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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

ऐसे थे हमारे गुरु भारद्वाज जी

संस्मरण/ गोविन्द सिंह 
तीस तारीख की सुबह देहरादून में था. कोई दस बजे होंगे. दून विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में एक बैठक में जाने को तैयार हो ही रहा था कि तभी शिमला से अपने बालसखा डॉ. रजनी कांत पाण्डेय का फ़ोन आया. स्क्रीन पर उसका नाम देख दिल की धड़कन कुछ तेज हुई. वह ऐसे ही फोन नहीं करता. क्या बात होगी! तभी उस तरफ से आवाज आयी कि डॉ भारद्वाज नहीं रहे. दिल में गहरे तक चुभ गए ये शब्द. 1978 से 1981 तक उनकी कक्षाओं में बिताये तीन वर्ष और उसके बाद के ये 35 साल एक ही झटके में आँखों के भीतर से बाहर आने को जैसे धक्के मारने लगे. अभी 15 दिन पहले ही पांडे ने बताया था कि ‘डॉ भारद्वाज की तबियत ठीक नहीं है. पीजीआई में भरती हैं. मौक़ा मिले तो दर्शन कर जाओ. कैंसर है. पहले भी महीने भर अस्पताल हो आये हैं. इस बार कुछ ज्यादा ही खतरा लग रहा है.’ 17 मार्च को कुरुक्षेत्र गया तो उनके चरण छूने चंडीगढ़ भी हो आया, अपने एक और सहपाठी डॉ. सुखपाल वर्णी के साथ. तब डॉ. साहब को देख बड़ा कष्ट हुआ. जिन्दगी की जंग लड़ रहे थे. बहुत छटपटा रहे थे. फिर भी एक हलकी-सी मुस्कान हमारी तरफ बिखेर गए. बहन संगीता अमेरिका से पापा की सेवा के लिए आयी हुई थी. उसने पहले ही आगाह कर दिया था कि बाहरी लोगों का अन्दर आना मना है. इसलिए दूर से ही देख लेना. हमने वैसा ही किया. वार्ड के बाहर ही आंटी जी से हाल-चाल लेते रहे. फिर लौट आये. आज पांडे के शब्दों से जहां दिल को गहरा झटका लगा, वहीं एक भाव यह भी आया कि चलो डॉ. साहब को कष्ट से मुक्ति मिली.   
1978 की जुलाई में हमने पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एमए प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया. जिन प्राध्यापकों का मार्गदर्शन मिला, उनमें प्रो. मैथिली प्रसाद भारद्वाज भी एक थे. छोटा कद और दुबली काठी. भीड़ में जाएँ तो खो जाएँ. लेकिन क्लास में पढ़ाने को खड़े होते तो चारों तरफ खामोशी छा जाती. ऐसे अनुशासित और प्रतिबद्ध शिक्षक कभी नहीं देखे. उन्होंने हमें बिहारी पढ़ाया, दिनकर की उर्वशी पढाई, और पढ़ाया काव्यशास्त्र. एम फिल में उनकी पढाई शोध प्रविधि आज तक काम आ रही है. बिहारी का मांसल प्रेम हो या उर्वशी का कामाध्यात्म, वे जैसे प्याज के छिलकों की तरह से अर्थ की परतें निकालते जाते. कई बार लगता कि वे साहित्य नहीं, समाजशास्त्र पढ़ा रहे हैं. बिहारी को पढ़ते हुए छात्र-छात्राएं आँखें नींची कर लेते. लेकिन भारद्वाज जी के चेहरे पर शिकन तक नहीं आती. वे बार बार कहते, ‘नाव यू आर एडल्ट, यू हैव एवरी राईट टु नो अबाउट सेक्स.’ पाश्चात्य काव्यशास्त्र के वे गहरे पारखी थे. यदि वे न होते तो हम लोग पाश्चात्य काव्य दर्शन से अनभिज्ञ ही रहते. उनका ज्ञान हिन्दी की किताबें पढ़कर हासिल किया हुआ ज्ञान नहीं था, सीधे अंग्रेज़ी की मूल किताबों से प्राप्त ज्ञान था. इसलिए अक्सर हिन्दी की कक्षा में भी वे कई बार अंग्रेज़ी में समझाते हुए मिलते. अच्छा ही हुआ कि उन्होंने अपने नोट्स को तरतीब देते हुए बाद में किताबें छपवाईं. पाश्चात्य काव्यशास्त्र के सिद्धांत और शोध प्रविधि हिन्दी में अपनी तरह की श्रेष्ठ पुस्तकें हैं.  
हिन्दी की दुनिया में वे एक अपरिचित नाम थे क्योंकि साहित्यिक खेमेबाजी में उनकी दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन छात्रों के लिए वे एक श्रेष्ठ अध्यापक थे. कक्षा में उन्होंने कभी किसी छात्र को लिबर्टी नहीं लेने दी. कोइ चुन तक नहीं कर सकता था. हम जैसे छात्र जब उनके करीब जाने की कोशिश करते तो वे जैसे दूर होकर कहते कि बच्चू, बिना मेहनत के मेरे पास मत फटकना. वे कहते भी कि पढाई-लिखाई के लिए मेरे पास कभी भी आ सकते हो, लेकिन फ़ालतू बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है. वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य रहे थे. मध्यकालीन रोमांस पर उनका काम था. एक अध्यापक के तौर पर वे हमेशा अप टू डेट रहते थे. बेहद सख्त अध्यापक थे. समय के हमेशा पाबन्द. उनका लेक्चर कभी 45 मिनट से एक मिनट भी कम नहीं हुआ. वे पहले ही कह देते, जिसने नहीं पढ़ना हो, वह कक्षा से चला जाये. हाजिरी लग जायेगी लेकिन और छात्रों को डिस्टर्ब न करे. अत्यधिक अनुशासनप्रिय होने के कारण ज्यादातर विद्यार्थी उनके करीब जाने में घबराते. वे हिमाचल के चंबा के मूल निवासी थे. पहाड़ों की सादगी उन्हें विरासत में मिली थी.
