रविवार, 1 अप्रैल 2012

उत्तराखंड में पशु बलि कब रुकेगी?

समाज/ गोविंद सिंह

गैरसेण में पशु बलि को लेके गाँव वासियों और प्रशाशन के बीच काफी हंगामा हो गया. कुछ लोग घायल भी हो गए. उधर गंगोलीहाट के कालिका मंदिर में भैंसे की बलि पुलिस के हस्तक्षेप से रोकी गयी. इससे पहले स्याल्दे– देघाट के काली मंदिर में भी बलि रोकी गयी थी. पौड़ी गढवाल के बूंखाल स्थित कालिका मंदिर में भी पिछले दिनों भैंसा बलि को रोका गया. वहाँ बड़े पैमाने पर पशु बलि दी जाती है. उत्तराखंड के लगभग हर जिले में ऐसे मंदिर हैं, जहां पशु बलि दी जाती है. वह भी भैंसे की. पिछले साल नवंबर में उत्तराखंड के उच्च न्यायालय ने गढवाल के बूंखाल उत्सव में पशु बलि पर रोक लगा दी थी. तब से हर मंदिर में पशु बलि पर रोक की मांग हो रही है. लेकिन इसके बावजूद लोग हर बार भैंसे को लेकर मंदिर पहुँचते हैं और पुलिस उन्हें रोकती है. कभी-कभार लोग पुलिस से भिड़ते भी हैं. लेकिन बीच-बचाव के बाद मामला शांत हो जाता है. लोग जानते हैं कि बलि कानूनन अनुचित है, मंदिर के पुजारी भी इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ होते हैं, लेकिन फिर भी लोग भैंसा लिए चले आते हैं. जैसे कि वे देवता को यह बताना चाहते हों कि हम तो आ गए थे, यह सरकार है, जो हमें रोक रही है! यह बात समझ में नहीं आती कि तमाम शिक्षा के बावजूद आज भी उत्तराखंड में बलि-प्रथा मौजूद है. जिस तरह से सती प्रथा के निषेध के दो सौ साल बाद भी सती होने की छिटपुट घटनाएं बीच-बीच में सुनने को मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह से बलि प्रथा भी रुक नहीं पा रही.
पशु बलि को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस कानून नहीं है. अलबत्ता, छः राज्यों ने पशु बलि पर रोक लगा  राखी है. जानवरों से प्रेम करने वाले कुछ संगठन कानून को लेकर प्रयासरत हैं लेकिन अभी तक कोई खास सफलता नहीं मिल पाई है. कारण धार्मिक है. धार्मिक मामले में कोई हाथ नहीं डालना चाहता है. फिर मामला सिर्फ हिन्दू धर्म का ही नहीं है. इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. हजारों वर्षों से बलि प्रथा चल रही है. खास कर उन क्षेत्रों में इसका रिवाज ज्यादा है, जहां शक्ति की उपासना होती है. इसलिए दक्षिण भारत, पूर्वी भारत, असम, नेपाल, राजस्थान और उत्तराखंड में बलि प्रथा ज्यादा है. लोग इसके खिलाफ सुनने को ही तैयार नहीं होते. लेकिन उत्तराखंड की नयी पीढ़ी इस मसले पर काफी ऊहापोह की स्थिति में है. पिछले दिनों ‘मेरा पहाड़ फोरम’ नामक इंटरनेट समूह ने  इस पर एक बहस चलाई. कई लोगों ने बड़ी तल्ख़ टिप्पणियाँ कीं. अनेक लोगों का मानना था कि यह धार्मिक मामला है, इसलिए इसे नहीं उछालना चाहिए. एक सज्जन सूबेदार मेजर डीएस नयाल ने लिखा कि भैंसे