुंद था. बाल मुकुन्द बोला, ‘यह बोलेगा, मैं लिख दूंगा.’ मंत्री जी मान गए. मैंने अपने नोट्स उसे दिए और जो कुछ मैं समझ पाया था, मैंने उसे बता दिया. उसने दो घंटे में बढ़िया लेख तैयार कर दिया. बाद में वह लेख धर्मयुग में दोनों के नाम से छपा. तीन पेज में छपा.
वह कम लिखता पर उसके राजनीतिक विश्लेषण बहुत उम्दा होते. उसकी लेखकीय तार्किकता का कोई जवाब नहीं था. एक बार हिन्दी आन्दोलन पर राष्ट्रपति की असहायता पर उसके लिखे सम्पादकीय की तबके सम्पादक डॉ सूर्यकांत बाली ने बहुत तारीफ़ की. मुझे आज भी उसका शीर्षक याद है: ‘प्राणहीन पन्नों का पहरुआ’. एक बार उसने देश के बौद्धिक माहौल पर रविवार्ता में बहुत सुन्दर निबंध लिखा, ‘गमले में उगे बुद्धिजीवी.’ बाल मुकुंद की विश्लेषण शैली बहुत बेबाक होती थी. सम्पादकीय बैठक में वह अपनी राय भी बड़ी बेबाकी से रखता. लेकिन उसकी तुनकमिजाजी उसके लिए दुश्मन बनाती रहती. फिर शायद हिन्दी में इस सबकी गुंजाइश भी नहीं रही! इसलिए वह धीरे-धीरे उदास हो गया. उसकी प्रतिभा कुंद होने लगी. उसने व्यंग्य तो लगभग छोड़ ही दिया, बाक़ी विधाओं पर भी कलम चलाने में संकोच करने लगा. समय की जरूरत पर या प्रबंधन की मांग पर कभी-कभार कुछ लिख दिया तो लिख दिया, वरना उसकी अपनी पसंद का उसने हाल-फिलहाल कुछ लिखा हो, मुझे नहीं पता. मुझे दुःख इस बात का है कि हिन्दी जगत में  अब बौद्धिक प्रतिभाओं के लिए जगह घटती जा रही है... खैर, बाल मुकुंद को अपनी नई जिन्दगी के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं.    

   

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

भारत रत्न या सरकारी रत्न?

विवाद/ गोविन्द सिंह
सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न से नवाजकर सरकार ने जैसे बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है. खेल की दुनिया बंट गयी है. राजनेता मुखर होकर कह रहे हैं, क्रिकेट से अरबों रुपये कमाने वाले खिलाड़ी को क्यों भारत रत्न दिया गया? बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि जो शख्श उपहार में मिली फेरारी कार की कस्टम ड्यूटी तक नहीं देना चाहता  और मिलते ही उसे डेढ़ करोड़ में बेच देता है, उसने देश के लिए कौन-सा त्याग किया है, जो भारत रत्न से नवाजा जा रहा है? राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेता एक सुर से कह रहे हैं, अटल बिहारी वाजपयी का भारत रत्न पर पहला हक़ बनता था. कोई कह रहा है कि पहले चौधरी चरण सिंह को दो, कोई कह रहा है कि डॉ लोहिया को दो. खेल प्रेमी कह रहे हैं कि गुलामी के दौर में हाकी जैसे खेल में लगातार स्वर्ण पदक दिलाकर उसे स्थापित करने वाले ध्यान चंद को सरकार ने कैसे भुला दिया? वे कह रहे हैं कि ठीक है, आप सचिन को भी दीजिए, लेकिन खेल श्रेणी से यदि किसी को भारत रत्न दिया जाता है तो उस पर पहला हक़ ध्यान चंद का बनता है. क्रिकेट में ही एक खेमा कह रहा है कि जो व्यक्ति अपनी कप्तानी में खेले गए 13 टेस्ट मैचों में से सिर्फ चार ही जिता पाया हो, और वन डे कप्तान के रूप में भी 23 के मुकाबले  43 मैच हारा हो, उसे कैसे महानतम खिलाड़ी कहा जा सकता है?
