सोमवार, 9 दिसंबर 2013

देवेन्द्र मेवाड़ी की यादों का पहाड़

किताब/ गोविन्द सिंह  

अभी तक हम देवेन्द्र मेवाड़ी को एक विज्ञान-लेखक के रूप में ही जानते रहे हैं. हालांकि अपने आरंभिक वर्षों में उन्होंने कुछ कहानियाँ भी लिखी हैं, लेकिन बाद के वर्षों में उन्होंने खुद को विज्ञान गल्प और लोकप्रिय विज्ञान लेखन तक ही सीमित रखा. इस दौर में उन्होंने एक श्रेष्ठ विज्ञान-लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाई. विज्ञान की गुत्थियों को अत्यंत आसान भाषा में पाठकों तक पहुँचाना भी कम कठिन कार्य नहीं था. यह हिन्दी समाज की जरूरत भी है. विज्ञान को बच्चों तक पहुंचाने का गुरुतर कार्य भी करते रहे हैं मेवाड़ी जी. लेकिन सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद उन्होंने जिस तरह से अपने बचपन के संस्मरणों को संजोया है, वह उन्हें श्रेष्ठ साहित्यकारों की कतार में ला खडा करता है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ में यद्यपि मेवाड़ी जी के बचपन, (स्कूल जाने की उम्र से 12वीं कक्षा तक का सफ़र) के संस्मरण हैं, लेकिन वास्तव में यह किताब एक श्रेष्ठ साहित्यिक कृति है. ठीक उसी तरह जैसे आर के नारायण की मालगुडी डेज या स्वामी और अन्य कहानियां. शंकर की मलयालम कृति ननिहाल में गुजारे दिन भी बाल मनोविज्ञान की अद्भुत रचना है. इसी तरह रसूल हमजातोव का मेरा दागिस्तान या गोर्की की आत्मकथा श्रृंखला भी अपने समय और समाज का अत्यंत जीवंत चित्रण करते हैं.
मराठी में आत्मकथा और जीवनी की समृद्ध परम्परा है. बांग्ला में संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त को वैसा ही सम्मान प्राप्त है, जैसा उपन्यास-कहानी को. यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि उसमें संस्मरण, रेखाचित्र या आत्मकथा को वह सम्मान प्राप्त नहीं है, जो बांग्ला या मराठी में है, वरना इस एक किताब की बदौलत मेवाड़ी जी साहित्य की अग्र पंक्ति में पहुँच चुके होते.
इस किताब की कहानियां नैनीताल समाचार में धारावाहिक रूप में छप चुकी हैं, इसलिए अखबार के पाठक इनके स्वाद से अच्छी तरह वाकिफ होंगे. ये कहानियाँ सिर्फ लेखक की अपनी आपबीती नहीं हैं, वे अपने समय का जीवंत दस्तावेज भी हैं. जीवन की घटनाएं इतनी बारीकी से पिरोई गयी हैं कि जैसे आपके सामने घटना घट रही है और उसके फल-प्रतिफल में आप स्वयं भी भागीदार हैं. ऐसा इसलिए संभव हो पाया क्योंकि मेवाड़ी जी ने न सिर्फ अपने बचपन को पूरी शिद्दत के साथ जिया है बल्कि इस किताब को शब्द देते हुए उन्होंने अपने बचपन के पल-पल को फिर से जिया है. सुख-दुःख को पूरी ईमानदारी के साथ महसूस किया है. और तब अपनी मार्मिक शैली के जरिये लिपिबद्ध किया है. उनका यह पुनर्जीवन इतना प्रामाणिक है कि लगता ही नहीं कि आप 69 साल के देवेन्द्र मेवाड़ी के साथ हैं. पूरे साधारणीकरण के साथ हम छः वर्ष के देबी के साथ यात्रा पर निकल