एक बार विभाग में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ. प्राध्यापकों ने भी कुछ न कुछ बोला या कविता-गीत गाया. उनका नंबर आया तो पहले उन्होंने सीटी बजाने की कला पर पांच मिनट व्याख्यान दिया. उसके बाद सीटी के जरिये “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा..” वाला गाना गया. मैंने इससे पहले किसी व्यक्ति को इतना सुरीला गीत और वह भी सीटी के जरिये गाते नहीं सुना था. सचमुच उन्होंने इतना मधुर गाया कि हमने उसके बाद उनकी सख्त अध्यापक की छवि अपने मन से निकाल फेंकी.
यह 1078-79 की बात है. तब देश में जनता पार्टी की सरकार थी. प्राध्यापकों की राजनीति में जनसंघ वालों के अच्छे दिन आये हुए थे. प्रो. भारद्वाज घोर मार्क्सवादी थे. इसलिए कुछ उखड़े-उखड़े-से लगते थे. विभागाध्यक्ष डॉ. धर्मपाल मैनी परम्परावादी थे. उनसे उनकी ख़ास नहीं बनती थी. इसलिए प्रो. भारद्वाज या तो क्लास में होते या अपने कमरे में पढ़ते-लिखते हुए मिलते. अध्यक्ष के दरबार में बिलकुल हाजिरी नहीं लगाते. मेरे जैसे कुछ छात्र, जो हर गतिविधि में भाग लेते, वे स्वाभाविक रूप से अध्यक्ष के ग्रुप में चले गए. उन दिनों मैनी जी के गुट में युवा लेक्चरर डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा भी थे. वे कठिन भाषा के धनी थे. सहज बातचीत में भी अत्यंत कठिन भाषा का प्रयोग करते. हम उनकी भाषा की नक़ल करने की असफल कोशिश किया करते. वे ही सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रभारी हुआ करते थे. हम लोगों के वही सरपरस्त थे. हमें बहुत प्यार देते. हम यानी मैं, रजनीकांत पांडे, सुखपाल वर्णी, हमसे वरिष्ठ राकेश मल्हन और कुछ लडकियां. एमए द्वितीय वर्ष में इन लोगों ने मुझे अध्यक्ष का चुनाव लडवा दिया और मैं भारी बहुमत से जीत भी गया. इस घटना के बाद हम पूरी तरह से मैनी जी के गुट के हो गए. लिहाजा बाक़ी प्राध्यापक हमें ख़ास तवज्जो नहीं देते. हालांकि भारद्वाज जी को इस गुटबाजी से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन हमें खुद ही लगता कि शायद कहीं इसी वजह से वे हमसे कटे-कटे न रहते हों.
यानी 1980 में एमए कर चुकने तक भारद्वाज जी के साथ हमारा सम्बन्ध सामान्य छात्र-शिक्षक जैसा ही था. मुझे याद नहीं पड़ता कि हम कभी उनके घर गए हों. न मैं, न पाण्डेय. लेकिन उन्हीं दिनों एक अप्रिय विवाद हुआ. मेरा सर्वप्रिय दोस्त रजनी कांत पाण्डेय एमए करके अपने घर चला गया. उसके पिताजी का ट्रांसफ़र मेरठ हो गया था. वह भी वहीं चला गया. जुलाई में मैंने उसे चिट्ठी लिखी कि मेरठ में क्या करोगे, एम फिल की प्रवेश परीक्षा होने वाली है. तुम भी आवेदन कर दो. उसका मन नहीं था. फिर भी उसने आवेदन कर दिया. परीक्षा हुई, इंटरव्यू हुआ. 15 सीटें थीं. रजनी कांत का नंबर नहीं आया. हमें आश्चर्य हुआ. वह इतना गया-बीता भी नहीं था कि 15 में भी न आ सके! हमने लक्ष्मी नारायण शर्मा जी से बात की. उन्होंने संकेत दिया कि रजनी का नंबर तो चुने गए छात्रों में था पर पता नहीं क्यों अंतिम सूची में रह गया. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि शायद भारद्वाज जी कुछ बता सकें. भारद्वाज जी के पास जाने में हमें डर लगता था. पता नहीं क्या सोचें?
मरता क्या न करता. हम दोनों भारद्वाज जी के पास गए. उन्होंने शाम को घर पर बुलाया. पता चला कि रजनी का नाम जानबूझ कर बाहर कर दिया गया था. हमें आश्चर्य हुआ कि मैनी जी तो हमें बहुत चाहते थे. रजनी को भी वे अच्छा विद्यार्थी मानते थे, फिर उनके मन में ऐसी क्या ग्रंथि रह गयी कि एक योग्य विद्यार्थी का नाम ही सूची से गायब कर दिया? मैनी जी कुछ भी सुनने को राजी नहीं थे. दूर-दूर तक कोई कारण समझ में नहीं आया. रजनी उदास हो गया. लक्ष्मी जी सिर्फ लेक्चरर ही थे, इसलिए बहुत ज्यादा साथ नहीं दे सकते थे. मैनी जी के प्रति सम्मान होते हुए भी उनके साथ खुल कर लड़ाई लड़ी जानी