को तडपते देख कर मेरा दिल इतना दहल उठा कि मैंने ठान लिया कि मैं इसके खिलाफ अपने गाँव वालों को तैयार करके रहूँगा. उन्होंने अपने गाँव में इसे लेकर बहस करवाई और अंततः गाँव के लोग पशु बलि के खिलाफ तैयार हो गए. अब वहाँ भैंसे की बलि नहीं दी जाती. इसी तरह मुंबई से डांडी-कांठी नामक संगठन की ओर से बूंखाल में पशु बलि के खिलाफ जन जागरण किया गया. कहने का तात्पर्य यह है कि सरकार और राजनीति जहां फेल हो जाती हैं, वहाँ से जागरूक जनता का काम शुरू होता है. और उत्तराखंड की नयी पीढ़ी यह काम कर रही है.
भैंसे की बलि खत्म भी हो जाती है तो बकरे और मुर्गे की बलि को खत्म होने में अभी लंबा समय लगेगा. बड़े मंदिरों में दी जाने वाली सामूहिक बलि पर कानूनन रोक संभव है लेकिन गाँव-गाँव में जो मंदिर हैं, वहाँ छिटपुट बलि चलती रहती है. दरअसल आज भी पहाड़ी समाज अनेक तरह की रूढियों में जकडा हुआ है. वहाँ की ग्रामीण न्याय-व्यवस्था आज भी लोक देवताओं के हवाले है. किसी का बच्चा बीमार हो गया तो देवता, किसी की गाय मर गयी तो देवता, किसी के यहाँ चोरी हो गयी तो देवता का प्रकोप निकल आता है. छोटे-छोटे आपसी झगडों में लोग देवता के पास (घात) शिकायत लेकर पहुँच जाते हैं. और फिर देवता भी बारी-बारी से दंड वसूलता है. इस मामले में पहाड़ का ग्राम समाज आज भी ५० साल पुरानी मान्यताओं पर चल रहा है. ज्योतिषियों, पुछ्यारियों, पुजारियों, घटेलियों और जगरियों की बन आती है. जिन्हें ज्योतिष का अ ब स नहीं आता, वे भी परेशान आदमी को आता देख महापंडित की एक्टिंग करते हैं. देवता के सामने गरीब आदमी जैसे पिसता ही चला जाता है. ग्रामीण समाज में जो दबंग हैं, वे अपनी मनमर्जी चलाते रहते हैं, उन्हें देवता की परवाह नहीं होती. जो अमीर हैं, वे अपना इलाज शहरों में जाकर करवा आते हैं, जो सक्षम हैं, वे कोर्ट-कचहरी जाने में भी नहीं हिचकते. जबकि गरीब को कभी मुर्गा तो कभी बकरा, दंडस्वरुप मंदिर में चढाना पड़ता है. आपको यह जान कर हैरानी होगी कि गाँव में तीन से छः महीने का बकरा ढूँढना मुश्किल हो जाता है, उसकी मुंहमांगी कीमत मिलती है. हम इस बात पर बहुत खुश होते हैं कि पहाड़ी समाज में अपराध नहीं है, वहाँ पुलिस की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन सच बात यह है कि देवता के नाम पर एक दूसरी तरह का डंडा आम आदमी के सर पर पड़ता रहता है. गरीब लोग देवता का पूजन अपने मन की शान्ति के लिए नहीं, प्रकोप के भय से करते हैं. हम यह नहीं कहते कि देव भय का  कोई फायदा नहीं होता, वे भी हैं, लेकिन देव पूजन मन की शान्ति के लिए होना चाहिए ना कि भय से. एक ज़माना था, जब समाज को इसकी जरूरत थी. अब जमाना आगे बढ़ गया है. इसलिए समाज को खुद ही आगे बढ़कर इसे रोकना होगा. ( अमर उजाला, १ अप्रैल, २०१२ से साभार)   