यों, भारत रत्न का विवादों में घिर जाना कोई नई बात नहीं है. सचिन की जगह किसी और को यह पुरस्कार दिया जाता, तो भी वह निर्विवाद नहीं होता. इसमें कोई  दो राय नहीं कि सचिन की विफल कप्तानी के बावजूद वे भारतीय क्रिकेट के सबसे चमकते सितारे हैं. उनके अथक  स्टेमिना, धैर्य, लम्बे क्रिकेट करियर और धीर प्रशांत व्यक्तित्व की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है. इसलिए सचिन को भारत रत्न की घोषणा पर कमोबेश खुशी का माहौल दिखा. लेकिन गंभीरता से विचार करने पर लगता है कि सरकार ने जल्दबाजी की है. यदि पिछले दो साल की घटनाओं पर नजर डालें तो सरकार ने ऐसा करके राजनीतिक स्वार्थ साधने की कोशिश की है. जाहिर है,  विपक्षी दलों को अब इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का मौक़ा मिल गया है. लेकिन यह भी सही है कि भारत रत्न पर हमेशा से राजनीति का साया रहा है.
भारत रत्न देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है. पहले यह ‘कला, साहित्य और विज्ञान के उन्नयन हेतु अद्वितीय कार्य तथा श्रेष्ठतम स्तर की सार्वजनिक सेवा’ के लिए दिया जाता था. दिसंबर 2011 में इसमें संशोधन करके ‘मानवीय प्रयासों के किसी भी क्षेत्र में अद्वितीय सेवा/ प्रदर्शन’ के लिए कर दिया गया. निश्चय ही यह उपबंध खेल के हलके से उठी मांग को ध्यान में रखते हुए ही जोड़ा गया था. लेकिन अब लग रहा है कि वास्तव में यह कवायद सचिन के लिए ही की गयी थी. पहले उन्हें राज्यसभा में भेजा गया और फिर भारत रत्न की घोषणा की गयी. साथ ही यह मुद्दा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि ‘सेवा’ के बरक्स ‘प्रदर्शन’ शब्द भी बहुत छोटा पड़ता है. कहा जा रहा है कि यह शब्द भी सचिन को ध्यान में रख कर ही रखा गया था. क्योंकि खेल संसार में ही देखें तो ध्यान चंद के त्याग और शौर्य की तुलना में सचिन कहीं नहीं ठहरते. आज भलेही सचिन हमें बहुत ऊंचे दिखाई दे रहे हों लेकिन जब बात पूरे खेल जगत से चुनने की हो रही हो तो श्रेष्ठतम का ही चुनाव होना चाहिए.
दुर्भाग्य इस बात का है कि सरकार चाहे किसी की हो, भारत रत्न या अन्य पद्म-पुरस्कार हमेशा से राजनीति के शिकार रहे हैं. अब तक नवाजे गए 43 रत्नों में से 23 अकेले राजनीति से हैं. अन्य क्षेत्रों में भी समाज सेवा, शिक्षा, विज्ञान और गीत-संगीत के लोगों को ही भारत रत्न दिया गया. साहित्य में अब तक किसी को यह अलंकरण नहीं दिया गया है. जिसकी सरकार होती है, वह अपने लोगों को पुरस्कार देता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि अब तक जितनों को भी ये अलंकरण प्रदान किये गए, उनसे बेहतर नाम उपलब्ध हो सकते थे. लेकिन सत्ताएं ऐसे ही काम करती हैं.