थी. कौन साथ दे! मैं कक्षा में प्रथम था, सबकी नजर में एक आज्ञाकारी बालक. लड़ने-भिड़ने का मेरा स्वभाव नहीं था. रजनी ने अपने पिताजी को चिट्ठी लिखी कि क्या करूं? अन्याय हुआ है. अन्याय का प्रतिकार करूं कि नहीं. उसके पिताजी फ़ौज में बटालियन पंडित थे. उनका उत्तर आ गया. लड़ाई से पीछे नहीं हटना. तब एकमात्र सहारा बने प्रो. भारद्वाज. उन्होंने न जाने कितनी चिट्ठियाँ लिखवाईं. हम दोनों रोज विभाग जाते ही छात्र नेताओं से मिलते, अध्यापक नेताओं से मिलते, वीसी ऑफिस जाते, सीनेटरों से मिलते. फिर शाम को प्रो भारद्वाज को रिपोर्ट देते. हमारे पास वे सारे दस्तावेज थे, जिनसे साबित होता था कि रजनी के साथ अन्याय हुआ है. वीसी राम चंदर पॉल, एसवीसी डीडी ज्योति, डीयूआई गोसल साहब, प्रो. वीसी पांडे, सीनेटर सत्यपाल जैन सबने मैनी जी को मनाया कि मान जाओ, क्यों बच्चे के साथ अन्याय कर रहे हो? लेकिन मैनी जी नहीं माने. उन्होंने कहा कि इसे रखना है तो मैं इस्तीफा दे दूंगा. हालांकि उनके पास इसके पीछे कोई कारण नहीं था. तब अंत में जैन साहब (सत्यपाल जैन) ने किसी हाई कोर्ट का एक केस लाकर वीसी को दिखाया कि कोर्ट में जायेंगे तो आप फँस जायेंगे. भलाई इसी में है कि रजनी को दाखिला दे दो. तब जाकर वीसी ने मैनी जी को बुलाकर रजनी को एडमिशन देने का आदेश दिया. फिर भी रजनी को बुलाकर कहा गया कि पहले गुरूजी से माफी मांगनी होगी, ताकि उन्हें बुरा न लगे. ऐसा ही किया गया. इस लड़ाई में लगभग दो महीने लग गए. लेकिन एडमिशन हुआ. और हमारी पढाई भी तभी शुरू हो पाई.
इस लड़ाई से जहां हम मैनी जी से दूर हो गए, वहीं भारद्वाज जी के रूप में एक नए और सच्चे मार्गदर्शक गुरु मिल गए. उन्होंने अपने हिस्से की मेरी हाजिरी भी पूरी कर दी. अन्य अध्यापकों के बीच भी हमारी छवि सुधारने का काम किया. इस बीच हम उनके घर के स्थायी सदस्य बन गए. उनकी एकमात्र बेटी संगीता तब शायद 11वी में पढ़ती थी. गुरुमाता भी हमें बहुत स्नेह देने लगीं. इस तरह हमने एमफिल किया और दोनों को ही नौकरियाँ भी एमफिल करते करते मिल गयीं. इस तरह हमारा चंडीगढ़ छूट गया.
लेकिन बाद में भी प्रो. भारद्वाज का मार्गदर्शन निरंतर मिलता रहा. रजनी ने तो उनके निर्देशन में ही पीएच डी भी की. जब मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप में प्रशिक्षार्थी पत्रकार बन कर मुंबई चला गया तो एक बार वे सपरिवार मुंबई भी आये. मैंने कहा कि किसी गेस्ट हाउस में कमरा बुक करवाने का जुगाड़ करता हूँ तो उन्होंने सख्त मना कर दिया. बोले हम तुम्हारे साथ ही रहेंगे. मैं वडाला की झोपडपट्टी से सटी साल्ट लैब के मजदूरों की कॉलोनी में रहता था, छोटी सी चाल में. एक ही कमरा था. टॉयलेट-बाथरूम भी बाहर था. हमने फर्श में ही दरी-चादर बिछाई और सब साथ ही सो गए. संगीता को अटपटा लगा तो बोले कि ये ही जीवन की सच्चाई है. वे बहुत व्यावहारिक थे. आलस्य उनमें बिलकुल भी नहीं था. खाना बहुत अच्छा बनाते थे. अनेक बार हमें भी खिलाया. बेहद सात्विक. जब भी मैं नौकरी बदलता, उन्हें जरूर सूचित करता. कई बार उन्हें लगता कि मैं शायद फिजूल ही उछलकूद कर रहा हूँ. इसलिए पूछ लेते कि मैं तरक्की के लिए नौकरी बदल रहा हूँ या यूं ही? अमर उजाला में कार्यकारी सम्पादक हुआ तो मैंने उनसे कुछ संस्मरण लिखवाए. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और मुल्क राज आनंद पर उन्होंने बेहतरीन संस्मरण लिखे, जिन्हें हमने छापा. नवम्बर 2012 में मेरे बेटे पुरु की शादी चंडीगढ़ में हुई तो वे रात एक बजे तक बैठे रहे और हम सबसे गप्प करते रहे.   
ऐसे गुरु कहाँ मिलते हैं? रजनी कांत पाण्डेय निस्संदेह भाग्यशाली रहे कि उन्हें न सिर्फ भारद्वाज जी जैसा गाइड मिला, अपितु उनका विश्वास भी प्राप्त हुआ. इससे भी बड़ी बात यह कि अंतिम समय में प्रो. भारद्वाज की सेवा का अवसर भी उसे मिला. मेरा विश्वास रहा है कि यदि भारद्वाज जी जैसा गुरु न मिला होता तो रजनी की ऊर्जा चैनलाइज नहीं हो पाती. यह भी विधि का विधान ही था कि अंतिम समय में रजनी उनके पास रहा. (इस संस्मरण का संपादित संक्षिप्त रूप 10 अप्रैल, २०१६ के दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुआ.) 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