शुक्रवार, 23 मार्च 2012

उत्तराखंड की जनता दिग्भ्रमित क्यों है?

राजनीति/ गोविंद सिंह

यों तो उत्तराखंड का जनादेश, जब से राज्य बना है,  तब से ही लगातार भ्रमित करने वाला रहा है, लेकिन इस बार उसने इस शांत राज्य को गंभीर राजनीतिक अस्थिरता के दलदल में झोंक दिया है. खतरा यह है कि कहीं मध्यावधि चुनाव की नौबत न आ जाए. नब्बे के दशक में जिस तरह से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता रही, उसकी याद से ही सिहरन-सी होने लगती है.
आश्चर्य की बात यह है कि जब देश की संसद के लिए चुनाव होता है, तब उत्तराखंड की जनता बहुत ही समझदारी से वोट डालती है, कभी किसी तरह का भ्रम नहीं रहता. लेकिन विधान सभा के लिए अपना प्रतिनिधि चुनने में वह बेबाकपन नहीं दिखा पाती. अक्सर दो-चार सीटें कम रह ही जाती हैं. वर्ष २००२ में कांग्रेस तीन निर्दलीय विधायकों की मदद से सरकार बना पाई थी तो २००७ में भाजपा को तीन निर्दलीय और तीन उक्रांद विधायकों की मदद लेनी पडी थी. इस बार जब ३० जनवरी को उत्तराखंड से भारी संख्या में मतदान की खबरें आ रही थीं, तब एक बारगी ऐसा लगने लगा था कि शायद जनता आर-पार का फैसला दे देगी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं. नतीजा फिर वही ढाक के तीन पात. और फिर उसी तरह निर्दलीय विधायकों की खरीद-फरोख्त और ब्लैकमेलिंग. भलेही निर्दलीय विधायक बिना शर्त समर्थन दे रहे हों, लेकिन इस से माहौल तो दूषित होता ही है. जैसे प्रदेश चौराहे पर आकर खड़ा हो गया है. यह सिलसिला यहीं थमेगा नहीं. जब सरकार बनाने में ही इतना समय लग गया तो भविष्य कैसा होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है. इसलिए यह सवाल बना ही हुआ है कि आखिर उत्तराखंड की जनता क्यों किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं देती? क्यों वह ‘तुम भी सही, तुम भी सही’ के अंदाज में अस्पष्ट जनादेश देती है? अंततः उसका अनिर्णय अपने और प्रदेश के लिए घातक साबित होता है!
इसका सीधा-सा मतलब यह निकलता है कि उत्तराखंड का मतदाता राजनीतिक समझ के लिहाज से अभी परिपक्व नहीं हुआ है. वह समझ नहीं पा रहा कि किसे सत्ता सौंपी जाए. राज्य बनने के बाद विधानसभा क्षेत्र बहुत छोटे-छोटे हो गए हैं. जबकि समाज आपस में बहुत गुंथा हुआ है. आपस में रिश्तेदारियां हैं. एक ही गाँव, एक ही बिरादरी में लोग चुनाव के कारण बंट रहे हैं. राजनीतिक विचारधाराएं गौण हो जाती हैं. लोग राजनीतिक प्राथमिकताओं और निजी पसंदगियों के बीच फर्क नहीं कर पाते. ऐसे में किसको जिताएं, किसको हराएं, भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है. एक उम्मीदवार यदि एक गाँव के लिए उपयुक्त है तो दूसरे गाँव के लिए अनुपयुक्त. क्योंकि वह भी उसी गाँव में विकास योजनाएं ले जाता है, जहां उसकी रिश्तेदारी होती है. इसीलिए जहां लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की जनता का फैसला बहुत स्पष्ट हुआ करता है, वहीं विधान सभा चुनाव में वह लड़खड़ा जाता है.