जहां तक सचिन की पात्रता का सवाल है, वह आज की पीढी के हीरो हैं. कुछ उनके भीतर पात्रता है और कुछ मीडिया ने निर्मित की है, बाज़ार ने बनाई है. घोर पूंजीवाद के इस युग में बाज़ार ही असली सूत्रधार है. पहले बाज़ार समाज के आदर्श खड़े करता है. फिर समाज उसका अनुसरण करता है. यह जरूर है कि वह खोखले महल नहीं खड़े करता. लेकिन जिसे खडा करता है, उससे कीमत भी वसूलता है. इसलिए ऐसे व्यक्ति को भारत रत्न देना कमजोर सरकार की मजबूरी है. लोकप्रियता हमारे जैसे पूंजीवादी लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी है. बेशक उसमें सचिन खरे उतरते हैं. पर लोकप्रियता से आप सांसद भलेही बन जाएँ, भारत रत्न नहीं बन सकते. वरना अमिताभ बच्चन या किसी भी और व्यक्ति में क्या बुराई है? इस तरह तो यह भारत रत्न नहीं सरकारी रत्न बन जाएगा. (यथावत, दिसंबर, २०१३ से साभार)             

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

सर्द हवाओं का संगीत

निबंध/ गोविन्द सिंह
धान की फसल कट चुकी है. खेतों में जगह-जगह रबी की फसल बोई जा रही है. कहीं-कहीं गेहूं की नन्हीं कोंपलें फूटने लगी हैं. काली-काली मिट्टी पर हरे छींट वाली चादर की तरह. सुबह टहलने जाता हूँ तो नन्हीं कोंपलों पर मोती सरीखी ओस की बूंदों को देख मन खुशी और विस्मय से भर उठता है. कभी सूर्य की पहली किरण इन पर पड़ जाए तो यह आभा एकदम स्वर्णिम हो जाती है. कुछ ठहर कर देखता हूँ, अपनी आँखों में इन दृश्यों को भर लेना चाहता हूँ. हरे-भरे खेत में जैसे हजारों-हजार मोती बिखरे हुए हैं. बीच-बीच में इक्का-दुक्का सरसों के फूल उनकी लय को तोड़ रहे हैं. प्रकृति की कैसी लीला है! अच्छा ही हुआ, इस अलसाए-से कसबे में आ गया, वरना महानगर में इस सब से बंचित रह जाता.
दीपावली के साथ ही यहाँ मौसम में गुनगुनी ठण्ड शुरू होने लगती है. हल्द्वानी के जिस इलाके में रहता हूँ, वहाँ अप्रैल-मई में बया का शोर सुनाई देने लगा था. नवम्बर आते-आते वे अपने घोंसले छोड़ कर वन-प्रान्तरों को लौट रही हैं. सर्दी के ख़त्म होने पर वे फिर आयेंगी, फिर से घोंसले बनाने की कवायद शुरू करेंगी. मेरे पड़ोस में मेहता जी के ताड़ वृक्षों पर इन्होने घोंसले बना लिए हैं. ६-७ महीने इनकी चें-पें से मेहता जी का आँगन गुलजार रहता है. आने वाले ६ महीने वीरानी के रहेंगे. घोंसले लटके रहेंगे लेकिन उनमें कोई चहल-पहल नहीं होगी. अगले साल फिर आयेंगी और नए घरोंदे बनाएंगी. सर्दियां बहुतों को अपनी धरती से उखाड़ देती हैं. पुराने जमाने में सर्दियों में पहाड़ों से लोग घाम तापने के लिए मैदानों में पडाव डाल लिया करते थे. तराई-भाबर में बहुत सी जगहें इनके पडाव बनती थीं. मौसम अनुकूल होते ही लोग फिर पहाड़ों की ओर लौट जाया करते थे. आज भी उच्च हिमालयी इलाकों के भोटिया लोग सर्दियों के चार महीने अपने भेड़-बकरियों के साथ मैदानी तलहटियों में आ जाते हैं. लेकिन बयाओं का यह झुण्ड अपेक्षाकृत गर्म मौसम में यहाँ आता है, अपनी गृहस्थी बसाने. शायद इन्हें मानव बस्तियों में सुरक्षित ठिकानों की तलाश रहती है पर  मानव-बस्तियां भी अब कहाँ सुरक्षित रहीं? इनके रहने की जगहें लगातार सिकुडती जा रही हैं.