बामुसि के रिटायर होने पर

संस्मरण/ गोविन्द सिंह 

दिसंबर के आख़िरी दिन अर्थात ३१ दिसंबर, २०१३ को बाल मुकुंद नव भारत टाइम्स के वरिष्ठ सम्पादक पद से चुपचाप रिटायर हो गया. और रह रह कर याद आ रहा है उसका लिखा पहला व्यंग्य ‘मुन्ना बाबू के रिटायर होने पर’. तब हम लोग नभाटा, मुंबई में ट्रेनी थे. यह लगभग १९८३ की बात है. वहाँ हमारे चीफ रिपोर्टर श्रीधर पाठक हुआ करते थे. वे पुराने जमाने के पत्रकार थे. शायद मैट्रिक पास थे. तीखी नाक वाले, बड़े गुस्सैल आदमी थे. अपने मातहतों को दबा कर रखते थे. मुंबई का अकेला अखबार होने के नाते तब वहाँ नभाटा की तूती बोलती थी. खासकर हिन्दी भाषी मारवाड़ी समाज में उसकी बड़ी पैठ हुआ करती थी. लेकिन वहाँ के बौद्धिक समाज में उसे खरीद कर पढ़ना एक मजबूरी थी क्योंकि कोई विकल्प नहीं था. अखबार का स्तर भी कोई ख़ास नहीं था. हम जैसे युवा पत्रकार इसे नए जमाने का अखबार बनाना चाहते थे. पर पुराने लोग बदलने को तैयार नहीं थे. नए पत्रकारों के निर्विवाद लीडर राम कृपाल जी हुआ करते थे. विश्वनाथ जी दोनों पीढ़ियों के बीच सेतु थे. नए और पुराने लोगों के बीच हमेशा एक टकराव बना रहता था. उन्हीं दिनों पता चला कि पाठक जी के रिटायर होने का समय आ गया है. कंपनी उन्हें दो वर्ष का एक्सटेंशन पहले ही दे चुकी थी. वह समय भी बीत गया था. इसलिए रिटायर तो होना ही था. पाठक जी पूरी तरह से स्वस्थ थे, लिहाजा वे किसी हाल में इस स्थिति के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे. रोज-ब-रोज मारवाड़ी व्यवसाइयों के घर बुलाया जाना, छोटी-छोटी गोष्ठियों की अध्यक्षता करना, फीता काटना, साधूवेला से प्रसाद ग्रहण करना, सम्मान प्राप्त करना, यही उनकी दिनचर्या थी. वे स्वयं ‘आज के कार्यक्रम’ जैसा मामूली कालम बनाया करते थे. शहर में होने वाले इन छोटे-छोटे कार्यक्रमों में उनकी बड़ी दिलचस्पी रहा करती थी. और यह सब टिका था एक अदद चीफ रिपोर्टरी पर. वरना घर और दफ्तर के अलावा उनकी कोई जिन्दगी नहीं थी. इसलिए ऐसे व्यक्ति के लिए रिटायर हो जाने का एहसास ही बड़ा दुखदायी था.
मैं चूंकि एक आज्ञाकारी बालक था, इसलिए वे मुझे बहुत चाहते थे. वे मुझे हर शाम किसी बड़े होटल में भेजते, जहां खाने-पीने की प्रचुर व्यवस्था होती. खबर चार लाइन की बनती. इस तरह की लोकल रिपोर्टिंग में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं उनसे दूर भागता रहता. बाल मुकुंद स्वभाव से ही नटखट था और अक्सर उसकी बातों में भी व्यंग्य रहता था, बेवजह छेड़खानी की उसकी आदत थी. इसलिए पाठक जी की नज़रों में खटकता रहता था.
तो पाठक जी के रिटायर होने की खबर ने ताज़ा हवा के झोंके की तरह दस्तक दी. बाल मुकुंद को बड़ी क्रिएटिव-सी शरारत सूझी. उसने एक व्यंग्य लिख डाला. बहुत चुटीला. व्यंग्य क्या था, सीधे-सीधे पाठक जी पर हमला था. शाम को कमरे में पहुंचे तो हम दोनों ने उसे कई बार पढ़ा. फिर उसमें से वे हिस्से संपादित कर दिए गए, जिनसे लगे कि यह किसके बारे में लिखा गया है. दो-तीन दिन में उसे कई बार तराशा गया. हम दोनों ने उसे संपादित करने में अपनी पूरी सम्पादन कला लगा दी. इस तरह जब वह परफेक्ट व्यंग्य बन गया तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए प्रधान सम्पादक राजेंद्र माथुर के पास दिल्ली भेज दिया एयर बैग से. हमने सोचा था कि यदि सेलेक्ट हो गया तो चार-पांच दिन में छपने का नम्बर लगेगा, तब तक पाठक जी रिटायर हो जायेंगे. लेकिन व्यंग्य जैसे ही दिल्ली पहुंचा, वैसे ही छपने के लिए क्रीड हो गया. और ठीक उसी दिन छप गया, जिस दिन पाठक जी रिटायर हो रहे थे. सम्पादकीय पेज वाले व्यास जी, जो शास्त्रीय संगीत के उद्भट समीक्षक थे, को वह समझ में नहीं आया. उन्होंने उसे चुपचाप छाप दिया. लेकिन जब छप गया तो हडकंप मच गया. पाठक जी उस रोज भी निर्धारित समय पर ऑफिस पहुंचे. उनका चेहरा तमतमाया हुआ था. किसी से बोले नहीं. चुपचाप सीट पर बैठ गए. ‘आज के कार्यक्रम’ बनाने लगे. न्यूजरूम में लोग सिर्फ और सिर्फ बाल मुकुंद के व्यंग्य के बारे में ही खुसुर-पुसुर कर रहे थे. सीनियर-जूनियर, किसी की भी हिम्मत नहीं हो रही थी पाठक जी के पास जाने की. तभी किसी वरिष्ठ ने उनके पास जाकर विदाई समारोह के बारे में सूचना देने की कोशिश की. बस फिर क्या था! पाठक जी बिफर पड़े. बोले, ‘यहाँ लोग मेरे बारे में व्यंग्य लिख रहे हैं. मुझे मुन्ना बाबू कह रहे हैं...’ फिर बाल मुकुन्द को ललकारते हुए बोले, ‘क्यों बाल मुकुंद जी, आपने मुझे नाली का कीड़ा लिखा?...मुन्ना बाबू नाली के कीड़े थे, नाली में चले गए... यही लिखा ना?’ बाल मुकुंद को काटो तो खून नहीं. मंद स्वर में गिडगिडाया, ‘ये आपके बारे में थोड़े ही लिखा है?’ लेकिन सच यही था कि लिखा गया था पाठक जी के ही लिए. हाँ, जब लिखा गया तब उसके अंजाम के बारे में सोचा नहीं गया था. खैर बात आयी-गयी हो गयी. पाठक जी का विदाई समारोह हुआ. लेकिन पाठक जी फिर कभी ऑफिस नहीं आये.