यद्यपि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की राजनीति के बीच तुलना नहीं की जा सकती, लेकिन यह मानना होगा कि उत्तर प्रदेश को इस मुकाम तक पहुँचने में लगभग दो दशक लग गए. वहाँ भी वर्ष १९९० से लेकर २००७ तक लगातार खंडित जनादेश ही आता रहा. जिस से प्रदेश को लगातार राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरना पड़ा. जब मतदाता को लगा कि इस तरह का लंगड़ा जनादेश अंततः प्रदेश के ही नहीं, अपने पैरों में भी कुल्हाड़ी मारने जैसा है, तब उसने दो बाहुबलियों में से एक को गद्दी सौंपना बेहतर समझा. इस तरह उत्तर प्रदेश का मतदाता लगातार परिपक्व हो रहा है और प्रदेश हित में फैसले कर रहा है. हालांकि अभी वह पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुआ है, इसलिए एक तरफ वह एक ही दल को पूर्ण बहुमत भी दिला देता है तो दूसरी तरफ मुख्तार अंसारी जैसे लोगों को भी विधान सभा में भेज देता है. आशा करनी चाहिए कि आने वाले वर्षों में वह नीर-क्षीर विवेकी बन पाएगा. 
उत्तराखंड की दूसरी समस्या यह है कि पिछले १२ वर्षों में यहाँ की प्रादेशिक राजनीति का बहुत ज्यादा पतन हुआ है. लोगों ने देखा कि किस तरह उनका पड़ोसी इस राजनीति की सीढ़ी पर चढ कर पांच साल में ही मालामाल हो गया. इसलिए इन १२ वर्षों में जनता का अतिराजनीतिकरण भी हुआ है. यह बात पहले कही गयी बात की अंतर्विरोधी लग सकती है, इसलिए कृपया राजनीतिकरण को राजनीतिक परिपक्वता न समझा जाए. राज्य बन गया पर अभी तक लोगों की राजनीतिक दीक्षा नहीं हुई. जबकि राजनीति के राजमार्ग पर चल कर तथाकथित तरक्की की आकांक्षा असमय ही उनके भीतर जाग गयी. लोग किसी राजनीतिक विचारधारा या सामूहिक हित के लिए वोट नहीं डाल रहे, बल्कि अपने निहित स्वार्थ के लिए वोट डालते हैं. यह राजनीतिक अपरिपक्वता उन्हें अंततः किसी निर्णय तक नहीं पहुँचने देती. हालांकि दीर्घावधि में यह उसके लिए लोमड़ी के खट्टे अंगूरों की तरह साबित होती है. पर यह सत्य अभी उनकी समझ में नहीं आ रहा.
यही आकांक्षा विधायकों के स्तर पर मंत्री और मुख्यमंत्री बनने की होड़ के रूप में भी देखने को मिलती है. आखिर क्यों इतने लोगों के भीतर मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा जागी? आपके भीतर सरपंच बनने की भी काबलियत नहीं है, लेकिन आप विधायक बन गए. और आप इतनी जल्दी मुख्यमंत्री की दौड में भी शामिल हो गए! आपने तनिक भी सोचा कि मुख्यमंत्री का क्या मतलब होता है? आखिर क्यों यहाँ हर व्यक्ति मंत्री और मुख्यमंत्री बनना चाहता है? इसलिए कि ऐसा होने पर वह बिना काम किये ही रातोरात मालामाल हो जाता है. यही पिछले १२ वर्षों में हुआ है. जबकि होना यह चाहिए था कि मंत्री-विधायक प्रदेश के हित में रात-दिन परिश्रम करते. समाज के समक्ष ईमानदारी की मिसाल कायम करते. जाहिर है कि अगली बार वही व्यक्ति चुनाव जीतता जो परिश्रम की उससे भी लंबी रेखा खींचने में सक्षम हो. तब राजनीति सचमुच काँटों का ताज समझी जाती. ऐसी राजनीति में ईमानदार लोग आते और जनहित में काम होता. जाहिर है तब इतने लोग मंत्री पद की दौड में शामिल भी नहीं होते. आशा है कि उत्तराखंड की जनता इस विभ्रम से बाहर निकलेगी और इस चुनाव से सबक सीख कर भविष्य में स्पष्ट फैसला करेगी.  ( दैनिक जागरण, २२ मार्च से साभार)
http://epaper.jagran.com/epaperimages/22032012/21nnt-pg10-0.pdf
  