सर्दी यानी ठण्ड यानी हेमंत ऋतु दस्तक दे चुकी है. अगहन यानी मंगसीर के आते ही मौसम में सर्द हवाओं की मादकता छाने लगती है. इन सर्द हवाओं के भी अनेक रंग देखे हैं. लेकिन प्रकृति का न्याय भी किसी समाजवाद से कम नहीं होता. अपने होने का एहसास वह सबको बराबर कराता है. जो अपनी तमाम सुख-सुविधाओं और ऐशो-आराम के जरिये गरमी या सरदी को जीत लेने का दम भरते हैं, वे गलत हैं. आप सर्दी का आनंद लेना चाहें तो तमाम अभावों के बाद भी ले सकते हैं. और ठण्ड से डरते हों तो तमाम सुविधाओं के बावजूद वह आपको डराकर रहेगी. प्रकृति एक ही कोड़े से सबको हांकती है, वह बात अलग है कि किसी को उसका अहसास होता है और किसी को नहीं.
पिथौरागढ़ जिले में सौगाँव नाम के जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ, वहाँ ख़ास ठण्ड नहीं पड़ती है. चारों तरफ से घिरी पहाड़ियों के बीच तलहटी में जो बसा है. वहाँ प्राइमरी करने के बाद चौबाटी के मिडिल स्कूल में दाखिला लिया. चौबटी लगभग ५००० फुट ऊंचाई पर होगा. अपने गाँव के बच्चे रोज पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़ के चौबाटी पहुंचते. और दोपहर के बाद लौटते. वहाँ कडाके की ठण्ड पड़ती थी. नवम्बर आते-आते ठण्ड पड़नी शुरू हो गयी थी, लेकिन मेरे पास न कोट था और न पैंट. एक हाफ स्वेटर दीदी ने बुनकर भिजवा दिया था. वह मेरे लिए बड़े-बड़े ऊनी कोटों से बढ़कर था. लेकिन कुछ छवियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मनुष्य कभी भुला नहीं पाता. ऐसा ही एक दृश्य हाजिर है. सर्दी की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुला तो मैं नया कोट पहन कर स्कूल गया. मेरे मामाजी ने एक कोट सिलवा कर भिजवा दिया था. मक्खन जीन का कोट. उसके आने की अद्भुत खुशी थी. हलकी बरसात हो रही थी. जिनके पास भरपूर कपडे थे, उन्हें कडाके की ठण्ड लग रही थी. पर मैं अपने कोट के नशे में था. मेरे पास न जूते थे, न पैंट. पैरों में चप्पल और कमर में नेकर. स्कूल में प्रार्थना के वक्त मेरे एक दोस्त ने देखा तो आँखों ही आँखों में खुशी जाहिर की कि आखिर मेरे पास भी कोट आ गया है. लेकिन जैसे ही उसने आँखें नीचे फेरीं तो अफ़सोस जाहिर किया कि पैंट और जूते के बिना कोट का मजा किरकिरा हो गया. लेकिन मुझे कहाँ पैंट की परवाह थी! मैंने गर्व से कहा, ‘मुझे बिलकुल भी ठण्ड नहीं लग रही. कोट जो पहन रखा है!’