आज यह कहानी इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि आज बाल मुकुंद स्वयं रिटायर हो गया है. पिछले ३२ साल वह टाइम्स संस्थान से चिपका रहा. मैं या मेरे जैसे और साथी तो बीच-बीच में बहुत उछल-कूद करते रहे लेकिन उसने कभी इधर-उधर नहीं देखा. एकाध बार मौक़ा आया भी, लेकिन वह नहीं गया. हमारे बीच में वही सबसे प्रतिभाशाली था. उसकी भाषा में गजब की तार्किकता थी. हम चार लोगों ने एक साथ टाइम्स ग्रुप ज्वाइन किया ट्रेनी के रूप में, बाल मुकुंद सिन्हा, अनंग पाल सिंह, अरुण दीक्षित और मैं. शायद मैं सबसे कम उम्र का था. अनंग पाल कई साल पहले वीआरएस लेकर बैठ गया, अरुण दीक्षित भी अभी तक नभाटा में विशेष संवाददाता के रूप में जमा हुआ है, शायद वह ५७ के आसपास होगा. मैं पत्रकारिता की दुनिया को छोड़ कर अध्यापन में आ गया हूँ.
रिटायरमेंट से पहले मैंने बाल मुकुंद से कहा, क्यों नहीं टाइम्स ग्रुप में ही दो-एक साल एक्सटेंशन का प्रयास करते. बोला, ‘नहीं, मैं इस नई तरह की पत्रकारिता से ऊब गया हूँ. कुछ सार्थक करना चाहता हूँ.’ अब देखना है कि वह क्या करता है?
मुझे लगता है कि वह एक श्रेष्ठ व्यंग्यकार है. उसकी पूरी फितरत में ही व्यंग्य छुपा है. मैं उससे हमेशा यही कहता रहा कि उसे बाक़ी सारे काम छोड़ कर व्यंग्य-लेखन करना चाहिए. शुरू में उसने कई अच्छे व्यंग्य लिखे. कई रचनाओं का प्रकाशन-पूर्व का पाठक-सम्पादक मैं रहा. बाद में ‘चौथी दुनिया’ में उसने कुछ अरसा एक व्यंग्य कॉलम लिखा. लेकिन पता नहीं क्यों उसने इसे अपनी स्थायी विधा नहीं बनाया! वह राजनीतिक टिप्पणीकार बनना चाहता था. बौद्धिक बिरादरी में विद्वान् कहलाना चाहता था. तब की पत्रकारिता में यह संभव भी था. उसने टाइम्स फेलोशिप के तहत एक अच्छा काम किया, हिन्दी की पहली शैली पुस्तक लिख कर. यह माथुर साहब का ड्रीम प्रोजेक्ट था, जिसे बाल मुकुंद ने अंजाम दिया. लेकिन हिन्दी के अखबारों ने उसे नजरअंदाज कर दिया. खुद नभाटा में ही निजाम बदलने से उसकी उपेक्षा हुई तो और अखबार उसे क्यों अपनाते?
एक बार धर्मयुग से मुझे कश्मीर समस्या पर एक लंबा राजनीतिक विश्लेषण लिखने को मिला. तब हम ट्रेनी थे. आज कहा और कल लिखकर देना था. मैं लाइब्रेरी में बैठ कर पढने लगा. क्लिपिंग ले आया. रात भर नोट्स बनाता रहा. सुबह लिखने बैठा तो शरीर कांपने लगा. दस्त लग गए. हालत खराब हो गयी. किसी तरह ऑफिस पहुंचा और धर्मयुग में गणेश मंत्री जी को समस्या बतायी. उन्होंने कहा, अब लेख को ड्राप तो नहीं किया जा सकता. भारती जी को बताना भी ठीक नहीं होगा. वे नाराज हो जायेंगे. कोई विकल्प है? मेरे साथ बाल मुकुंद था. बाल मुकुन्द बोला, ‘यह बोलेगा, मैं लिख दूंगा.’ मंत्री जी मान गए. मैंने अपने नोट्स उसे दिए और जो कुछ मैं समझ पाया था, मैंने उसे बता दिया. उसने दो घंटे में बढ़िया लेख तैयार कर दिया. बाद में वह लेख धर्मयुग में दोनों के नाम से छपा. तीन पेज में छपा.
वह कम लिखता पर उसके राजनीतिक विश्लेषण बहुत उम्दा होते. उसकी लेखकीय तार्किकता का कोई जवाब नहीं था. एक बार हिन्दी आन्दोलन पर राष्ट्रपति की असहायता पर उसके लिखे सम्पादकीय की तबके सम्पादक डॉ सूर्यकांत बाली ने बहुत तारीफ़ की. मुझे आज भी उसका शीर्षक याद है: ‘प्राणहीन पन्नों का पहरुआ’. एक बार उसने देश के बौद्धिक माहौल पर रविवार्ता में बहुत सुन्दर निबंध लिखा, ‘गमले में उगे बुद्धिजीवी.’ बाल मुकुंद की विश्लेषण शैली बहुत बेबाक होती थी. सम्पादकीय बैठक में वह अपनी राय भी बड़ी बेबाकी से रखता. लेकिन उसकी तुनकमिजाजी उसके लिए दुश्मन बनाती रहती. फिर शायद हिन्दी में इस सबकी गुंजाइश भी नहीं रही! इसलिए वह धीरे-धीरे उदास हो गया. उसकी प्रतिभा कुंद होने लगी. उसने व्यंग्य तो लगभग छोड़ ही दिया, बाक़ी विधाओं पर भी कलम चलाने में संकोच करने लगा. समय की जरूरत पर या प्रबंधन की मांग पर कभी-कभार कुछ लिख दिया तो लिख दिया, वरना उसकी अपनी पसंद का उसने हाल-फिलहाल कुछ लिखा हो, मुझे नहीं पता. मुझे दुःख इस बात का है कि हिन्दी जगत में  अब बौद्धिक प्रतिभाओं के लिए जगह घटती जा रही है... खैर, बाल मुकुंद को अपनी नई जिन्दगी के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं.    