   


मंगलवार, 20 मार्च 2012

जब मंगलेश जी शास्त्रीय गायन करते हैं

हालांकि यहाँ आने के बाद मुझे कई आयोजनों से जुड़ने का अवसर मिल चुका है लेकिन इस बार का आयोजन कुछ खास था. यह मेरे अपने विभाग का था और विषय भी मीडिया के समक्ष चुनौतियां था. अपने प्रिय कवि मंगलेश डबराल को बुलाने का अवसर मिल गया. मंगलेश जी ने कहा वीरेन डंगवाल को भी बुलवा लो, ताकि मन लगा रहेगा. मैं एक बार नैनीताल में इन दो कवियों की जुगलबंदी देख चुका था, उसकी यादें अब भी तरोताजा थीं, इसलिए मैंने तुरंत वीरेन जी को भी ऐप्रोच कर लिया. उन्होंने भी हामी भर दी. मुझे लगा कि एक बार फिर उस जुगलबंदी का आनंद मिलेगा. लेकिन लास्ट में वीरेन जी नहीं आ पाए. लेकिन दो और परम मित्रों को भी बुलाया गया था. सुभाष धूलिया और प्रभात डबराल. मुझे पता है कि ये दोनों मसूरी में साथ ही पढते थे, तब से इनकी छनती है. आपस में लड़ते भी हैं, लेकिन एक दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते. फिर साथ में देवेन मेवाड़ी भी आये, जिनका साथ मुझे बहुत प्रिय है. मैं उनके सतत जिज्ञासु स्वभाव का कायल हूँ. त्रिनेत्र जी, जो अब हल्द्वानी को अपना स्थायी निवास बना चुके हैं और अक्सर १५-२० दिन में यहाँ आ जाते हैं, उन्होंने भी मित्र मंडली को जीवंत बनाने में योगदान किया. मेरे लिए ये सब अग्रज हैं. अपने अग्रजों का मैं तहे दिल से आदर करता हूँ.
गोष्ठी तो जो हुई, सो हुई. भाषण भी हुए. मीडिया के चारित्रिक पतन और तरक्की पर विमर्ष भी बहुत हुआ. लेकिन मुझे सबसे अधिक आनंद आया दूसरी शाम मंगलेश जी को राग सुनाते देखते हुए. यह बता दूँ कि मुझे रागों के बारे में क ख ग भी नहीं पता. मंगलेश जी ने हलके से रसरंजन और भोजन के बाद अचानक कुर्सी पर बैठते हुए घोषणा की कि चलो अब मैं आपको एक राग सुनाता हूँ. मुझे इसकी कोई उम्मीद नहीं थी. नैनीताल की तरह न गिर्दा थे, न राजीव लोचन साह और न ही वीरेन जी. फिर भी मंगलेश जी ने जब राग सुनाने की घोषणा की तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. क्योंकि नैनीताल का वह मंजर मेरी आँखों में रह रह कर लौट आ रहा था.
मंगलेश जी बोले, अब मैं आपको राग मध्माद सारंग यानी मध्यमादि सुनाता हूँ, जिसे वीणा सहस्रबुद्धे  ने गाया है: वे आ... आ... करने लगे. फिर कहते गला साथ नहीं दे रहा. त्रिनेत्र जी और देवेन जी भी राग सुनाने के लिए आग्रह करने लगे. मंगलेश जी आगे की बंदिश गाने लगे... रंग दे रंग दे रे रंगरेजवा... मेरी सुरख़ चुनरिया जैसे मोरे पिया की पगरिया...!! उन्होंने दूसरा राग गया पंडित भीमसेन जोशी का राग शुद्ध कल्याण: एरी माई पिया...
देवेन जी और त्रिनेत्र जी भी साथ में वैसा ही कुछ कुछ आलाप ले रहे थे लेकिन मैं मंगलेश जी को मोहित होकर देख रहा था. उनका अंग-अंग जैसे राग अलाप रहा था. उनका पेट, छाती, हाथ और पैर सब जैसे गा रहे थे. मुझे मल्लिकार्जुन मन्सूर याद आ रहे थे. दूरदर्शन पर एक बार मैंने उन्हें सुना तो देखते ही रह गया. ऐसा ही एक बार वडाली बंधुओं को सुनते हुए लगा. जिनके  रागों की बजाय भाव-भंगिमाओं को देखते रहने का मन करता था.
पिछली बार यानी कोई १० साल पहले जब नैनीताल में एक तरफ गिर्दा, राजीव लोचन जी और शेखर दा अपनी पहाड़ी चान्चारियों-भग्नौलों की धुनों में मस्त थे, तब भी मंगलेश जी अपने ही राग में मस्त थे. बगल में बैठे हुए वीरेन जी तमाम गालियों के साथ उनकी दाद दे रहे थी. और उन्हें गाने से रोकने की भरसक कोशिश कर रहे थे. लेकिन मंगलेश जी तमाम भव बाधाओं की परवाह न करते हुए अपने राग में चूर थे. वह दृश्य भी अपने आप में अद्भुत था. हमारे समय के दो बड़े कवियों की ऐसी मुठभेड़ मैंने कभी न देखी थी. ऐसी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था.
लेकिन इस बार मंगलेश जी को बिना बाधाओं के बहुत करीब से राग सुनाते हुए देखना एक अलग ही आनंद दे गया. बीच-बीच में वह कहते कि मैं जानता हूँ कि मेरा गायन बहुत भ्रष्ट है. मैं शास्त्रीय गायन नहीं जानता. यह तो ऐसे ही मस्ती है. उधर त्रिनेत्र जी भी कहते कि मंगलेश न जाने कब शास्त्रीय राग के बीच गढवाली लोक गीत की धुन घुसा देगा, पता नहीं चलता. लेकिन मेरे जैसे अज्ञानी के लिए तो यह अनुभव ही पर्याप्त था कि कैसे एक कवि का अंग-अंग गा रहा है. मैं यह भी सोचता रहा कि मंगलेश जी यदि कवि न होते तो क्या एक महान शास्त्रीय गायक न होते?        