एक और दृश्य सुनिए. आठवीं के बाद कनालीछीना इंटर कॉलेज में नौवीं कक्षा में भरती हुआ. यह मेरे घर से काफी दूर यानी पैदल कोई २० किलोमीटर दूर था. महीने में एक बार अपने गाँव आता और महीने भर का सामान लेकर जाता. डेरा करके रहता था. यहाँ और भी ज्यादा ठंड पड़ती थी. दो लड़कों ने एक कमरा किराए में ले रखा था.  कमरा क्या था हवामहल. किराया था नौ रुपये. खुद ही जंगल से लकडियाँ बटोरते और खुद ही खाना बनाते. तब मैं दसवीं में था. सर्दियों की छुट्टियों के बाद एक फरवरी को स्कूल खुलना था. हम दो लड़के ३१ जनवरी को ही अपने डेरे में पहुँच गए थे. हमारे पास ओढने-बिछाने को ख़ास कपडे नहीं थे. शाम होते-होते बारिश होने लगी और रात ढलते बर्फ गिरने लगी. हम कम्बल के भीतर गए तो ठण्ड और परेशान करने लगी. हमने आग जलाई और रात भर हिमपात का आनंद उठाते रहे. सुबह हुई. हमने बाहर आकर देखा कि चारों ओर धरती ने बर्फ की चादर ओढ़ रखी थी. गिरते-फिसलते स्कूल गए. लेकिन प्रिंसिपल ने छुट्टी की घोषणा कर दी. हम लोग डबुल शोर करते हुए कमरे में लौटे. मेरे पास ओढने को एक पुराना कम्बल था. रूम पार्टनर चंद्रू की स्थिति मुझ से कोई बेहतर नहीं थे. लेकिन एक दिन उसके गरीब पिताजी कहीं से जुगाड़ करके उसके लिए २२ रुपये में एक रजाई खरीद कर पहुंचा गए. शायद एक-डेढ़ किलो की थी. मैं खुश था कि चलो एक के पास तो रजाई आयी. एकाध कोना तो मुझे भी मिल ही जाएगा. लेकिन जब रात को सोने का वक्त हुआ तो चंद्रू ने सख्त रवैया अपना लिया, ‘रजाई मेरी है तो मैं ही ओढूंगा.’ मैंने कहा, ‘चल यार कोई बात नहीं.’ जब रात को उसे नींद आ गयी तो मैंने कोशिश की कि मैं भी उसके भीतर समा जाऊं. लाख कोशिश करने पर भी मैं उसके भीतर नहीं आ सका. मैं हार कर अपने कम्बल के साथ सो गया. सच, जिन्दगी कितनी मजेदार होती है! तमाम अभावों के बावजूद हमें कभी ठण्ड ने अपने होने का अहसास नहीं कराया. नाक बहती रहती थी, पर कभी परवाह नहीं की. कभी दवा नहीं खाई. हमारे पंडितजी, महीने में एक बार गाँव भर के बच्चों को एक-एक पुडिया खिला जाते, वही हमारे लिए किसी भी टॉनिक से बढ़कर होती. जिन्दगी बिद्रूपों से भरी होती है. जिस कडाके की सर्दी को बचपन में ही खेलते-कूदते परास्त कर चुका था, जिन्दगी के दूसरे पडाव में पहुंचकर उसे अपने पब्लिक स्कूली बच्चों के साथ एक पर्यटक की तरह देखना कितना अजीब लगता है. जब अपने ही बच्चे हिमपात को देखने पैसे खर्च करके मसूरी-नैनीताल जाते हैं तो लगता है कि एक दिन मैं भी अजायबघर में रखा जाऊंगा.              