पड़ते हैं. वही हमारा कथावाचक है, उसी के सुख-दुःख के हम साझीदार बनते हैं. वही हमें चौगढ़ पट्टी के गाँव कालाआगर की सैर कराता है, आस-पास के गांवों से, वहाँ के बाशिंदों से, नाते-रिश्तेदारों से, जंगल-पहाड़ से, मवेशियों से, जंगली जानवरों से, चिड़ियों से, रीति-रिवाजों से मिलाता है. और जल्दी ही हमारा उस परिवेश के साथ तादात्म्य कायम हो जाता है. ‘मेरा गाँव-मेरे लोग’ नामक पहले ही अध्याय में हमारी मुलाक़ात आजादी की पहली भोर में आँख खोल रहे एक पहाडी गाँव से होती है, जो आज के तथाकथित विकास से कोसों दूर है. वहाँ गरीबी है, अभाव हैं, हाड-तोड़ मेहनत है, फिर भी उसका कोई ख़ास प्रतिफल नहीं है. शिक्षा, स्वास्थ्य और यातायात जैसी सुविधाओं से कोसों दूर है. लेकिन फिर भी वहाँ आदमियत जीवित है. लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं. वे लड़ते-भिड़ते हैं फिर भी एक-दूसरे के सुख-दुःख में मदद को आगे आते हैं. गाँव के गाँव कुछ रिश्ते-नातों के जाल में इस कदर आपस में जुड़े हुए हैं कि उन्हें अलग कर पाना मुश्किल है. गाँवों में भेदभाव है, ऊंच-नींच है, छुआछूत है लेकिन नफरत नहीं है. लोग मिलजुल कर रहते हैं. शिल्पकार हैं, चुनार हैं लेकिन उनके हुनर की कदर है. अद्भुत सहअस्तित्व है. सहअस्तित्व न सिर्फ लोगों के बीच है, बल्कि पालतू पशुओं, जंगली जानवरों, पेड़-पौधों के बीच भी है. शेर से डर भी है, लेकिन उसका होना भी जरूरी है. कुल मिलाकर मनुष्य और प्रकृति के बीच एक आदिम किस्म का सहअस्तित्व है. कई बार यह ध्वनि भी निकलती है कि आज के विकास की तुलना में भलेही तब अभाव ही अभाव थे, लेकिन फिर भी वह समय अच्छा था. इंसानियत ज़िंदा थी. अनपढ़ होते हुए भी लोग प्रकृति के प्रति संजीदा थे. भलेही उनके पास किताबी ज्ञान नहीं था, लेकिन प्रकृति प्रदत्त ज्ञान से वे लैस थे.
इस किताब की सबसे बड़ी प्रेरणा शायद लेखक की ईजा अर्थात मां हैं. ईजा का चरित सचमुच अद्भुत है. चूंकि वह बचपन में ही छोड़ कर चली गयीं, इसलिए भी उसका अभाव देवी के समूचे अस्तित्व में व्याप्त है. वह सशरीर भलेही न हो, लेकिन वायवीय ताकत के रूप में वह सदैव साथ है. ईजा का चरित लिखते हुए लेखक ने पूरे पहाड़ की मां का ही खाका नहीं खींच लिया है, अपितु ऐसा लगता है कि वह एक वैश्विक मां है. यह ठीक है कि मां या ईजू शब्द हर आदमी की जुबां पर रहता है, लेकिन यहाँ लेखक कथावाचक का रूप धर कर हम पाठकों से भी ईजू बोल रहा है, तो यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि यह शब्द लेखक के मन-मस्तिष्क में कितना गहरे धंसा हुआ है.
बालक देवी के उत्तरोत्तर विकास के साथ-साथ हमें तत्कालीन समाज की पूरी छटा देखने को मिलती है. अपने स्कूली जीवन, जंगल, खासकर बाघ का भय, देवी-देवता, तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज, शादी-व्याह, खेती-किसानी, मवेशी, चिड़ियाँ, जंगली जीवन, गांवों में काम करने वाले कारीगर और उनके तरह-तरह के काम, मौसम, शिकार और प्राकृतिक सुषमा से आप्लावित भीमताल-नैनीताल से हमें परिचित करवाता है. ऐसा लगता है कि मेवाड़ी जी ने पूरी तरह से अपने बचपन में डूब कर यह रचना लिखी है. जैसे वर्डस्वर्थ ने कहा था कि ‘पोइट्री इस रिफ्लेक्शंस रेकलेक्टेड इन ट्रेन्क्वेलिटी’. पूरी तरह से अपने वर्तमान से कटकर अपने बचपन में लौट जाना और उस जीवन की एक-एक चीज को याद कर के ज्यों का त्यों शब्दबद्ध करना सचमुच मुश्किल काम है. बहुत दिनों बाद इतनी सुन्दर और प्रामाणिक कुमाउनी हिन्दी पढने को मिली. इसकी थोड़ी-सी झलक मनोहरश्याम जोशी के ‘कसप’ में देखी थी. लेकिन इसका कोई जवाब नहीं.

नैनीताल समाचार में प्रकाशित  

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