सोमवार, 19 मार्च 2012

हरे-भरे खेतों के बीच वसंत की आहट

ललित निबंध/ गोविंद सिंह

धनिया के फूल
कभी आप गेहूं के हरे-भरे खेतों के बीच से होते हुए गुजरे हैं? जब गेहूं के पौंधे एक-डेढ़ फुट के हो जाते हैं, तब गहरे हरे रंग के खेतों के बीच से सुबह-सवेरे निकलिए, आपको हज़ारों-हज़ार मोती टिमटिमाते हुए दिखेंगे. पिछले डेढ़-दो महीनों से मैं अपने आस-पास के खेतों में गेहूं के पौंधों को पल-पल बढ़ते हुए देख रहा हूँ. जब वे नन्हे कोंपल थे, तब उन पर बरबस स्नेह उमड़ आता था. जमीन की सतह को फोड़ कर ऊपर उठने की जद्दोजहद से भरे हुए. जब वे आधे फुट के हो गए, तब उनकी रौनक अलग थी. जैसे बच्चा शैशव की दीवार को पार कर चलने-फिरने लगा हो, तेज दौड़ने की चाह में बार बार गिर पड़ता हो. जब वे डेढ़ फुट के हो गए, तो उनका सौंदर्य अनुपमेय हो गया. गहरे हरे रंग के घने खेत में तब्दील हो गए. पूरी तरह से आच्छादित. और कुछ भी नहीं. जब मंद-मंद बयार चलती, तो सारे पौंधे एक साथ हिलते दिखाई देते जैसे कि छब्बीस जनवरी की परेड लेफ्ट-राईट करती हुई चल रही हो. सुबह जब उनके ऊपर विखरी ओस की बूंदों पर सूर्य की पहली किरण पड़ती है, तब इनकी छटा देखते ही बनती है. मन करता है, बस, इन्हें ही देखते रहो.
गेहूं के खेत में निकलने लगीं बालियाँ
इन्हें देखते हुए मैं अक्सर अपने बचपन के गाँव में लौट जाता हूँ. नाक और कान छिदवाई हुई मेरे साथ की छोटी-छोटी लड़कियां सुबह-सवेरे ओस की इन बूंदों को बटोर कर नाक और कान के छिदे हुए घावों पर डाल रही होतीं. इन मोतियों को बटोरने को लेकर उनके मन में अद्भुत उत्साह होता था. सुबकते हुए घावों में मोतियों की ठंडक का एहसास पाने का उत्साह. साथ ही हरे-हरे पौंधों को छूने का एहसास. 
इधर कुछ दिनों से गेहूं में बालियाँ निकलने लगी हैं. कई-कई खेत तो बालियों से लबालब भर गए हैं. जैसे किशोर युवाओं के शरीर में बेतरतीब ढंग से परिवर्तन आने लगते हैं, लड़कों के चेहरे पर दाढी-मूंछ उग आती है, लड़कियों के शरीर में भी परिवर्तन दीखते हैं, उसी तरह गेहूं के खेत भी इन दिनों अपना रंग बदल रहे हैं. गहरा हरा रंग अब तनिक गायब हो गया है. अब उनकी खूबसूरती भी अंगड़ाई ले रही है. कहीं-कहीं बालियाँ पूरी आ चुकी हैं तो कहीं एकाध कलगी ही दिख रही है. बीच बीच में एकाध पैच ऐसा भी दिख जाता है, जो अभी अपने बचपन में ही हो. किशोर बालकों की छितराई हुई दाढी-मूछों की तरह.
प्यूली के फूलों से महकने लगे वन