   

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

सर्द हवाओं का संगीत

निबंध/ गोविन्द सिंह
धान की फसल कट चुकी है. खेतों में जगह-जगह रबी की फसल बोई जा रही है. कहीं-कहीं गेहूं की नन्हीं कोंपलें फूटने लगी हैं. काली-काली मिट्टी पर हरे छींट वाली चादर की तरह. सुबह टहलने जाता हूँ तो नन्हीं कोंपलों पर मोती सरीखी ओस की बूंदों को देख मन खुशी और विस्मय से भर उठता है. कभी सूर्य की पहली किरण इन पर पड़ जाए तो यह आभा एकदम स्वर्णिम हो जाती है. कुछ ठहर कर देखता हूँ, अपनी आँखों में इन दृश्यों को भर लेना चाहता हूँ. हरे-भरे खेत में जैसे हजारों-हजार मोती बिखरे हुए हैं. बीच-बीच में इक्का-दुक्का सरसों के फूल उनकी लय को तोड़ रहे हैं. प्रकृति की कैसी लीला है! अच्छा ही हुआ, इस अलसाए-से कसबे में आ गया, वरना महानगर में इस सब से बंचित रह जाता.
दीपावली के साथ ही यहाँ मौसम में गुनगुनी ठण्ड शुरू होने लगती है. हल्द्वानी के जिस इलाके में रहता हूँ, वहाँ अप्रैल-मई में बया का शोर सुनाई देने लगा था. नवम्बर आते-आते वे अपने घोंसले छोड़ कर वन-प्रान्तरों को लौट रही हैं. सर्दी के ख़त्म होने पर वे फिर आयेंगी, फिर से घोंसले बनाने की कवायद शुरू करेंगी. मेरे पड़ोस में मेहता जी के ताड़ वृक्षों पर इन्होने घोंसले बना लिए हैं. ६-७ महीने इनकी चें-पें से मेहता जी का आँगन गुलजार रहता है. आने वाले ६ महीने वीरानी के रहेंगे. घोंसले लटके रहेंगे लेकिन उनमें कोई चहल-पहल नहीं होगी. अगले साल फिर आयेंगी और नए घरोंदे बनाएंगी. सर्दियां बहुतों को अपनी धरती से उखाड़ देती हैं. पुराने जमाने में सर्दियों में पहाड़ों से लोग घाम तापने के लिए मैदानों में पडाव डाल लिया करते थे. तराई-भाबर में बहुत सी जगहें इनके पडाव बनती थीं. मौसम अनुकूल होते ही लोग फिर पहाड़ों की ओर लौट जाया करते थे. आज भी उच्च हिमालयी इलाकों के भोटिया लोग सर्दियों के चार महीने अपने भेड़-बकरियों के साथ मैदानी तलहटियों में आ जाते हैं. लेकिन बयाओं का यह झुण्ड अपेक्षाकृत गर्म मौसम में यहाँ आता है, अपनी गृहस्थी बसाने. शायद इन्हें मानव बस्तियों में सुरक्षित ठिकानों की तलाश रहती है पर  मानव-बस्तियां भी अब कहाँ सुरक्षित रहीं? इनके रहने की जगहें लगातार सिकुडती जा रही हैं.
सर्दी यानी ठण्ड यानी हेमंत ऋतु दस्तक दे चुकी है. अगहन यानी मंगसीर के आते ही मौसम में सर्द हवाओं की मादकता छाने लगती है. इन सर्द हवाओं के भी अनेक रंग देखे हैं. लेकिन प्रकृति का न्याय भी किसी समाजवाद से कम नहीं होता. अपने होने का एहसास वह सबको बराबर कराता है. जो अपनी तमाम सुख-सुविधाओं और ऐशो-आराम के जरिये गरमी या सरदी को जीत लेने का दम भरते हैं, वे गलत हैं. आप सर्दी का आनंद लेना चाहें तो तमाम अभावों के बाद भी ले सकते हैं. और ठण्ड से डरते हों तो तमाम सुविधाओं के बावजूद वह आपको डराकर रहेगी. प्रकृति एक ही कोड़े से सबको हांकती है, वह बात अलग है कि किसी को उसका अहसास होता है और किसी को नहीं.
पिथौरागढ़ जिले में सौगाँव नाम के जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ, वहाँ ख़ास ठण्ड नहीं पड़ती है. चारों तरफ से घिरी पहाड़ियों के बीच तलहटी में जो बसा है. वहाँ प्राइमरी करने के बाद चौबाटी के मिडिल स्कूल में दाखिला लिया. चौबटी लगभग ५००० फुट ऊंचाई पर होगा. अपने गाँव के बच्चे रोज पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़ के चौबाटी पहुंचते. और दोपहर के बाद लौटते. वहाँ कडाके की ठण्ड पड़ती थी. नवम्बर आते-आते ठण्ड पड़नी शुरू हो गयी थी, लेकिन मेरे पास न कोट था और न पैंट. एक हाफ स्वेटर दीदी ने बुनकर भिजवा दिया था. वह मेरे लिए बड़े-बड़े ऊनी कोटों से बढ़कर था. लेकिन कुछ छवियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मनुष्य कभी भुला नहीं पाता. ऐसा ही एक दृश्य हाजिर है. सर्दी की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुला तो मैं नया कोट पहन कर स्कूल गया. मेरे मामाजी ने एक कोट सिलवा कर भिजवा दिया था. मक्खन जीन का कोट. उसके आने की अद्भुत खुशी थी. हलकी बरसात हो रही थी. जिनके पास भरपूर कपडे थे, उन्हें कडाके की ठण्ड लग रही थी. पर मैं अपने कोट के नशे में था. मेरे पास न जूते थे, न पैंट. पैरों में चप्पल और कमर में नेकर. स्कूल में प्रार्थना के वक्त मेरे एक दोस्त ने देखा तो आँखों ही आँखों में खुशी जाहिर की कि आखिर मेरे पास भी कोट आ गया है. लेकिन जैसे ही उसने आँखें नीचे फेरीं तो अफ़सोस जाहिर किया कि पैंट और जूते के बिना कोट का मजा किरकिरा हो गया. लेकिन मुझे कहाँ पैंट की परवाह थी! मैंने गर्व से कहा, ‘मुझे बिलकुल भी ठण्ड नहीं लग रही. कोट जो पहन रखा है!’