दिल्ली जैसे शहरों में सर्दी की मार और भी दुधारी होती है. एक तरफ अट्टालिकाओं में रहने वाले लोग तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद ठण्ड का रोना रोते रहते हैं. घर-दफ्तर सब तरफ कृत्रिम गरमी. थोड़ी-सी भी हवा लग जाए तो बीमारी का डर. जबकि दूसरी तरफ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोग कीड़े-मकोड़ों जैसी जिन्दगी जीने को मजबूर होते हैं. राजधानी दिल्ली में ही हजारों लोग बेघर सड़कों के किनारे उधार की रजाई लेकर रात बिताते हैं. तरक्की की तमाम कहानियों के बावजूद साल दर साल शीत लहर से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. फिर भी वे कभी किसी से शिकायत नहीं करते. करें भी तो किससे? बेशक सर्दी का रिश्ता भूख से होता है. हमारी तरफ सर्दियों की सबसे बड़ी रात को कौव्वे की मूर्छा वाली रात कहा जाता है. क्योंकि कड़कती ठण्ड में भूख के मारे इतनी लम्बी रात काट पाना जब दीर्घजीवी कौव्वे के लिए ही असह्य होता हो तो मनुष्य के लिए कितना कष्टकारी नहीं होगा. कुछ अरसा पहले राजधानी दिल्ली के ही एक उम्दा कालेज में पढने वाली एक लड़की ने अपनी पूरी ईमानदारी के साथ फुटपाथ में रहने वालों के साथ रात बिताने का फैसला लिया, उनके दर्द को करीब से महसूस करने के लिए. लेकिन रात होते-होते उसे असह्य लगने लगा और उसने फोन करके अपने परिजनों को बुला लिया. कितना कठिन होता है सिद्धांत और व्यवहार में! हमारी अधिसंख्य नीतियाँ और योजनायें  इसी तरह तो बनती हैं.
उत्तर भारत के शहरों में सर्दियों की शुरुआत सप्तपर्णी के खिलने से होती है. नवम्बर आते-आते पूरे के पूरे पेड़ सफेद फूलों से लद जाते हैं, जो रात भर गमकते रहते हैं. इधर तराई के साल-शीशम के जंगल भी फूलने लगे हैं, जिनकी छटा दूर से देखते ही बनती है. हालांकि प्रेम के लिए ऋतुराज वसंत को जाना जाता है, लेकिन प्रेम की अंतिम परिणति हेमंत में ही होती है. सचमुच यह रति की ऋतु है. सृजन और विनाश साथ-साथ चलता रहता है. यही ऋतु है, जो सबसे ज्यादा जानें लेती है और यही ऋतु सर्वाधिक जीवन भी देती है. यह जीवन-कामना की ऋतु है. ऋतुसंहार में कालिदास कहते हैं, ‘अनेक गुणों से रमणीय अंगनाओं के चित्तों को हरनेवाला, परिपक्व धानों से ग्रामों की सीमाओं की शोभा बढ़ानेवाला, चारों ओर पाला पड़ा, क्रौंच पक्षियों के गीतों से व्याप्त, बरफयुक्त यह हेमंत ऋतु आप सबको सुख प्रदान करे.’
पद्मावतकार जायसी से इस मौसम में अपनी नायिका का वियोग सहा नहीं गया. विरह विदग्ध नायिका कहती है:
जानहुँ चंदन लागेउ अंगा। चंदन रहै न पावै संगा॥
भोग करहिं सुख राजा रानी। उन्ह लेखे सब सिस्टि जुडानी॥
हंसा केलि करहिं जिमि , खूँदहिं कुरलहिं दोउ ।
सीउ पुकारि कै पार भा, जस चकई क बिछोउ॥9॥

तो भोजपुरी बारहमासा का रचनाकार कह उठता है:

अगहन ए सखी गवना करवले, तब सामी गईले परदेस ।
जब से गईले सखि चिठियो ना भेजले,तनिको खबरियो ना लेस ॥
पुस ए सखि फसे फुसारे गईले, हम धनि बानि अकेली ।
सुन मन्दिलबा रतियो ना बीते, कब दोनि होईहे बिहान ॥

यानी सर्दियां अपने साथ जीवन-मृत्यु, सृजन और विनाश, राग-विराग सबकुछ लेकर आती है. इसमें शिव और ब्रह्मा दोनों सक्रिय रहते हैं. हेमंत ऋतु हमें कष्ट जरूर देती है, लेकिन उसके बाद का आनंद अनुपमेय होता है. घने कोहरे के बाद सूर्योदय की ऊष्मा हमें जीवन की तमाम हकीकतो से सामना करने की ताकत देती है. सचमुच यह हमें पूर्णता देती है. (कादम्बिनी, दिसंबर, २०१३ से साभार)