एक दिन सुबह टहलते हुए मुझे धनिया का बड़ा-सा खेत दिखाई पड़ा, जो पूरी तरह से खिला हुआ था. धनिया की कुछ क्यारियां तो बचपन में देखी थीं, लेकिन इस तरह पूरे शबाब में कभी न देखा था. सरसों के चटख पीले फूलों की बहुत चर्चा होती है, लेकिन सच पूछिए तो मैं धनिया के फूलों भरे खेत को देखता ही रह गया. हलके गुलाबी और सफ़ेद रंग के फूल अद्भुत दृश्य उत्पन्न करते हैं. और उनकी हलकी हलकी खुशबू भी अलग ही समां बांधती है.
प्रकृति की ये सारी छटाएं वसंत के आगमन की सूचना दे रही हैं. वसंत दस्तक दे चुका है, हलकी-हलकी बयार चल रही है. लेकिन अभी मादकता आनी बाक़ी है. अगले महीने जब गेहूं की इन बालियों में दाने भर जायेंगे, वे ठोस आकार ले चुके होंगे और बाल, जो अभी मुलायम हैं, वे काँटों की तरह नुकीले हो जाएँगे, हवा में एक भुरभुरी सी गंध पसरने लगेगी, रंग भी हरे के बजाय पीताभ हो जाएगा, तब गेहूं के खेतों में मादकता बरसेगी. रंगीलो बैसाख, काट भागुली ग्यूं!! कुमाऊंनी लोकगीत की यह पंक्ति जैसे बैसाख की मस्ती को बयान करने को काफी है.
चारों तरफ एक अजीब सी गंध पसरने लगी है. गेहूं के खेतों के किनारे-किनारे सरसों के पीले फूल खिल रहे हैं.  अमराइयों में बौर फूट चुकी हैं. आम की ही तरह लीची में भी बौर आ चुकी हैं. हालांकि आम की बौर की तुलना में लीची की बौर जैसे दबे-छिपे ही आ रही है. वह अपने आने का एहसास नहीं करवाती. सेमल के पेड़ अपने को अनावृत कर चुके हैं. उनमें नन्हीं-नन्हीं लाल कलियाँ दिखने लगी हैं. पखवाड़े भर में ये पूरे के पूरे लाल हो चुके होंगे. नयी दिल्ली की अभिजात बस्तियों में तो जैसे सेमल राज करता है. सड़कें लाल-लाल फूलों से भर जाती हैं. यहाँ उसके ज्यादा पेड़ नहीं हैं. लेकिन पृष्ठभूमि में खड़े पहाड़ी जंगल में तो अलग अलग रंग के पेड़ों की पट्टियां सी बन गयी हैं. नींचे साल और शीशम के पेड़ों की पट्टी है, तो कुछ ज्यादा ऊंचाई पर चीड़ के पेड़ों की लाइन शुरू हो जाती है. सबकी अपनी-अपनी जमात है. जैसे अपने तिरंगे में अलग-अलग रंग की पट्टियाँ होती हैं, उसी तरह जंगल में भी फूलों की पट्टियाँ बन गयी हैं. सबसे नीचे पीली पट्टी है तो उसके ऊपर ताम्रवर्णी पट्टी है, कहीं कहीं कुछ लाल और धूसर पट्टी भी दिखाई देती है. कुछ ही दिनों में कुछ और ऊंचाई वाले पहाड़ों में बुरांस के लाल फूलों से पूरा का पूरा जंगल आच्छादित हो जाएगा. और तब सारे रंग फीके पड़ जायेंगे. दूर से यह जंगल नहीं, कोई बड़ी सी रंग-विरंगी धारीदार चादर नजर आती है. प्रकृति ने सचमुच वसंत की दस्तक दे दी है, मगर हमारे भीतर का वसंत अभी निद्रा की ही अवस्था में है. महानगरीय भागमभाग में हम प्रकृति की इस लय को पहचानना ही भूल गए हैं. पता नहीं हम कब अपने असली स्वभाव में लौटंगे! ( पाक्षिक पब्लिक एजेंडा से साभार)