एक और दृश्य सुनिए. आठवीं के बाद कनालीछीना इंटर कॉलेज में नौवीं कक्षा में भरती हुआ. यह मेरे घर से काफी दूर यानी पैदल कोई २० किलोमीटर दूर था. महीने में एक बार अपने गाँव आता और महीने भर का सामान लेकर जाता. डेरा करके रहता था. यहाँ और भी ज्यादा ठंड पड़ती थी. दो लड़कों ने एक कमरा किराए में ले रखा था.  कमरा क्या था हवामहल. किराया था नौ रुपये. खुद ही जंगल से लकडियाँ बटोरते और खुद ही खाना बनाते. तब मैं दसवीं में था. सर्दियों की छुट्टियों के बाद एक फरवरी को स्कूल खुलना था. हम दो लड़के ३१ जनवरी को ही अपने डेरे में पहुँच गए थे. हमारे पास ओढने-बिछाने को ख़ास कपडे नहीं थे. शाम होते-होते बारिश होने लगी और रात ढलते बर्फ गिरने लगी. हम कम्बल के भीतर गए तो ठण्ड और परेशान करने लगी. हमने आग जलाई और रात भर हिमपात का आनंद उठाते रहे. सुबह हुई. हमने बाहर आकर देखा कि चारों ओर धरती ने बर्फ की चादर ओढ़ रखी थी. गिरते-फिसलते स्कूल गए. लेकिन प्रिंसिपल ने छुट्टी की घोषणा कर दी. हम लोग डबुल शोर करते हुए कमरे में लौटे. मेरे पास ओढने को एक पुराना कम्बल था. रूम पार्टनर चंद्रू की स्थिति मुझ से कोई बेहतर नहीं थे. लेकिन एक दिन उसके गरीब पिताजी कहीं से जुगाड़ करके उसके लिए २२ रुपये में एक रजाई खरीद कर पहुंचा गए. शायद एक-डेढ़ किलो की थी. मैं खुश था कि चलो एक के पास तो रजाई आयी. एकाध कोना तो मुझे भी मिल ही जाएगा. लेकिन जब रात को सोने का वक्त हुआ तो चंद्रू ने सख्त रवैया अपना लिया, ‘रजाई मेरी है तो मैं ही ओढूंगा.’ मैंने कहा, ‘चल यार कोई बात नहीं.’ जब रात को उसे नींद आ गयी तो मैंने कोशिश की कि मैं भी उसके भीतर समा जाऊं. लाख कोशिश करने पर भी मैं उसके भीतर नहीं आ सका. मैं हार कर अपने कम्बल के साथ सो गया. सच, जिन्दगी कितनी मजेदार होती है! तमाम अभावों के बावजूद हमें कभी ठण्ड ने अपने होने का अहसास नहीं कराया. नाक बहती रहती थी, पर कभी परवाह नहीं की. कभी दवा नहीं खाई. हमारे पंडितजी, महीने में एक बार गाँव भर के बच्चों को एक-एक पुडिया खिला जाते, वही हमारे लिए किसी भी टॉनिक से बढ़कर होती. जिन्दगी बिद्रूपों से भरी होती है. जिस कडाके की सर्दी को बचपन में ही खेलते-कूदते परास्त कर चुका था, जिन्दगी के दूसरे पडाव में पहुंचकर उसे अपने पब्लिक स्कूली बच्चों के साथ एक पर्यटक की तरह देखना कितना अजीब लगता है. जब अपने ही बच्चे हिमपात को देखने पैसे खर्च करके मसूरी-नैनीताल जाते हैं तो लगता है कि एक दिन मैं भी अजायबघर में रखा जाऊंगा.              
दिल्ली जैसे शहरों में सर्दी की मार और भी दुधारी होती है. एक तरफ अट्टालिकाओं में रहने वाले लोग तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद ठण्ड का रोना रोते रहते हैं. घर-दफ्तर सब तरफ कृत्रिम गरमी. थोड़ी-सी भी हवा लग जाए तो बीमारी का डर. जबकि दूसरी तरफ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोग कीड़े-मकोड़ों जैसी जिन्दगी जीने को मजबूर होते हैं. राजधानी दिल्ली में ही हजारों लोग बेघर सड़कों के किनारे उधार की रजाई लेकर रात बिताते हैं. तरक्की की तमाम कहानियों के बावजूद साल दर साल शीत लहर से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. फिर भी वे कभी किसी से शिकायत नहीं करते. करें भी तो किससे? बेशक सर्दी का रिश्ता भूख से होता है. हमारी तरफ सर्दियों की सबसे बड़ी रात को कौव्वे की मूर्छा वाली रात कहा जाता है. क्योंकि कड़कती ठण्ड में भूख के मारे इतनी लम्बी रात काट पाना जब दीर्घजीवी कौव्वे के लिए ही असह्य होता हो तो मनुष्य के लिए कितना कष्टकारी नहीं होगा. कुछ अरसा पहले राजधानी दिल्ली के ही एक उम्दा कालेज में पढने वाली एक लड़की ने अपनी पूरी ईमानदारी के साथ फुटपाथ में रहने वालों के साथ रात बिताने का फैसला लिया, उनके दर्द को करीब से महसूस करने के लिए. लेकिन रात होते-होते उसे असह्य लगने लगा और उसने फोन करके अपने परिजनों को बुला लिया. कितना कठिन होता है सिद्धांत और व्यवहार में! हमारी अधिसंख्य नीतियाँ और योजनायें  इसी तरह तो बनती हैं.
उत्तर भारत के शहरों में सर्दियों की शुरुआत सप्तपर्णी के खिलने से होती है. नवम्बर आते-आते पूरे के पूरे पेड़ सफेद फूलों से लद जाते हैं, जो रात भर गमकते रहते हैं. इधर तराई के साल-शीशम के जंगल भी फूलने लगे हैं, जिनकी छटा दूर से देखते ही बनती है. हालांकि प्रेम के लिए ऋतुराज वसंत को जाना जाता है, लेकिन प्रेम की अंतिम परिणति हेमंत में ही होती है. सचमुच यह रति की ऋतु है. सृजन और विनाश साथ-साथ चलता रहता है. यही ऋतु है, जो सबसे ज्यादा जानें लेती है और यही ऋतु सर्वाधिक जीवन भी देती है. यह जीवन-कामना की ऋतु है. ऋतुसंहार में कालिदास कहते हैं, ‘अनेक गुणों से रमणीय अंगनाओं के चित्तों को हरनेवाला, परिपक्व धानों से ग्रामों की सीमाओं की शोभा बढ़ानेवाला, चारों ओर पाला पड़ा, क्रौंच पक्षियों के गीतों से व्याप्त, बरफयुक्त यह हेमंत ऋतु आप सबको सुख प्रदान करे.’
पद्मावतकार जायसी से इस मौसम में अपनी नायिका का वियोग सहा नहीं गया. विरह विदग्ध नायिका कहती है:
जानहुँ चंदन लागेउ अंगा। चंदन रहै न पावै संगा॥
भोग करहिं सुख राजा रानी। उन्ह लेखे सब सिस्टि जुडानी॥
हंसा केलि करहिं जिमि , खूँदहिं कुरलहिं दोउ ।
सीउ पुकारि कै पार भा, जस चकई क बिछोउ॥9॥

तो भोजपुरी बारहमासा का रचनाकार कह उठता है:

अगहन ए सखी गवना करवले, तब सामी गईले परदेस ।
जब से गईले सखि चिठियो ना भेजले,तनिको खबरियो ना लेस ॥
पुस ए सखि फसे फुसारे गईले, हम धनि बानि अकेली ।
सुन मन्दिलबा रतियो ना बीते, कब दोनि होईहे बिहान ॥

यानी सर्दियां अपने साथ जीवन-मृत्यु, सृजन और विनाश, राग-विराग सबकुछ लेकर आती है. इसमें शिव और ब्रह्मा दोनों सक्रिय रहते हैं. हेमंत ऋतु हमें कष्ट जरूर देती है, लेकिन उसके बाद का आनंद अनुपमेय होता है. घने कोहरे के बाद सूर्योदय की ऊष्मा हमें जीवन की तमाम हकीकतो से सामना करने की ताकत देती है. सचमुच यह हमें पूर्णता देती है. (कादम्बिनी, दिसंबर, २०१३ से साभार)  



शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

बेरौनक होता देहरादून


देहरादून से मैंने अपने कार्य जीवन की शुरुआत की थी, २९ दिसंबर १९८१ को. आठ महीने मैं वहाँ रहा. चार सितम्बर १९८२ की रात मैंने वहाँ से मुंबई के लिए ट्रेन पकड़ी और छः सितम्बर की सुबह मुंबई पहुंचा. देहरादून के पलटन बाज़ार से खरीदे गए फ़ौजी बैग के साथ मैं टाइम्स बिल्डिंग में घुसा और एक नया जीवन शुरू हुआ. लेकिन देहरादून मुझे बार-बार याद आता रहा. केवल अपनी पहली नौकरी की वजह से नहीं, उस शहर की वजह से भी, जिसने मुझे अपार आत्मीयता दी. देहरादून शहर भी मुझे बहुत लुभावना लगता था. इसकी हरी-भरी वादियाँ, खूबसूरत खेत और राजपुर रोड जैसे कुछ पौश इलाके. पलटन बाज़ार की संकरी गली बहुत अच्छी लगती थी. हर जरूरत की चीज यहाँ मिल जाती थी.

देहरादून की पहचान- घंटाघर

पिछले तीन दशकों में दो-एक बार देहरादून जाने का मौक़ा मिला. लेकिन सन २००० में राजधानी बनने के बाद जिस तेजी के साथ इसमें बदलाव आने लगे, उसने शहर की शान्ति तो भंग की ही, साथ ही शहर से अपनत्व भी छीन लिया. आज ऐसा लगता है, जैसे आप एक निष्प्राण जंगल में घुस आये हैं. वहाँ कदम-कदम पर ट्रैफिक जाम लग जाता है, लोग उसी तरह लड़ते-झगड़ते हैं, जैसे दिल्ली में रोड रेज करते युवा. सचिवालय में घुसने वालों की वैसी ही भीड़ और दिल्ली की ही तरह पार्किंग की समस्या. जगह-जगह दलाल और ठेकेदार. बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर. लाखों के वारे-न्यारे. ऐसे में आत्मा कहाँ से रहेगी. एक तरह से शहर पर धनपशुओं का नियंत्रण हो गया है.
अस्सी के दशक में देहरादून और मसूरी की पहाडियों में चूना-पत्थर खुदाई करने वालों के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा रही थी. इस लड़ाई को लड़ने वाले युवा पत्रकार कुंवर प्रसून, नवीन नौटियाल और गुरुचरण थे. इनमें से कुंवर प्रसून को गुजरे हुए पांच साल हो गए हैं. नवीन नौटियाल को विधि ने पिछले हफ्ते हमसे छीन लिया. गुरुचरण दिल्ली में फ्री लांसिंग कर रहे हैं. जिन दो और अच्छे लोगों को समय से बहुत पहले हमसे छीन लिया गया, उनमें कवि-चित्रकार अवधेश कुमार और गज़लकार हरजीत बरबस याद आते हैं. उन दिनों हम सब लोग अक्सर शाम को टिप-टॉप रेस्तरां में मिला करते थे. जो महत्व दिल्ली में काफी हाउस का था, वही महत्व देहरादून में टिप-टॉप का था. घंटाघर में चकराता रोड पर गोयल फोटो कंपनी के सामने था यह टिप-टॉप. इसके मालिक ने पत्रकारों, लेखकों के लिए हमेशा अपने दरवाजे खोल रखे थे. हम लोग शाम को ३-४ घंटे वहाँ बैठे रहते और बड़ी मुश्किल से एकाध चाय पीते. लेकिन दूकान वाले ने कभी इसका बुरा नहीं माना. कई बार लेखकों की भीड़ देख कर दूसरे ग्राहक दूकान में ही नहीं घुसते थे, इसका भी वे बुरा नहीं मानते थे. वे खुद भी बुद्धिजीवियों की बहस में उलझ जाते. अवधेश कुमार, नवीन नौटियाल, अरविन्द शर्मा, ‘कविजी’ यानी सुखबीर विश्वकर्मा और भी अनेक लोग आया करते. कभी-कभी दिल्ली से हिमानी भट्ट और श्रीश डोभाल, सुरेश उनियाल  भी आया करते. ये लोग अवधेश जी के मित्र थे. इस से हम देहरादूनी लेखकों को दिल्ली से जुड़े रहने का संबल मिलता. महीने में एक बार छायाकार ब्रह्मदेव जी के यहाँ भी साहित्यिक बैठक हुआ करती. जिसमें शहर के जाने माने लेखक शामिल होते. रवीन्द्रनाथ त्यागी, भीमसेन त्यागी, गुरुदीप और कृष्ण खुराना, कुसुम चतुर्वेदी, शशिप्रभा शास्त्री, शैल शर्मा, सुभाष पन्त, पूरण मनराल, सुरेन्द्र चौहान आदि. नवीन नौटियाल के पिताजी की फोटोग्राफी की अच्छी-खासी दूकान थी. वे अज्ञेय और एम एन रॉय के करीबी मित्र थे. उनके पास अनेक दुर्लभ फोटो देखने को मिलते.  
चकराता रोड : क्या हाल हो गया!
पिछले हफ्ते एक बार फिर देहरादून की सड़कों पर घूमने का अवसर मिला. पलटन बाज़ार तो पहले ही चौड़ा हो गया है, हालांकि अब भी उसमें वैसी ही भीड़ है, लेकिन उसका पुराना चरित्र खत्म हो गया है. घंटा घर से चकराता रोड की तरफ जाते हुए जो दुकानें थीं, वे इन दिनों तोडी जा रही हैं. इनमें एक-दो मिठाई की अच्छी दुकानें थीं, गोयल फोटो कंपनी थी और टिप-टॉप रेस्तरां था, सब तोड़ दिए गए हैं. मुझे सबसे ज्यादा गम टिप टॉप के नेस्तनाबूद होने का है. क्योंकि इसी रेस्तरां ने मुझे आठ महीने में ही देहरादून का बना दिया था. पुराने लोगों में भी बहुत कम लोग वहाँ रह गए हैं, पन्त जी जरूर वहाँ बने हुए हैं. लेकिन शहर की साहित्यिक रौनक नदारद है. शहर के बनने और टूटने का सिलसिला जारी है. लेकिन कहीं कोई चीज योजनाबद्ध तरीके से हो रही हो, ऐसा लगता नहीं. वह रे विकास!